Chittaranjan Das Death Anniversay: बहुत नाजुक मोड़ देश को छोड़ गए थे देशबंधु

देशबंधु (Deshbandhu) ने वकालत से लेकर जीवन के हर मोर्चे पर देशभक्ति का परिचय दिया.(तस्वीर: Wikimedia Commons)

Chittaranjan Das Death Anniversay: देशबंधु (Deshbandhu) ने एक तरफ देशवासियों को अपना मुरीद बनाया तो अंग्रेजों (Britishers) की नाक में दम भी कर रखा था.

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    भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन (Indian Freedom Movement) के इतिहास की जानकारी रखने वालों में शायद ही ऐसा कोई होगा जो देशबंधु चितरंजन दास (Chittaranjan Das) से परिचित ना होगा. वे एक बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्तित्व वाले राजनीतिज्ञ, वकील कवि और पत्रकार थे और उससे भी ज्यादा वे एक महान स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जाने जाते हैं. उन्होंने अपने सिद्धांतों के आगे कभी समझौता नहीं किया लेकिन गांधी जी से प्रभावित होने पर अपनी सारी जायदाद दान कर खुद को देश के लिए समर्पित कर दिया. कहा जाता है कि अगर वे कुछ समय और जिंदा होते अंग्रेजों को भारत (India) पर राज करना और मुश्किल हो जाता.

    वकालत का पेशा
    चितरंजन दास का जन्म 5 नवंबर 1870 को कोलकाता में हुआ था. उनके पिता भुबन मोहन दास कोलकाता उच्च न्यायालय के जाने माने वकील थे. चितरंजन दास भी अपने पिता की तरह बहुत काबिल वकील थे. उन्होंने 1890 में कोलकाता प्रेसिडेंसी कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की और आईसीएस की तैयारी भी की लेकिन उन्होंने वकालत को ही अपना पेशा चुना और लंदन वकालत की पढ़ाई की और स्वदेश लौटकर कोलकाता उच्च न्यायालय में ही वकालत शुरू कर दी.

    वकालत की शोहरत
    देशबंधु ने उन भारतीयों का मुकदमा लड़ा जिन पर राजनैतिक अपराधों का आरोप था. उन्होंने 1908 में अलीपुर बम मामले में अरविंद घोष की पैरवी की थी और उसके बाद मानसिकतलगा बाग षड़यंत्र ने उन्हें कोलकाता उच्च न्यायालय में बड़ा सम्मान दिलाया. इन मुकदमों के कारण देशभर में उनकी ख्याति फैल गई. क्रांतिकारियों और राष्ट्रवादियों के मुकदमों में वे अपना पारिश्रमिक नहीं लेते थे.

    देशबंधु की उपाधि
    चितरंजन दास ब्रह्म समाज के कट्टर समर्थक रहे थे. वे एक कुशल पत्रकार के तौर पर भी जाने जाते थे. लेकिन चितरंजन दास 1917 में पूरी तरह से राजनीति में आए और कहा जाता है कि एनीबेसेंट को अध्यक्ष बनाने में उनकी अहम भूमिका था. देशबंधु का राजनैतिक जीवन बहुत छोटा था.  गांधी के असहयोग आंदोलन के दौरान गांधी से प्रभावित हुए और उन्होंने वकालत छोड़कर अपनी सारी संपत्ति मेडिकल कॉलेज को दान कर दी जिसके बाद से देशबंधु कहे जाने लगे.

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    गांधी से प्रभावित होकर चिरंजन दास (Chittaranjan Das) अपनी सारी संपत्ति दान कर दी थी. (तस्वीर: Wikimedia Commons)


    छोड़ दी आलीशान जिंदगी
    गांधी जी के प्रभाव से राजनीति में आने के बाद उन्होंने अपना विलासी जीवन छोड़कर कांग्रेस का प्रचार करने के लिए पूरे देश का भ्रमण करने निकल पड़े. इसके बाद वे कलकत्ता नगर प्रमुख भी बने जहां उन्हें सुभाष चंद्र बोस का साथ मिला जो उन्हें गुरुतुल्य मानते थे. इस दौरान हिंदु मुसलमानों के बीच एक तारतम्य स्थापित कर और भी लोकप्रिय हो गए.

    जेल में रहते बने कांग्रेस अध्ययक्ष
    उन्होंने असहयोग आंदोलन में कॉलेज छोड़े हजारों विद्यार्थियों की शिक्षा के के लिए ढाका में राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की. असहयोग आंदोलन में देशबंधु सपत्नीक गिरफ्तार हुए और उन्हें छह महीने की सजा हुई. 1921 में जब देशबंधु जेल थे उन्हें अहमदाबाद अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष चुन गया.

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    चिरंजन दास (Chittaranjan Das) स्वतंत्रता सेनानियों से उनके मुकदमे के पैसे नहीं लेते थे. (तस्वीर: Wikimedia Commons)


    फिर स्वराज पार्टीकी स्थापना
    जेल से छूटने के बाद उन्होंने बाहर से आंदोलन करने के बजाए परिषदों के भीतर देश विरोधी नितियों के खिलाफ काम करने की नीति कि पैरवी की जिसका प्रस्ताव पास नहीं किया गया और देशबंधु अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देकर कॉन्ग्रेस में ही स्वराज पार्टी की स्थापना की. 1923 को कांग्रेस ने उनकी नीति को स्वीकार किया.

    1925 में उनका स्वास्थ्य बिगड़ा  और वे स्वास्थ्य लाभ के लिए दार्जलिंग चले गए लेकिन उनका स्वास्थ्य बिगड़ता ही गया और 16 जून 1925 को तेज बुखार के कारण उनका निधन हो गया. इस समय स्वराज पार्टी की लोकप्रियता बहुत ज्यादा थी और उन्होंने अंग्रेजों की नीतियों को प्रभावित करना भी शुरू कर दिया था. लेकिन देशबंधु के जाने से देश के स्वतंत्रता आंदोलन में एक बड़ा रिक्त स्थान बन गया.

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