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दल - बदल बदस्तूर चालू आहे

दल - बदल बदस्तूर चालू आहे

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में जिस तरह से नेता दल बदल रहे हैं, भारतीय राजनीति वह कोई नई बात नहीं हैं. (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में जिस तरह से नेता दल बदल रहे हैं, भारतीय राजनीति वह कोई नई बात नहीं हैं. (फाइल फोटो)

उर्दू के एक शेर की एक पंक्ति है – ‘’ज्‍यों-ज्‍यों ईलाज किया, मर्ज बढ़ता ही गया.‘’ भारत (India) की लोकतांत्रिक प्रणाली (Democratic system) में दल बदलने की बीमारी (Defection) पर यह पंक्ति बिल्‍कुल सटीक बैठती है. अभी पाँच राज्‍यों की विधानसभाओं के चुनाव होने हैं. इस चुनावी मौके को दल-बदल का सबसे उम्दा सीजन माना जाता है. उत्तरप्रदेश में जिस तरह से सभी पार्टियों में दल-बदल की घटनायें हो रही हैं, वे अब न तो किसी भारतीय को विस्मित करती हैं और न ही वैश्विक राजनीतिक विश्‍लेषकों को. जब भी राजनेता दल बदलते हैं, तो इसके लिए वे जिन खूबसूरत और यहाँ तक कि तार्किक रूप से मजबूत बातों का सहारा लेते हैं, उन पर संदेह करना मुश्किल होता है.

दल-बदल का अधिकार
वैसे भी जिस देश की राजनीतिक प्रणाली चुनावी लोकतंत्र पर आधारित हो, और जहाँ अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता मौलिक अधिकारों के अंतर्गत दी गई हो, वहाँ राजनीतिक दलों के सदस्‍यों के द्वारा दल के बदले जाने को उनके इसी अधिकार के अंतर्गत शामिल किया जाना चाहिए. बहुत से राजनैतिक विश्‍लेषक और यहाँ तक कि न्‍यायिक विशेषज्ञ इसे सही भी ठहराते हैं.

दल-बदल का प्रमुख कारण
लेकिन कुछ अपवादों को छोड़कर भारत में दल-बदल की घटनाओं का कभी भी यह मुख्‍य आधार नहीं रहा. पिछले सत्तर साल का इतिहास बताता है कि दल बदलने के पीछे मुख्‍य कारण नेताओं का निजी स्‍वार्थ ही रहा है. इसके अंतर्गत सरकार में पद प्राप्‍त करना सबसे प्रमुख कारण रहा है.

सरकारें भी बदली हैं
सन् 2020 में मध्‍यप्रदेश, गोवा, कर्नाटक आदि राज्‍यों में तो दल-बदल के कारण सरकारें ही बदल गईं और वह भी तब; जब देश कोरोना की महामारी से जूझ रहा था. मध्‍यप्रदेश में कानून के अनुसार दल बदलने वाले सभी सदस्‍यों की विधान सभा की सदस्‍यता समाप्‍त कर दी गई. वहाँ फिर से चुनाव कराये गये. इन्‍हीं नेताओं को फिर से उम्‍मीदवार बनाया गया. उनमें से कई उम्‍मीदवार चुनाव जीतकर मंत्री बन गये. और जो जीत नहीं सके या जिन्‍हें चुनावी टिकिट नहीं मिल पाया था, उन्‍हें सरकार में ‘एडजेस्‍ट’ कर लिया गया.

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यह शुरू से ही मौजूद
यहाँ यह जानना ठीक ही होगा कि दल-बदल का यह कैंसर न तो इक्‍कीसवीं शताब्‍दी की देन है और न ही आर्थिक उदारीकरण की. भारतीय राजनीति में यह शुरू से ही मौजूद रही है. फर्क केवल इतना पड़ा है कि जैसे-जैसे राजनीतिक दलों की जनता पर पकड़ कमजोर होने के कारण किसी एक दल को बहुमत मिलना कठिन हुआ, या फिर बहुमत मिला भी तो काफी कम अन्‍तर से, वहीं दल-बदल का प्रतिशत बढ़ने की संभावनाएं अधिक होने लगीं. सरकार में शामिल होने वाले छोटे-छोटे दलों के सदस्‍यों को भी सौदेबाजी करने का अच्‍छा-खासा अवसर मिल गया.

