Explained: मतदान के दौरान वोटर को राइट टू रिजेक्ट का हक मिल सके तो क्या बदलेगा?

सुप्रीम कोर्ट ने नोटा को लेकर चुनाव आयोग और केंद्र से कई बातें पूछी हैं (Photo- moneycontrol)

सुप्रीम कोर्ट ने नोटा को लेकर चुनाव आयोग और केंद्र से कई बातें पूछी हैं (Photo- moneycontrol)

फिलहाल वोटर्स के पास नोटा (NOTA) का अधिकार है, जिसके तहत मतदान करने पर भी कोई न कोई उम्मीदवार जीता हुआ ही मान लिया जाता है. वहीं राइट टू रिजेक्ट (right to reject) में सिरे से सारे उम्मीदवार खारिज हो जाएंगे और नए चेहरे आएंगे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 19, 2021, 9:32 AM IST
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चुनाव के दौरान अगर आपको अपने क्षेत्र में खड़ा कोई भी उम्मीदवार पसंद न हो तो आप क्या कर सकते हैं? इसके लिए निर्वाचन आयोग ने मतदान प्रणाली में ऐसा बंदोबस्त किया कि लोग अपने इलाके में खड़े तमाम उम्मीदवारों को रिजेक्ट कर सकें. यही नोटा है. इसके तहत एक विकल्प होता है- नन ऑफ द एबव यानी इनमें से कोई नहीं, लेकिन नोटा के बाद भी चुनाव खारिज नहीं होता है, बल्कि नोटा के बाद जिसे सबसे ज्यादा वोट मिले, उसे विजेता मान लिया जाता है. हालांकि अब नियम बदल सकता है.

कुछ दिनों पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने नोटा को लेकर चुनाव आयोग और केंद्र से कई बातें पूछी हैं. नोटिस देकर अदालत ने पूछा है कि अगर किसी निर्वाचन क्षेत्र में ज्यादातर लोग चुनाव के समय NOTA का बटन दबाते हैं, तो क्या उसका चुनाव रद्द होना चाहिए और नए सिरे से चुनाव कराया जाना चाहिए? दरअसल इस मुद्दे को उठाने की वजह एक याचिका है, जिसमें याचिकाकर्ता ने मांग की है कि अगर किसी क्षेत्र में नोटा के पक्ष में सबसे ज्यादा वोट आएं तो वहां किसी उम्मीदवार को विजयी घोषित करना स्थानीय लोगों के मतदान का अपमान है.

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याचिका के तहत मांग की गई कि नोटा में सबसे ज्यादा वोट पड़ने पर उस इलाके के सारे कैंडिडेट्स को खारिज कर दिया जाए और दोबारा चुनाव हों. न केवल इतना, बल्कि याचिकाकर्ता ने ये भी कहा कि दोबारा चुनाव के दौरान ये तय हो सके कि एक बार रिजेक्ट हो चुके उम्मीदवार दोबारा टिकट न ले सकें. बल्कि उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाए.

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नोटा से अलग राइट टू रिजेक्ट को लेकर कई बार बात हो चुकी है- सांकेतिक फोटो

इसके पीछे दलील दी गई कि ऐसा करने पर पार्टियों पर बेहतर से बेहतर उम्मीदवार उतारने को लेकर दबाव रहेगा. कोई भी पार्टी नोटा का हल्के में नहीं ले सकेगी कि रिजेक्ट होने के बाद भी आखिरकार तो जीतना ही है. साथ ही इससे जनता को चुनने की पूरी-पूरी ताकत मिल सकेगी.

इस तर्क पर सर्वोच्च न्यायालय ने कई सवाल भी उठाए. जैसे अगर चुनाव में खड़े सारे कैंडिडेट रिजेक्ट हो जाएं तो संसद या विधानसभा कैसे तैयार हो सकेगी! इसके लिए भी याचिका में तर्क थे. कहा गया कि अगर एक बार नोटा के पक्ष में सबसे ज्यादा वोट पड़े तो कुछ समय के भीतर ही दोबारा चुनाव हों, जिसमें सारे के सारे उम्मीदवार नए हों क्योंकि उन लोगों को दोबारा खड़े करने का कोई मतलब नहीं, जो पहले ही जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर सके.



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चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता में तीन जजों के पैनल ने इस जनहित याचिका पर सुनवाई की. इसके बाद ही केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस भेजकर इसपर जवाब मांगा गया. इसे राइट टू रिजेक्ट कहा जा रहा है, जो जनता की मनःस्थिति और मांग को नोटा से कहीं ज्यादा साफ तरीके से रख सकेगा.

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चुनाव आयोग ने चुनावी संहिता में बदलाव की बात करते हुए नोटा की बजाए राइट टू रिजेक्ट नियम की बात की थी- सांकेतिक फोटो

नोटा के आने के चलते राजनैतिक पार्टियों पर बेहतर उम्‍मीदवार उतारने का दबाव बढ़ा. हालांकि तब भी इससे खास फर्क नहीं आ सका क्योंकि नोटा के बाद भी दूसरे नंबर पर जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलें, वो उम्मीदवार जीत ही जाता है. जैसे अगर किसी क्षेत्र में कुल 1000 वोट पड़े. इनमें से 900 भी नोटा में गए और केवल 100 बाकी रहे तो भी जिसके पक्ष में इन बचे हुए मतों में से सबसे ज्यादा वोट होंगे, वही जीता माना जाएगा.

राइट टू रिजेक्ट से हालात बदल सकते हैं. फिलहाल पार्टियों से नाराज लोग मतदान के समय नोटा दबाते हैं तो बहुतेरे ऐसे भी होते हैं जो नाराजगी के कारण वोट डालने ही नहीं जाते क्योंकि उन्हें पता है कि नोटा दबाने के बाद भी कोई न कोई कैंडिडेट तो जीतेगा ही. वहीं अगर राइट टू रिजेक्ट भी चुनाव में एक शक्ल ले सके तो हालात काफी बदलेंगे. एक बार रिजेक्ट हुए लोग दूसरी बार चुनाव में उम्मीदवारी नहीं जता सकेंगे. इससे पार्टियों पर सबसे बढ़िया कैंडिडेट लाने और एजेंडा साफ रखने का दबाव रहेगा.

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नोटा से अलग राइट टू रिजेक्ट को लेकर कई बार बात हो चुकी है. साल 1999 में विधि आयोग ने इस तरह की बात करते हुए कहा था कि उसी कैंडिडेट को जीता माना जाए, जिसका वोट कुल मतों में 50 प्रतिशत से ज्यादा हो. इससे ज्यादा से ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व दिखेगा. साल 2004 में चुनाव आयोग ने चुनावी संहिता में बदलाव की बात करते हुए भी नोटा से ज्यादा तीखे राइट टू रिजेक्ट नियम की बात की थी, हालांकि इसपर कभी कुछ हो नहीं सका.

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