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हिमयुगों ने किया अफ्रीका के वर्षावनों का बिखराव, DNA ने बताया कैसे

हिमयुगों ने किया अफ्रीका के वर्षावनों का बिखराव, DNA ने बताया कैसे

मध्य अफ्रीका के वर्षावन (Rainforests) हिम युगों के कारण फैलते और सिकुड़ते रहे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

मध्य अफ्रीका के वर्षावन (Rainforests) हिम युगों के कारण फैलते और सिकुड़ते रहे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

अफ्रीकी वर्षावनों (African Rainforests) के अनुवांशकीय अध्ययन (Genetic Study) से पता चला कि इन वनों में बिखराव हिमयुगों (Ice Ages) के कारण आया था.

    पृथ्वी (Earth) के इतिहास के बारे में पड़ताल कर वैज्ञानिक कई सवालों के जवाब तलाशते हैं. एक तरफ पृथ्वी की जलवायु का इतिहास हमें यह जानकारी देता है कि आने वाले समय में हमें किस तरह के बदलाव देखने को मिलेंगे, वहीं जीवाश्मों के अध्ययन से वैज्ञानिक यह जानने का प्रयास करते हैं कि जलवायु और अन्य बदलावों ने कैसे जीवों के विकासक्रम को प्रभावित किया. लेकिन एक नए अध्ययन में इसकी ठीक उलटा देखने को मिला. शोधकर्ताओं ने जीवाश्मों के डीएनए का अध्ययन कर यह पता लगाया है कि कई हिमयुगों (Ice Ages) ने मध्य अफ्रीका के वर्षावनों (Central African rainforest) के आकार को बहुत हद कर प्रभावित किया था.

    संकुचित होकर बिखर गए वर्षावन
    एक्स्टर यूनिवर्सिटी के अध्ययन के अनुसार हिमयुगों की प्रभाव के कारण ही मध्य अफ्रीका के वर्षावन संकुचित होकर बिखर गए जिससे आज के सवाना घास के मैदान अस्तित्व में आ सके. अफ्रीका के वर्षा वन मध्य अफ्रीका का एक बहुत बड़ा भूभाग घेरते हैं. इस अध्ययन में एक्सेटर यूनिवर्सिटी के साथ केपनहेगन यूनिवर्सिटी, यूएलबी ब्रूसेल्स और क्यू के द रॉयल बॉटेनिक गार्डन्स के शोधकर्ताओं का भी योगदान था.

    अलग अलग जगह विकसित हुईं एक ही प्रजातियां
    शोधकर्ताओं ने की एक ही समय पर एक ही प्रजाति के दो अलग पूर्व जनसंख्याओं के अनुवांशकीय संकेतों की पहचान की जो जंगलों के बिखरकर उनके अलग अलग हिस्सों के बनने से  विकसित हुई थीं. इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इस तथ्य का समर्थन करने वाले बहुत से प्रमाण हासिल किए.

    खास पेड़ का अनुवांशकीय अध्ययन
    माना जाता है कि पिछले कुछ लाखों सालों में बार बार आने वाले हिम युगों की वजह से मध्य अफ्रीका ठंडा और सूखा बनता गया जबकि भूमध्य रेखा से दूर के इलाके बहुत कम तापमान की वजह से जमते रहे. एक्सेटर यूनिवर्सिटी की डॉ रोसालिया पिनेरो ने बताया कि उन्होंने पांच लेग्यूमे पेड़ों के डीएनए का अध्ययन किया.

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    हिमयुगों में बार बार अफ्रिका के वर्षावनों को ठंडा किया था जिससे वे सिकुड़ने के साथ बिखरते भी रहे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    बिखराव पर दिया विशेष ध्यान
    डॉ पिनेरो ने बताया कि लेग्यूमे पेड़ अफ्रीकी वर्षा वनों में बहुतायत में पाए जाते हैं. उन्होंने कहा, “हमने बिखराव यानि जनसंख्याओं के बीच भौतिक विभाजन के बहुत महत्वपूर्ण अनुवांशिकीय संकेतों की पहचान की है. इससे पता चलता है कि जंगल हिम युग के कारण ठंडे और सूखे दौर में पीछे खिसकते चले गए.

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    पेड़ नहीं जा सके ज्यादा दूर तक
    शोध में पाया गया कि इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि हिम युग के बाद जिस दर से प्रजातियां नए इलाके में पनपीं, वह काफी अलग अलग थी. शोधकर्ताओं का कहना है कि ऐसा लगता है कि बीजों और परागों के कम दूरी तक फैलने की प्रणाली के कारण अन्य प्रजातियों की तुलना में पेड़ों में यह दर धीमी रही थी.

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    आज की मानवीय गतिविधियों के कारण वर्षावनों (Rain Forests) में अब इस तरह के बदलाव मुश्किल हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    अब नहीं हो पाएगा ऐसा
    डॉ पिनेरो ने बताया, “आज जलवायु और भूमि उपयोग  मानव गतिविधियों के कारण बहुत तेजी से बदल रहा है. इसकी वजह से ये पेड़ शायद फिर से दूसरी जगह प्रभावी तौर पर ना पनप सकेंगे. वहीं उष्णकटीबंधीय क्षेत्रों की हिम के शोधों के संबंध में  हमेशा ही उपेक्षा की जाती रही है. अफ्रीका और उष्णकटिबंधीय क्षेत्र दोनों का ही इन मामलों में कम अध्ययन हुआ है.

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    डॉ रोसालिया पिनेरो का यह अध्ययन प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित हुआ है. उन्होंने बताया कि लंबे इहास के बाद भी उनके नतीजे दर्शाते है कि अफ्रीकी वर्षावन एक गतिक बायोम हैं जहां पेड़ों की विविध प्रजातियों में जलवायु परिवर्तन की वजह से बहुत बदलाव आया है.

    Tags: Africa, Earth, Environment, Research, Science

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