फर्स्ट ईयर वाले लड़के के लिए कैसा होता है डीयू इलेक्शन

यूनिवर्सिटी में आए नए स्टूडेंट्स को हर पार्टी अपना बना लेना चाहती थी. जहां राइट वालों की पार्टी में मुफ्त में शामिल हुआ जा सकता था, वहीं लेफ्ट के लिए 2 रूपए देने पड़ते थे.

News18Hindi
Updated: September 11, 2018, 3:19 PM IST
फर्स्ट ईयर वाले लड़के के लिए कैसा होता है डीयू इलेक्शन
यूनिवर्सिटी में आए नए स्टूडेंट्स को हर पार्टी अपना बना लेना चाहती थी. जहां राइट वालों की पार्टी में मुफ्त में शामिल हुआ जा सकता था, वहीं लेफ्ट के लिए 2 रूपए देने पड़ते थे.
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Updated: September 11, 2018, 3:19 PM IST
ये सितम्बर में कौन सा चुनाव होता है भैया? अरे डूसू का. दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन. पूरी यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट्स का यूनियन होता है. तुम्हारा भी तो है किरोड़ी में. हमारा तो नई हैं. मैं तो नहीं जाता चुनाव वुनाव में. अबे जाना क्या है? देखो दूर से बैठ के. पहला साल है तुम्हारा. मज़ा लो. देखो क्या होता है कैसे होता है. मार पिटाई तो हो रही है. चुनाव है तो कुटाई तो होगी ही न. वैसे ये खेल है. कुटाई होती है उधर बीएचयू में. चलो तुम देखो. मौज लो. चाय का पैसा दे दिया है.

मैं जिस प्राइवेट स्कूल से आया था वहां चुनाव वुनाव की बात नहीं होती थी. साइंस वालों को सर पे चढ़ाया जाता था और आर्ट्स वालों का मज़ाक उड़ता था. आर्ट्स इसलिए नहीं ली थी कि हमें कलेक्टर बनना था. आर्ट्स ली थी, क्योकि साइंस में फेल हो गए थे. अब फेल हो है थे तो आर्ट्स हाथ आई. आई तो पढ़ भी ली. पढ़ ली तो नंबर भी आ गए. नंबर आ गए तो डीयू में एडमिशन मिल गया. तब डीयू में न ही सेमेस्टर होता था और न ही सौ परसेंट कट ऑफ़ जाती थीं.  75 से 80 परसेंट लाकर रामजस-किरोड़ी-हंसराज में कुछ मिल ही जाता था. साल में एक बार एग्जाम होता था. एक ही बार चुनाव.

नए नए डीयू में आए थे. एग्जाम अभी बहुत दूर था. चुनाव सर पर. इतनी सफेदी एक साथ जीवन में कभी नहीं देखी थी जितनी डीयू के एक चुनाव में दिख गई. तब शायद टाइड का एडवर्टाइजमेंट नहीं आता था वर्ना इन सबको उसमें काम मिल जाता. बहुत सारे युवा नेता जो अभी जीतेन्द्र युग में जी रहे थे, वे सफ़ेद कपड़ों के साथ सफेद जूते भी पहन लेते थे.

युवा नेताओं के कपड़ों से लेकर सड़कें भी सफ़ेद, क्योंकि पर्चों की जो बारिश होती थी, उसे सडकों को ही झेलना होता था. खालसा कॉलेज से लेकर दौलत राम होते हुए किरोड़ीमल और हंसराज तक सड़क पर कागज़ी कालीन बिछा होता था.

कानफोड़ू संगीत, गालियों की बौछार, जगह जगह बैरिकेड और कैंपस में मैक्डोनाल्ड्स के मुफ्त बर्गर. अभी तक चुनाव यही था.

चुनाव लड़ कौन रहा था?

अगर इलेक्शन अफसर का परचा पढ़ा जाए तो चुनाव डीयू के किसी भी कॉलेज से आने वाले प्रत्याशी लड़  रहे होते हैं लेकिन असल में चुनाव लड़ रहे होते हैं राजनैतिक पार्टियों के उम्मीदवार, जिन्हें टिकट मिल जाता है.
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और राजनैतिक पार्टियां कौनसी? एक एक्सट्रीम राइट और एक सेंटर टू राइट और बाकी लेफ्ट, ज़्यादा लेफ्ट, कम लेफ्ट, थोड़ी लेफ्ट, पूरी लेफ्ट, अधूरी लेफ्ट, टूटी लेफ्ट और बची खुची लेफ्ट.



