सबरीमाला जाने वाले श्रद्धालुओं को करने होते हैं ये पांच कठिन काम

सबरीमाला जाने वाले श्रद्धालुओं को करने होते हैं ये पांच कठिन काम
सबरीमाला मंदिर में श्रद्धालु (फाइल फोटो)

सबरीमाला में दर्शन करने के लिए आने वाले श्रद्धालुओं से अपेक्षा की जाती है कि वो 41 दिनों तक ये काम करें.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 2, 2019, 11:24 AM IST
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सबरीमाला सबसे मुश्किल तीर्थ स्थान है. यह मंदिर वार्षिक पूजा के लिए मध्य नवंबर से तीन महीने के लिए खोला जाता है. वहीं हर महीने यहां पांच दिनों की मासिक पूजा भी होती है. वार्षिक पूजा के लिए मंदिर तक जाने की प्रक्रिया बेहद कठिन होती है. इसकी तैयारी 41 दिन पहले ही शुरू हो जाती है. इसके लिए श्रद्धालुओं को न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक तौर पर भी फिट होना होता है.

पहला काम - वार्षिक दर्शन से पहले श्रद्धालुओं को 41 दिन का व्रतम (उपवास) करना होता है. ये व्रतम आमतौर पर मध्य नवंबर (मलयालम कैलेंडर के अनुसार वृश्चिकम के पहले दिन) शुरू होता है.

दूसरा काम - व्रत के दौरान श्रद्धालु किसी सामाजिक गतिविधि में हिस्सा नहीं ले सकता है. उसे अपना समय प्रार्थना और भजन गाते हुए गुजारना चाहिए. इस दौरान मंदिरों में जाना चाहिए, उनकी सफाई करनी चाहिए, गरीब और बीमार लोगों की मदद करनी चाहिए.



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तीसरा काम - उसे जमीन पर सोना चाहिए. तकिए की जगह लकड़ी के ब्लॉक का इस्तेमाल करना चाहिए. नंगे पैर ही चलना चाहिए.

सबरीमाला मंदिर में जाने से पहले 41 दिनों का व्रतम करना होता है


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चौथा काम - उसे अपने शरीर और बालों में तेल नहीं लगाना चाहिए. हमेशा अपने साथ तुलसी की पत्ती रखनी चाहिए ताकि गलत विचार उसके आसपास भी नहीं फटक सकें.

पांचवां काम - व्रत के दौरान श्रद्धालु को केवल शुद्ध शाकाहारी भोजन ही करना चाहिए. किसी तरह की शारीरिक या मौखिक हिंसा नहीं करनी चाहिए. शराब, तंबाकू और अन्य मादक वस्तुओं का किसी भी तरीके से इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

सबरीमाला जाने के लिए आठ किलोमीटर का पैदल कठिन रास्ता भी तय करना होता है, जो पहाड़ियों और जंगलों से गुजरता है


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मंदिर का आठ किमी का पैदल रास्ता
मंदिर में दर्शन के लिए पहाड़ों और जंगलों के बीच से श्रद्धालुओं को आठ किलोमीटर का रास्ता पैदल चलना होता है. इसमें संकरे और मुश्किल पहाड़ी रास्तों से भी गुजरना होता है. हालांकि इस रास्ते को हाल के दिनों में बेहतर किया गया है. अब रास्ते में मेडिकल और इमरजेंसी मदद उपलब्ध रहती है. लेकिन रास्ता तय करना अब भी आमतौर पर अब भी मुश्किल है.

ड्रेस कोड - श्रद्धालुओं को यहां कपड़ों के रंगों के जरिए आसानी से पहचाना जा सकता है. उन्हें काले और नीले रंग की पोशाक पहननी होती है. सिर पर चंदन का लेप लगाना पड़ता है.

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बैग - मंदिर में आप एक खास थैला लेकर ही जा सकते है, ये कॉटन से बना होता है. इनके भी कलर कोड होते हैं. अगर श्रद्धालु लाल रंग का बैग लेकर चलता है, उसका मतलब ये है कि इस मंदिर में ये उसकी पहली यात्रा है. इसके बाद तीसरी यात्रा तक नीला रंग का बैग दिया जाता है. इससे और ज्यादा यात्राएं कर चुके लोगों को भगवा रंग के काटन के बैग दिए जाते हैं.

सबरीमाला मंदिर के अंदर श्रद्धालुओं की भीड़


प्रसादम - एक बार मंदिर परिसर में पहुंचने के बाद उनकी सारी परंपराएं फिर मंदिर में ही होती हैं. उन्हें मंदिर में स्वादिष्ट प्रसादम मिलता है, इसमें अर्वाना पयासम चावल, चीनी और गुड़ का बना होता है और अप्पम पीसे हुए चावल और नारियल के दूध का बना होता है.

लुल्लाबी - अगर श्रद्धालु मंदिर परिसर में देर तक रुकना चाहें तो वो मंदिर के दरवाजे बंद होने से ठीक पहले तक हरिवंशनम गाने का आनंद ले सकते हैं. इसे लुल्लाबी कहा जाता है. इसे श्री कांबांगुडी कुलातुर श्रीनिवास अय्यर ने कंपोज किया था. इसमें 32 लाइनों में केवल 108 शब्द हैं.

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मंदिर के आसपास के आकर्षण
पेरियार टाइगर रिजर्व
पास के ही टेकाडी कस्बे में पेरियार नेशनल पार्क है. ये बाघ और हाथियों का रिजर्व है. ये प्राकृतिक तौर पर बहुत सुंदर और विविध बॉयो डायवरसिटी से भरा है. अगर सबरीमाला जाएं तो जरूर जाना चाहिए.

सबरीमाला के पास आकर्षक स्थलों में पेरियार लेक भी है, जो बहुत खूबसूरत और प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर है


पेरियार लेक
ये झील टाइगर रिजर्व में ही है और इसका नजारा काफी सुंदर होता है. यहां वोटिंग का आनंद भी लिया जा सकता है.

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