क्यों देहरादून IMA में नेपाल और अफगानिस्तान के सैन्य अफसर किए जाते हैं ट्रेंड

भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) की जांबाजी और अनुशासन का लोहा दुनियाभर में माना जाता है

बहुत से मित्र देश अपने जवानों को भारतीय मिलिट्री (Indian army) के साथ प्रशिक्षण दिलवाना चाहते हैं. इनमें छोटे देशों के अलावा बेहद ताकतवर देश भी शामिल हैं.

  • Share this:
    भारतीय सैन्य अकादमी (Indian Military Academy) की जांबाजी और अनुशासन का लोहा दुनिया मानती है. अकादमी ने केवल भारत ही नहीं, बल्कि कई देशों को नाकाब अफसर दिए. असल में IMA में शानदार प्रशिक्षण के कारण कई मित्र देशों से भी यहां ट्रेनिंग के लिए अफसर भेजे जाते हैं. यही कारण है कि अकादमी की शुरुआत के साथ से लेकर अब तक 2342 विदेशी कैडेट यहां से निकल चुके हैं.

    हाल ही में अकादमी में पासिंग आउट परेड हुई. इसमें 325 नए अफसरों के बीच 70 कैडेट विदेशी थे. ये सभी ट्रेनिंग के बाद अपने-अपने देशों में लौट जाएंगे और वहीं की सेना के लिए काम करेंगे. तो सवाल ये है कि क्या विदेशी कैडेट हमारी मिलिट्री अकादमी में क्या कर रहे थे और इससे उन्हें क्या फायदा है. दरअसल हर देश की सेना का मित्र देशों के साथ संबंध होता है. इससे वे कई तरह के फायदे आपस से ले सकते हैं.

    आजादी के बाद से भारतीय मिलिट्री अकादमी का नाम दुनियाभर में फैल गया- सांकेतिक फोटो


    मिसाल के तौर पर दो देशों के बीच तनाव या फिर जंग के हालात होने पर म्युजुअल समझ के तहत कोई देश अपने मित्र देश की सैन्य उपकरणों या पोस्ट का इस्तेमाल कर सकता है. ईंधन खत्म हो जाने पर अगर आसपास मित्र देश का बंदरगाह या पोर्ट हो तो वहां रुककर ईंधन ले सकता है. और जरूरत पड़ने पर सैन्य मदद भी ली-दी जाती है.

    ये भी पढ़ें: चीन को हराने के लिए भारतीय सैनिक पहनेंगे 'नकली स्किन', अदृश्य होकर करेंगे जंग

    इसी तरह से IMA में प्रशिक्षण के लिए भी कई देशों से कैडेट भेजे जाते हैं. साल 1922 में अकादमी की शुरुआत हुई. बाद में इसमें लगातार बदलाव होते रहे और पहला रेगुलर कोर्स 25 फरवरी 1946 को शुरू हुआ. इसके अगले ही साल आजाद भारत में अकादमी ने और बेहतर ढंग से आकार लिया.

    ये भी पढ़ें: Explained: वो रहस्यमयी बीमारी, जिसमें US के राजदूतों को सुनाई देने लगीं अजीबोगरीब आवाजें  

    वैसे बता दें कि ब्रिटिश हुकूमत के दौरान अविभाजित भारत से वो अफसर भी निकले, जो बाद में पाकिस्तानी सेना का हिस्सा बन गए. पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों की पहली दो पीढ़ियां इंडियन मिलिट्री अकादमी की देन रहीं. जनरल मूसा खान और जनरल टिका खान भारतीय अकादमी से ही निकले. इसी तरह से बांग्लादेशी अफसर जनरल मैग उस्मानी भी यहीं की देन थे.

    इस साल अफगानिस्तान से सबसे ज्यादा 47 कैडेट निकले- सांकेतिक फोटो


    आजादी के बाद से भारतीय मिलिट्री अकादमी का नाम दुनियाभर में फैल गया. इसकी तुलना अमेरिका, रूस और जर्मनी की तेज-तर्रार सेना से होती है. यही वजह है कि मित्र देश भी अपने कई कैडेट्स को यहां प्रशिक्षण के लिए भेजते हैं. इनमें अफगानिस्तान, तजाकिस्तान, किर्गिस्तान, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, मॉरिशस, तंजानिया और वियतनाम शामिल हैं. इस साल अफगानिस्तान से सबसे ज्यादा 47 कैडेट निकले.

    पापुआ न्यू गिनी और लेसोथो जैसे देश भी अपने सैनिकों को यहां ट्रेनिंग के लिए भेजते हैं. इसकी वजह ये है कि छोटा देश होने के कारण वहां संसाधन सीमित हैं. वहां आर्मी के पास ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं कि मुश्किल हालात क्रिएट कर ट्रेनिंग पक्की की जा सके. यही वजह है कि बहुत से देश अपने कैडेट्स को ट्रेनिंग के लिए भारत के पास भेजते हैं.

    तजाकिस्तान, किर्गिस्तान जैसे देश भारत के अलावा रूस में भी अपने सैनिकों को प्रशिक्षण दिलवाते हैं. इससे सैनिक न केवल मुश्किल से मुश्किल और अलग-अलग हालातों से मुकाबले के लिए तैयार हो जाते हैं, बल्कि सैनिकों का इस तरह से दूसरे देशों में ट्रेंड होना दो देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक रिश्ते को भी मजबूत करता है.

    प्री-कमीशन ट्रेनिंग के अलावा भारत दूसरे देशों की सेना को आगे के स्तर का प्रशिक्षण भी देता है-सांकेतिक फोटो


    प्री-कमीशन ट्रेनिंग के अलावा भारत दूसरे देशों की सेना को आगे के स्तर का प्रशिक्षण भी देता है. जैसे दिल्ली स्थित नेशनल डिफेंस अकादमी में ब्रिगेडियर स्तर की ट्रेनिंग मिलती है. कई बेहद ताकतवर मित्र देश भी अपने अफसरों को इस ट्रेनिंग के लिए भेजते आए हैं, जैसे कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और जर्मनी.

    ये भी पढ़ें: जो बाइडन के अमेरिकी राष्ट्रपति बनते ही किस विवाद में फंसे उनके बेटे  

    इसके साथ ही एक और कारण भी है, जिसके कारण मित्र देश हमेशा से अपने सैनिकों को यहां सैन्य प्रशिक्षण के लिए भेजते रहे हैं, वो है यहां के दुर्गम पहाड़. खासकर लद्दाख में ठंड में जैसे विषम हालात होते हैं, उसमें ट्रेनिंग के बाद सैनिक दुनिया के किसी भी हिस्से में ऊंची से ऊंची जगह पर जाकर लड़ाई कर सकते हैं. यही वजह है कि अपने अफसरों को भारत में गुलमर्ग के High Altitude Warfare School (HAWS) भेजते हैं ताकि ऊंचाई पर बर्फीले मौसम में लड़ाई की प्रैक्टिस हो सके.

    पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.