संत घोषित की जाने वाली भारत की सिस्टर मरियम के बारे में क्या जानते हैं आप?

विकिपीडिया के अनुसार केरल में लगा सिस्टर मरियम का स्टैच्यू.

पहले ही संत घोषित की जा चुकीं मदर टेरेसा की तरह सिस्टर मरियम भी दीन हीनों के प्रति बेहद संवेदनशील थीं. जानिए क्यों सिस्टर मरियम को घोषित किया जा रहा है संत और कैसी थी उनके जीवन की तपस्या.

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    भारत से एक और महिला को संत का दर्जा प्राप्त होने जा रहा है. केरल (Kerala) की नन मरियम थ्रेसिया (Mariam Thresia) को रविवार को वेटिकन सिटी (Vetical City) में पोप फ्रांसिस (Pope Francis) संत की उपाधि देंगे. निधन के 93 साल बाद इस उपाधि से नवाज़ी जा रही सिस्टर मरियम को केरल में सामाजिक उत्थान के कामों के लिए जीवन समर्पित करने के कारण मदर टेरेसा की तरह माना जाता है.  कौन थीं सिस्टर मरियम? इन सवालों के जवाब में एक दिलचस्प कहानी जानें.

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    संत की उपाधि देने की घोषणा से पहले 1999 में सिस्टर मरियम को सम्माननीय एवं पूज्यनीय घोषित किया गया था और साल 2000 में उन्हें धन्य आत्मा भी कहा गया था. ये दोनों ही घोषणाएं पोप जॉन पॉल द्वितीय ने की थीं. केरल में जन्मीं सिस्टर मरियम को मृत्यपरांत संत घोषित किया जाएगा और यही एक बात है जो उन्हें मदर टेरेसा से अलग करती है. वैसे मदर टेरेसा और उनमें कई समानताएं भी रहीं.

    गरीबों के लिए दयाभाव
    केरल के धार्मिक लोग सिस्टर मरियम को उनके सामाजिक कामों के लिए याद करते हैं और बताते हैं कि वो गरीब या दीन हीन तबके के लिए बेहद संवेदनशील थीं. इस दयाभाव के कारण उनकी तुलना अक्सर मदर टेरेसा के साथ की जाती है. 26 अप्रैल 1876 को केरल के त्रिशूर जिले में जन्मीं सिस्टर मरियम 50 साल की उम्र में 8 जून 1926 को दुनिया छोड़ गई थीं लेकिन उनके किए काम आज भी याद किए जाते हैं और उनकी बनाई संस्था आज भी चल रही है.

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    सिस्टर मरियम के बारे में बताया जाता है कि वो पूरा दिन ध्यान और प्रार्थना में बिताने के साथ ही, चर्च की बलिवेदी की सफाई और सजावट में बिताया करती थीं. इसके साथ ही वो जीवन के अंतिम दिन तक गरीबों और बीमारों की सेवा भी करती रहीं. बिशप जोसेफ के मार्गदर्शन में उन्होंने ईसाई धर्म के जादू टोने भी सीखे थे और काफी समय तक उन्होंने इसका प्रयोग भी किया.

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    केरल में संत की स​माधि पर श्रद्धांजलि देते श्रद्धालु.


    लड़कियों की शिक्षा के लिए समर्पण
    सिस्टर मरियम ने होली फैमिली की एक धर्मसभा की स्थापना की थी. वेटिकन के एक दस्तावेज़ में उल्लेख है कि इस सभा के तत्वावधान में उन्होंने स्कूल, हॉस्टल, अध्ययन कक्ष, अनाथालय और कॉन्वेंट बनवाए और संचालित किए. चर्च के दस्तावेज़ कहते हैं कि लड़कियों की शिक्षा के लिए उनका विचार था कि इसी कर्म से उदारीकरण का शास्त्र बनाया जा सकता था.

    युवा लड़कियां उनकी सादगी, दयाभाव और पवित्रता को देखकर आकर्षित होती थीं. सिस्टर मरियम के दिवंगत होने के समय तक उनकी स्थापित की गई संस्था में 55 युवतियां सिस्टर बन चुकी थीं. साथ ही, 30 हॉस्टलर और 10 अनाथों की देखभाल का ज़िम्मा तब तक उनका था. 1914 में सिस्टर मरियम की स्थापित संस्था में अब 2 हज़ार से ज़्यादा नन और 200 नवदीक्षित हैं. ये संस्था अब भी स्कूलों, अस्पतालों, नर्सिंग स्कूलों, हॉस्टलों, मानसिक रोगियों के लिए देखरेख कक्षों, सामाजिक केंद्रों और होमियोपैथिक क्लीनिकों का संचालन कर रही है.

    जीवन एक तपस्या था
    कहा जाता है कि सिस्टर मरियम का जीवन पवित्रता, प्रार्थना और उपवास के इर्द गिर्द ही बीता. 10 साल की उम्र में उनके माता पिता उनकी शादी करना चाहते थे लेकिन उनके जीवन में एक दिव्य ज्ञान था. वो घर के बगीचे में इसलिए सोया करती थीं क्योंकि उनका मानना था कि 'जब जीसस सूली पर टंगे हुए हैं, तो मैं आराम से कैसे सो सकती हूं. उन्होंने 12 साल की उम्र में अपने परिवार को छोड़कर अपना जीवन दुखियों की सेवा के लिए समर्पित करने का निश्चय कर लिया था. 1909 में वो बिशप बन चुकी थीं.

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