पार्टियों को देखते हुए जो समझ में आया वो ये कि जो एक्सट्रीम राइट और सेंटर टू राइट है उनमें कोई बहुत ज़्यादा फर्क नहीं है. वही सबके पास लम्बी लम्बी गाड़ियां. वही सबके एक जैसी दाढ़ी. सबकी कमीज एक दूसरे से ज़्यादा सफ़ेद. आवाज़ एक दूसरे से ज़्यादा तेज़. गालियां एक दूसरे से ज़्यादा बड़ी. चुनावी मुद्दे कुछ नहीं. वैसे भी चुनावी मुद्दों की किसको पड़ी है.

ये लोग न धरने में विश्वास करते थे, न भूख हड़ताल में और न डिबेट में. न ये किसी क्लास में जाकर सोशल जस्टिस का पाठ पढ़ते थे और न स्पीच देते थे. इनका चुनाव सड़क पर ही होता है. एक बात इनके बारे में जो अच्छी थी वो ये कि ये नहाते भी थे और कभी डिओडरेंट भी लगा लेते थे.

ये थे कई तरह के लेफ्ट वाले. दाढ़ी वाले. कुर्ते वाले. अंग्रेजी बोलने वाले. ओल्ड मॉन्क की बू वाले. बात करने वाले. बहुत बात करने वाले. भूख हड़ताल करने वाले. बहुत बार पिटने वाले भी. लेफ्ट वाले लेकिन बहुत सारे होते थे. हर स्टूडेंट पार्टी में 20 -25 लोग. कभी तो 50 भी.

यूनिवर्सिटी में आए नए स्टूडेंट्स को हर पार्टी अपना बना लेना चाहती थी. जहां राइट वालों की पार्टी में मुफ्त में शामिल हुआ जा सकता था, वहीं लेफ्ट के लिए दो रुपए देने पड़ते थे.

लेफ्ट वालों ने दो रुपए लेकर भी कभी दो पैसे की टॉफ़ी नहीं खिलाई. लेकिन राइट वाले बिना पैसा वैसा लिए खूब सेवा करते थे.

पहली बार दिल्ली आकर कमला नगर में जिस मैक्डोनाल्ड्स को देख सोचा था अच्छा यही वो मेरा नाम जोकर वाला मैक्डोनाल्ड्स है! वहां चुनाव में खड़े होकर ना जाने कितने बर्गर मुफ्त पैक करवाए.

मुफ्त यूं कि पैसे वाली पार्टियां स्टूडेंट्स को लुभाने के लिए खूब परपंच करती हैं. किसी दिन मैक्डोनाल्ड्स फ्री होता है तो किसी दिन पिज़्ज़ा हैट फ्री मतलब बिलकुल फ्री. उस दिन आप वहां जाकर जितना चाहे ठूस सकते हैं. ठूसने के बदले आपको वोट करना होता है.

उन ठूसने वालों की लाइन में हम भी थे. वहां खड़े होकर ये नहीं सोचा जाता कि आप लेफ्ट हैं या राइट. वहां यह तय करना होता है कि चिकन मक ग्रिल मील के साथ कोक लूं  या कोल्ड कॉफ़ी.

कॉलेज फर्स्ट ईयर के दूसरे ही महीने में, जब आइडियोलॉजी चीज़ क्या है, ये नहीं समझ आ रहा होता. आइडियोलॉजी कोल्ड कॉफ़ी में फंस के रह जाती है.

फर्स्ट ईयर वाले बेचारे जहां कोल्ड कॉफ़ी में काम चला रहे होते हैं वहीं, होस्टलर और थर्ड ईयर वालों के लिए बड़ा इंतेज़ाम होता है. हॉस्टल के कमरों तक क्वार्टर और अद्धे पहुंच जाते हैं.

यह कोई नहीं पूछता कि कौन किसको पिला रहा है लेकिन सब बस पी रहे होते हैं. आम जनता के लिए ऐसा ही होता है चुनाव.

जिस दिन चुनाव का रिजल्ट आना होता है, उस दिन सब पढ़े लिखे झंडा उठाने वाले क्रांति की बात करने वाले लोग यह कह कर अपने कमला नगर -विजय नगर के फ्लैट में पड़े रहते हैं कि 'दीज़ गुंडा'स विल एनीवे विन याS..'

और फिर जब ये 'गुंडे' जीत जाते हैं तो बाकी लोग फिर क्रांति करने निकल पड़ते हैं. यही चक्र साल दर साल चलता रहता है.
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