विचारों में बदलाव को पहचानने में मिली सफलता, जानिए क्या होगा इससे फायदा

विचारों में बदलाव को पहचानने में मिली सफलता, जानिए क्या होगा इससे फायदा
विचारों में बदलाव की पहचान शोधकर्ताओं के लिए बहुत मददगार साबित होगी. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

वैज्ञानिकों ने दिमाग (Brain) में एक विचार (Thought) के बाद दूसरे विचार आने की स्थिति की पहचान करने में सफलता पाई है.

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इंसान का मस्तिष्क (Brain) वैज्ञानिकों के लिए आज भी सबसे बड़ी चुनौती है. दिमाग के बहुत से रहस्यों से इंसान अनजान है. फिर भी शोधकर्ता इसके रहस्य की परतों को हटाने में लगे हैं. ऐसी एक परत हटाने में शोधकर्ताओं को सफलता मिली है. उन्होंने हमारे दिमाग के विचारों (Thoughts) में बदलाव होने की प्रक्रिया में एक अहम पहचान की है.

क्या पता लगाया है शोधकर्ताओं ने
क्वीन यूनिर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क में ऐसे मार्कर के बारे में पता लगाया है जो विचारों के बदलाव की पहचान कर सकता है. इस आधार पर शोधकर्ताओं ने खोजा है कि रोज हमारे दिमाग में छह हजार से ज्यादा विचार आते हैं.

वैचारिक कीड़े यानि थॉट वार्म्स
शोधकर्ताओं ने पहली बार यह पता लगाने में सफलता पाई है कि एक विचार कब शुरू होता है और कब खत्म होता है. मनोविज्ञान के विशेषज्ञ डॉ डोर्ड पोपेंक और उनकी छात्रा जूली त्सेंग ने मिलकर ‘वैचारिक कीड़ों’ (Thought worms) को अलग करने की तरीका निकाला है. ये वैचारिक कीड़े उन निरंतर क्षणों से बनते हैं जब कोई व्यक्ति एक ही विचार पर ध्यान लगाता है.  यह शोध हाल ही में नेचर कम्यूनिकेशन्स में प्रकाशित हुई है.



क्या हैं वैचारिक कीड़े
कॉग्नेटिव न्यूरोसाइंस के कनाडा रिसर्च चेयर डॉ पोपेंक ने कहा, “थॉट वार्म मस्तिष्क की गतिविधि पैटर्न के एक सरलतम प्रारूप में दो पास के बिंदु हैं. हमारा दिमाग हर समय इस अवस्था में अलग अलग बिंदु पकड़ता है. जब कोई व्याक्ति एक विचार से दूसरे नए विचार पर जाता है. तो दिमाग एक नया वैचारिक कीड़ा बनाता है जिसकी हम अपनी पद्धतियों से पहचान कर सकते हैं.”

वर्ल्ड ब्रेन ट्यूमर डे
यह तकनीक विचारों में बदलाव की दर की भी पहचान कर सकती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


वैचारिक बदलाव से गहरा संबंध
उन्होंने बताया, “हमन यह पाया कि ये वैचारिक कीड़े बिलकुल वैसे ही उभरते हैं जैसे मूवी देखते समय उसमें कोई नई घटना सामने दिखाई देती है. इसके बारे में जानने से हमें यह पता चला कि नए वैचारिक कीड़े का सामना आने का वैचारिक बदलाव (Thought transition) से संबंध है.

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वैचारिक बदलाव की समस्या
डॉ पोपेंक के अनुसार, “वैचारिक बदलाव (Thought transition) विचारों पर हुए शोध के इतिहास में शुरू से ही भ्रामक रहे हैं. इससे पहले ये विचार, उस प्रतिभागी की व्याख्या पर निर्भर करते थे जिसका कि वह विचार है. यह तरीका कतई विश्वस्नीय नहीं है. नए विचार को मापने की क्षमता मिलने से अब दिमाग के उन विचारों के समय और गति के बारे में जाना सकेगा जिनके बारे में हमें पता नहीं चल सकता जैसे की कोई ‘दिन में देखा गया सपना’ या फिर खुद तक सीमित रखे जाने वाले अन्य विचार.

पहले होती थी यह परेशानी
पिछले 15 सालों से शोधकर्ताओं ने कॉग्वेटिव न्यूरोसाइंस में काफी तरक्की की है. इसमें वे ब्रेन इमेजिंग की तकनीक का प्रयोग कर यह जानने की कोशिश करते हैं कि किसी समय व्यक्ति क्या सोच रहा है. इसके लिए वे दिमाग के पहले पता किए हुए टैम्पलेट की तुलना दिमाग की गतिविधि के इमेजिंग से करते थे. लेकिन इस प्रक्रिया में काफी समय लगता है और यह बहुत खर्चीली भी है.  इस वजह शोधकर्ता केवल सीमित विचारों का ही अध्ययन कर पाते हैं.

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कॉग्नेटिव न्यूरोसाइंस के लिहाज से यह बहुत उपयोग तकनीक है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


तो शोधकर्ताओं ने लगाया यहां ध्यान
डॉ पोपेंक ने बताया, “हमें सफलता मिली क्योंकि हमने यह समझने की कोशिश करना छोड़ दिया कि व्यक्ति क्या सोच रहा है. इसके बजाय हमने इस बात पर ध्यान दिया कि वह एक विचार छोड़ दूसरे विचार पर कैसे जाता है.  हमारे तरीकों से यह पहचान करने में आसानी होगी कि व्यक्ति कब कुछ नया सोच रहा है. आप इसे ऐसे समझ सकते हैं कि हमने दिमाग की भाषा में शब्दों को छोड़ कर विराम चिन्हों को समझने की कोशिश की.”

कितनी उपयोगी है यह तकनीक
शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि उनकी खोज बहुत उपयोगी साबित हो सकती है. यह दूसरे अध्ययनकर्ताओं को यह जानने में मदद कर सकती है कि मरीज कितनी जल्दी विचार बदल रहा है. यह व्यक्ति की सोच विचार की सामान्य गति में बदलाव के बारे में बता सकती है. इससे कई और तरह से भी मदद मिल सकती है जैसे कि कॉफी पीने से हमारे विचारों की गति पर क्या और कैसा असर हो सकता है. या फिर हमारे विचार कैसे रहते हैं जब हम एक ही देखी हुई मूवी दोबारा देखते हैं. ऐसे कई तरह के अध्ययन के विषय हैं जहां यह तकनीक उपयोगी हो सकती है.

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यह शोध यह जानने में भी मदद कर सकता है कि कोई व्यक्ति एक विचार पर कितनी देर तक एकाग्र रह सकता है. यह तकनीक स्कीजोफ्रीनिया जैसी बीमारी में बुरे विचार आने के बारे में भी जानकारी दे सकती है. शोधकर्ता इस तकनीक को अपने आगे के शोधों में भी उपयोग करेंगे.
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