सबसे ज्यादा लाभ किसे
जाहिर है कि दल-बदल का सबसे बड़ा लाभ सत्ता में रहने वाली या चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने वाले दल को मिलता है. यदि हम 1957-1967 के बीच के आकड़ों को लें, जिसके लगभग सात साल जवाहरलाल नेहरू के नाम पर दर्ज हैं, के दौरान 98 सदस्‍यों ने कांग्रेस छोड़ी और 419 दूसरी पार्टियों के नेता कांग्रेस में आये. सन 1967 में निर्वाचित लगभग पैंतीस सौ सदस्‍यों में से लगभग 550 ने पार्टी बदली थी.

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वाय.व्ही. चौहान समिति
इस स्थिति को देखते हुए इसी साल वाय.व्ही. चौहान की अध्‍यक्षता में इस समस्‍या पर विचार करने के लिये एक समिति बनाई गई. इस समिति ने अगले ही साल अपनी रिपोर्ट दे दी. इस रिपोर्ट के प्रति अधिकांश राजनीतिक दलों ने अपनी सहमति व्‍यक्‍त की. संसद में विधेयक भी पेश किया गया. लेकिन मजेदार बात यह है कि इसे पारित कराकर कानून बनाने की बजाय संसद की संयुक्‍त प्रवर समिति को सौंप दिया गया.

एक रोचक विश्व रिकॉर्ड
सन 1967 में ही हरियाणा में एक रोचक घटना घटी थी, जो दल-बदल के इतिहास में विधायक गया लाल के नाम से दर्ज है. गया लाल ने पंद्रह दिनों में ही तीन बार दल बदलने का विश्‍व रिकार्ड बनाया था. इसी के नाम से दल बदल की घटना का एक नया नामकरण संस्‍कार हुआ – ‘आया राम, गया राम’. हरियाणा में ही भजनलाल अपनी पार्टी के सभी सदस्‍यों के साथ पाला बदलकर वहाँ के मुख्‍यमंत्री बनने में सफल हुये थे.

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दलबदल की समस्या भारत (India) की राजनीति में शुरू से ही देखने को मिल रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

और 1977 में
सन 1977 में केन्‍द्र में पहली बार मोरारजी देसाई के नेतृत्‍व में गैर कांग्रेसी सरकार बनी. लेकिन अभी इस सरकार ने अपना आधा कार्यकाल ही पूरा किया था कि 76 सांसद इसका साथ छोड़कर कहीं और चले गये. सरकार गिर गई. और अगली जो सरकार बनी, उसमें इन सांसदों में से कई के पौ-बारह हो गये. इस तरह की घटनाओं को देखते हुये ही कर्नाटक के मुख्‍यमंत्री ने दल-बदल की घटनाओं को ‘गोल्‍ड रश’ का नाम दिया था, जहाँ हर व्‍यक्ति सोने की खदान की खोज में एक निश्चित दिशा में भागता नजर आता है.

कुछ रोचक आंकड़े
एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफार्म्‍स ने हाल ही में दलबदलुओं के बारे में कुछ रोचक आकड़े जारी किये हैं. सन 2016 से 2020 के बीच दल बदलने वालों में 42 प्रतिशत सदस्‍य कांग्रेस के थे. कुल 405 विधायकों में से 170 कांग्रेस विधायकों ने दल बदले. जबकि भारतीय जनता पार्टी से केवल 18 विधायक ही दल छोड़कर गये. कुल दल छोड़कर जाने वालों में से 45 प्रतिशत सदस्‍यों ने भारतीय जनता पार्टी ज्‍वाइन की.

