प्राकृतिक आवास नष्ट किए, इसलिए महामारी वाले संक्रमण आए इंसान के नजदीक-शोध

प्राकृतिक आवास नष्ट किए, इसलिए महामारी वाले संक्रमण आए इंसान के नजदीक-शोध
इंसान ने तेजी से जंगल मिटाए इसी वजह से संक्रमित जानवरों से बीमारियां इंसानों में फैलने लगी. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 8, 2020, 4:47 PM IST
  • Share this:
दुनिया में कोरोना वायरस (Corona Virus) के प्रकोप ने काफी कुछ बदल दिया है. इस एक महामारी (Pandemic) ने इंसान को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अभी बहुत कुछ ऐसा है जो यह साबित करता है कि इंसान की प्रकृति को जीतने की कोशिश कितनी बेकार है. कोरोना वायरस को लेकर हो तमाम शोधों में से कुछ ऐसे हैं जो इंसान की प्रकृति के साथ किए गए खिलवाड़ और उसके नुकसान को उजागर कर रहे हैं. ऐसे ही एक शोध में पाया गया है कि इंसान के प्राकृतिक आवास (Natural Habitat) को नष्ट करने से महामारी फैलाने वाले संक्रमण इंसान के ज्यादा करीब आ गए हैं.

बढ़ता गया इंसान का दखल
सदियों से इंसान विकास और अन्य बहानों से पर्यावरण में बदलाव करता है. पुराने जमाने लोग प्राकृतिक आवास में रहने से खुश रहते थे और जीवन के दूसरे रूपों के साथ रहना पसंद भी करते थे. सुविधाओं और आवश्यताओं के बढ़ने के साथ ही इंसान की घर और ज्यादा जगह बनाने की मांग बढ़ती गई. और उसका प्रकृति में दखल बढ़ता गया.

ग्लोबल वार्मिंग के अलावा यह बड़ा नुकसान
इन गतिविधियों के चलते बहुत सारा प्राकृतिक आवास का क्षेत्र नष्ट होने लगा. इस तरह की गतिविधियों ने पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचा. इससे वैश्विक तापमान बढ़ा (Global Warming).  ताजा शोध में दावा किया गया है कि इससे बीमारी पैदा करने और उनको फैलाने वाली जीवाणु (Pathgens) हमारी जिंदगी के करीब आ गए.



क्या पता चला शोध में
यूके की यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं की टीम ने पाया है कि प्राकृतिक आवास के मुकाबले इंसान के द्वारा संचालित पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) अन्य जीवों से इंसान तक पहंचने वाली बीमारियों के लिए दरवाजे साबित हुए हैं. नेचर में प्रकाशित इस अध्ययन में इन बीमारीयों के कारण हुए नुकसान और प्राकृतिक आवास की भूमि के उपयोग और संरक्षण योजना में हुए खर्चे की भी तुलना की गई.

फोटो साभारः Twitter/WildLenses
मानवीय दखल के कई जानवर बार बार इंसान के संपर्क में आने लगे. फोटो साभारः witter/WildLenses)


जानवरों से इंसान में आने लगीं बीमारियां
इस अध्ययन के मुताबिक, जूनोटिक यानि कि पशुजन्य बीमारियां (Zoonotic disease), जिनमें इबोला, लासा फीवर, लिमे, आदि उन रोगाणुओं (Pathogens) से होती हैं जो जानवरों से इंसान में आए थे. इन रोगाणु को लेकर ये प्राणी इंसान के पास आए क्योंकि हमने ही भूमि उपयोग के स्वरूप में बदलाव किए.

शिकारी जानवरों के मुकाबले जल्दी विलुप्त होने का खतरा है इस तरह के जीवों को

कैसे किया गया अध्ययन
इस अध्ययन के लिए शोधकर्ता केट जोन्स और उनके साथियों ने दुनिया भर के 6, 801 पारिस्थितिकी तंत्रों और 376 होस्ट (मेजबान) प्रजातियों का अवलोकन किया. उन्होंने पाया कि जिस तरह से हमने जमीन का उपयोग किया है, उसका पूरी दुनिया में स्थानीय स्तर जूनोटिक होस्ट समुदायों पर पड़ सकता है.

इन जानवरों पर हुआ सबसे बुरा असर
इसमें सबसे ज्यादा बुरा असर कुतरने वाले जानवर, चमगादड़, गैरेया जैसे पक्षियों की प्रजातियों पर पड़ा है. यह मोटे तौर पर माना जा रहा है कि कोविड-19 की महामारी भी चमगादड़ों से इंसान में आई है. यहां तक कि एड्स को मूल स्रोत कई लोगों द्वारा वन्यजीवों से माना जाता है.

Rats
प्राकृतिक आवास के नष्ट होने से चूहों सहित बहुत से प्रजातियों पर बुरा असर पड़ा. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


इन इंसानी गतिविधियों ने भी दिया योगदान
प्रकृति के कई प्राणियों की मनुष्य के साथ अंतरक्रिया का कारण मानव का न केवल प्राकृतिक आवास नष्ट कर अधिक भूमि का उपयोग करना है, बल्कि खुद भी इन आवासों में पहुंचना भी है . जंगलों के बीच में से रास्ता बनाना, दर्शनीय स्थालों को नाम पर इन जगहों को पिकनिक स्पॉट जैसी जगहों में तब्दील कर देना ऐसी अनेक गतिविधियां हैं जिनसे बहुत से वन्य प्राणियों के जीवन में दखल हुआ. इतना ही नहीं कई जानवरों को पकड़ कर उनका दुरुपयोग करना भी ऐसे कारकों में शामिल हैं जिससे ऐसे नुकसान हुए.

बीमार होने पर Vampire चमगादड़ भी खुद को कर लेते हैं Isolate, जानिए इसकी वजह

इस शोध में कहा गया है कि अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि भूमि उपयोग में तेजी से हुए वैश्विक बदलाव ने इंसान और आसपास के पालतु और पशुजन्य बीमारियों वाले वन्यजीवों  के साथ खतरनाक अंतरक्रिया को जन्म दिया है.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज