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क्या दंगे कराना और भड़काना वाकई आसान है, कौन होता है इसके पीछे

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: February 26, 2020, 1:19 PM IST
क्या दंगे कराना और भड़काना वाकई आसान है, कौन होता है इसके पीछे
दिल्‍ली में कुछ इलाकों में दंगे के बाद स्थिति तनावपूर्ण है

दिल्ली के कई इलाके इन दिनों दंगों की आग में झुलसे हुए हैं. करीब 20 लोगों के मारे जाने और कई के घायल होने की खबर है. दंगों पर कुछ पुलिस अधिकारियों ने किताबें लिखी हैं या रिसर्च किए हैं. समय-समय पर उन्होंने दंगों को लेकर जो विचार जाहिर किए हैं, वो यहां पेश हैं

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  • Last Updated: February 26, 2020, 1:19 PM IST
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दिल्ली इस समय दंगों की आग में झुलस रही है. उत्तरी दिल्ली के कई इलाके बारूद के ढेर पर बैठे लग रहे हैं. भजनपुरा, मौजपुरा, जाफराबाद, सीलमपुर आदि इलाकों में हिंसा से 18 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. हिंसाग्रस्त इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया है. कई जगह अर्धसैन्य बल गश्त तैनात कर दिए गए हैं.

दिल्ली के लोग इसके लिए सियासत को दोषी ठहरा रहे हैं. ये कहा जा रहा है कि ये दंगे जानबूझकर कराए गए या ऐसे हालात पैदा हुए कि दंगा भड़क उठा.  क्या वाक़ई कहीं भी दंगे करवाना और भड़काना इतना आसान है?

वैसे हमारे देश में मामूली बातों पर दंगा भड़कने का पुराना इतिहास रहा है. बंगाल और केरल से अक्सर दंगों की खबरें आती हैं. देश के दूसरे इलाके भी इससे अलग नहीं हैं. दिल्ली में भी पिछले साल दंगे की स्थितियां पैदा हो गईं थीं.

हालांकि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के रिकॉर्ड्स कहते हैं कि वर्ष 2017 में अचानक सांप्रदायिक दंगों की संख्या में बढोतरी हुई थी लेकिन उसके बाद इसमें कमी आई है. लेकिन हाल के कुछ दिनों में देश में कई इलाकों में हिंसा और दंगा की खबरें आती रही हैं.



क्या कहते हैं आंकड़ें?
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) मुताबिक 2017 में भारत में 90,394 दंगे दर्ज हुए थे, जिसमें 723 को सांप्रदायिक माना गया. अगर वर्ष 2017 के पूरे आंकड़ों को देखिए तो औसत तौर पर रोज हर तरह दंगे के 161 मामले हुए और रोज 247 लोग उनके शिकार बने.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) मुताबिक 2017 में भारत में 90,394 दंगे दर्ज हुए थे, जिसमें 723 को सांप्रदायिक माना गया.


पूरे आंकड़एनसीआरबी के मुताबिक भारत में साल 2000 से 2013 के बीच हर साल औसतन 64,822 दंगे हुए हैं. हालांकि लोकसभा में सरकार ने खुद एक सवाल के जवाब में बताया वर्ष 2017 के खत्म होते होते 2920 सांप्रदायिक घटनाएं हुईं, जिसमें 389 लोग मारे गए तो 8890 घायल हो गए. गृह मंत्रालय ने ये जानकारी लोकसभा में 06 फरवरी 2018 में दी.

संसद में दंगों को लेकर हुई बहस में गृह मंत्रालय को ओर से बताया गया कि ज्यादातर सांप्रदायिक दंगे सोशल मीडिया पर आपत्ति जनक पोस्ट, लिंग संबंधी विवादों और धार्मिक स्थान को लेकर हुए हैं.

दंगे कराए जाते हैं
भारत में दंगों और उसके कारणों को लेकर बहुत ज्यादा शोध नहीं हुए हैं. लेकिन जो रिसर्च हुई हैं, उसमें माना गया है कि ये शोध इसलिए कम होते हैं, क्योंकि इनके सही आंकड़े नहीं मिल पाते और ये मामले कोर्ट में लंबे समय तक चलते हैं.

पूर्व आईएएस अफ़सर और सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने कुछ समय पहले एक इंटरव्यू में कहा था, दंगे कभी अपने आप नहीं होते. उन्होंने कहा था, "मैं सामाजिक हिंसा का अध्ययन पिछले कई सालों से कर रहा हूँ और यह बात पक्के तौर से कह सकता हूँ कि दंगे होते नहीं पर करवाए जाते हैं. मैंने बतौर आईएएस कई दंगे देखे हैं. अगर दंगा कुछ घंटों से ज़्यादा चले तो मान लें कि वह प्रशासन की सहमति से चल रहा है."

कई पूर्व आईपीएस अफसरों ने दंगों पर किताबें लिखी हैं और प्रशासन के साथ पुलिस पर भी सवाल उठाए हैं


दंगा कराने के लिए तीन चीजें जरूरी हैं 
उनका कहना था, "दंगे करवाने के लिए तीन चीज़ें बहुत जरूरी है. नफ़रत पैदा करना, बिल्कुल वैसे जैसे किसी फैक्टरी में कोई वस्तु बनती हो. दूसरा, दंगों में इस्तेमाल होने वाले हथियारों को बांटना. ईंट-पत्थर फेंक कर तनाव बनाना. तीसरी बात ये भी है कि इसमें कहीं ना कहीं पुलिस भी जिम्मेदार होती है.

क्या कहती हैं पूर्व पुलिस अफसरों की किताबें 
जाने-माने पूर्व आईपीएस अफ़सर जुलियो रिबेरो और विभूति नारायण राय ने भी दंगों में पुलिस की भूमिका को लेकर सवाल उठाए हैं.

पूर्व आईपीएस अफ़सर सुरेश खोपड़े ने दंगों से ही संबंधित एक किताब 'मुंबई जल रहा था पर भिवंडी क्यों नहीं' लिखी है. उन्होंने कुछ साल पहले बीबीसी से एक इंटरव्यू में कहा था, "भारत में पुलिस बल में सिर्फ चार फ़ीसदी मुसलमान हैं और बाक़ी के 96 फ़ीसदी में कई लोग सांप्रदायिक सोच वाले होते हैं लेकिन दंगे न रुक पाने के कारण कुछ और हैं."
उन्होंने कहा, "इतने दंगों के बावजूद किसी भी सरकार ने पुलिस बल को ऐसे मामले रोकने के लिए सशक्त नहीं किया. भिवंडी में दंगे आम बात हो गई थी. जब मेरी वहां पोस्टिंग हुई तो मैंने मोहल्ला कमेटी बनाई और पुलिस कॉन्स्टेबल को उनका अध्यक्ष रखा."

Security personnel conduct a flag march during clashes in Northeast Delhi on Tuesday
विभूति नारायण राय ने अपनी किताब सांप्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस में कहा है, सांप्रदायिक दंगों को प्रशासन की एक बड़ी असफलता के रूप में लिया जाना चाहिए


विभूति नारायण राय की किताब
विभूति नारायण राय ने अपनी किताब सांप्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस में कहा है, सांप्रदायिक दंगों को प्रशासन की एक बड़ी असफलता के रूप में लिया जाना चाहिए. पुलिस में काम करने वाले लोग उसी समाज से आते हैं जिसमें सांप्रदायिकता के विषाणु पनपते हैं, उनमें वे सब पूर्वग्रह, घृणा, संदेह और भय होते हैं जो उनका समुदाय किसी दूसरे समुदाय के प्रति रखता है. पुलिस में भर्ती होने के बावजूद वे खुद को अपने ‘सहधार्मिकों’ के ‘हम’ में शामिल रखते हैं और दूसरे समुदाय को ‘वे’ मानते रहते हैं.
भारतीय पुलिस सेवा में उच्च पद पर रह चुके राय ने दंगों पर ही आधारित एक उपन्यास शहर में कर्फ्यू भी लिखा. जिसमें उन्होंने ये दिखाने की कोशिश की किस तरह से सियासत के जरिए देश के दो बड़े धार्मिक तबकों में अविश्वास पैदा किया जाता है.

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First published: February 26, 2020, 1:19 PM IST
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