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लोकतंत्र की आत्‍मा
इन आकड़ों से जाहिर है कि लोगों ने डूबती हुई नाव को छोड़कर तैरती हुई नाव में जाने का फैसला किया. व्‍यवहारिक दृष्टि से तो इसे सही ही कहा जायेगा. लेकिन जहाँ तक लोकतंत्र की आत्‍मा की पवित्रता का सवाल है, इसे भला सही कैसे ठहराया जा सकता है.

दूसरे देशों में भी
ऐसा नहीं है कि दल बदलने की यह राजनीतिक बीमारी केवल भारत में ही है. सन 2019 में उस ब्रिटेन के 11 सांसदों ने दल बदला, जहाँ से हमने अपनी वर्तमान राजनीति का बुनियादी ढांचा लिया है. इसी साल केवल एक सांसद के दल बदलने से तात्‍कालिन सरकार गिर गई थी और नई पार्टी सत्ता में आई थी. इजराइल, पूर्तगाल, मैक्सिको, थाईलैण्‍ड जैसे बहुत से ऐसे देश हैं, जहाँ इस तरह की घटनाओं ने न केवल सरकार के कार्यकाल को ही अस्थिर कर दिया है, बल्कि राजनीति को एक प्रकार से सौदेबाजी (हॉर्स ट्रेडिंग) में तब्‍दील कर दिया है.

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दलबदल की समस्या भारत (India) की राजनीति में शुरू से ही देखने को मिल रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

दलबदल विरोधी कानून
दल बदलने की इस शर्मनाक एवं संकटपूर्ण स्थिति को देखते हुए भारतीय संसद ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी के अभूतपूर्व बहुमत के बावजूद सन 1985 में 52वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा सर्वसम्मति से दलबदल विरोधी कानून बनाया. इसमें यह व्‍यवस्‍था की गई कि यदि कोई सदस्‍य पार्टी के निर्देश का उल्‍लंघन करके सदन में मत देता है या मतदान में भाग नहीं लेता, तो उसकी सदस्‍यता खत्‍म हो जायेगी. कहा गया कि यदि कोई निर्दलीय सदस्‍य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाये, तो उसकी सदस्‍यता खत्‍म हो जायेगी. यदि पार्टी छोड़ने वाले सदस्‍यों की संख्‍या विधान सभा में पार्टी के सदस्‍यों की कुल संख्‍या के एक-तिहाई से कम होगी, तो उनकी सदस्‍यता खत्‍म हो जायेगी.

फिर भी कमी?
लेकिन सवाल यह है कि क्‍या इससे उद्देश्‍य पूरा हो सका ? यदि ऐसा हो सका होता, तो इस कानून के अठारह साल बाद सन 2003 में 91वें संविधान संशोधन अधिनियम लाकर कुछ और इन्‍तजामात नहीं करने पड़ते. इस कानून के जरिये दल छोड़ने वाले एक तिहाई की संख्‍या को बढ़ाकर दो-तिहाई कर दिया गया. साथ ही यह भी व्‍यवस्‍था की गई कि दल-बदल कानून के अंतर्गत अयोग्‍य घोषित किये गये किसी भी सदस्‍य को मंत्री नहीं बनाया जा सकेगा.

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भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के लगभग 40 देशों ने राजनीती के इस विषैले प्रदूषण को रोकने के लिए कानून बना रखे हैं. यह सन 2003 का कानून है. अभी हम 2021 में हैं. इन अठारह सालों में क्‍या इस पर कुछ रोक लग पायी है? उत्तर बहुत साफ है कि नहीं. कहा जाता है कि ‘तू डाल-डाल मैं पात-पात.‘ तोड़ निकाल लिये गये हैं और दल बदलने की घटनाएं बदस्‍तूर जारी हैं, क्‍योंकि यह सभी राजनीतिक दलों को सूट करता है.

Tags: Assembly Election 2022, India, Politics, Research

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