Doctors Day2020 : वो भारतीय डॉक्टर, जिसने हजारों चीनी सैनिकों की जान बचाई थी

Doctors Day2020 : वो भारतीय डॉक्टर, जिसने हजारों चीनी सैनिकों की जान बचाई थी
डॉक्टर द्वारिका नाथ कोटनिस, वो डॉक्टर जिसकी इज्जत चीन अब भी करता है

भारत का एक डॉक्टर दूसरे विश्व युद्ध घायल चीनी सैनिकों का इलाज करने चीन गया. वहां उसने हजारों चीनी सैनिकों की जान बचाई. विश्व युद्ध खत्म होने के बाद भी वो चीन में लोगों की सेवा में लगा रहा. चीन शायद ही किसी विदेशी की उतनी इज्जत करता हो, जितनी इस भारतीय डॉक्टर की

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भारत-चीन के बीच सीमा पर जबरदस्त तनाव है. इस हालत में कम से कम एक भारतीय डॉक्टर चीन को भी याद आ रहा होगा, जिसने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हजारों चीनी सैनिकों की जिंदगी बचाई थी. इसी के चलते उस भारतीय डॉक्टर की मृत्यु भी हो गई. हालांकि चीन आज भी उस भारतीय डॉक्टर को भरपूर इज्जत देता है. यही नहीं जब भी चीन के कोई प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति भारत आए तो वो उस भारतीय डॉक्टर से परिजनों से यहां जरूर मिले. उनके प्रति आभार व्यक्त किया. उस डॉक्टर का नाम है द्वारकानाथ कोटनिस.

शी जिनपिंग ने भी की थी मुलाकात
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी जब भारत आए थे तो वो डॉ. द्वारकानाथ कोटनिस के परिवार से मिलने गए. वो 2014 में उनकी बहन मनोरमा से मिले. शी से मिलाने के लिए मुंबई स्थित चीन के वाणिज्य दूतावास ने डॉ. कोटनिस की 93 वर्षीय बहन और उनके परिवार के अन्य सदस्यों को हवाई यात्रा से दिल्ली लाने की विशेष व्यवस्था की थी.

शी जिनपिंग ने डॉ. कोटनिस की बहन मनोरमा से मुलाकात की थी.




शी जिनपिंग ने परिवार से मुलाकात के बाद कहा था, जापानी हमले के विरुद्ध चीनी जनता के युद्ध की महत्वपूर्ण घड़ी में भारतीय मेडिकल मिशन ने हजारों मील दूर आकर हमारी सहायता की और मेरे पिता की पीढ़ी के लोगों के साथ कंधे कंधा मिलाकर जापानी फासिस्टों के विरुद्ध लड़े.



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क्या है डॉ. कोटनिस की कहानी
द्वारकानाथ कोटनिस उस पांच सदस्यीय भारतीय डॉक्टरों के दल का हिस्सा थे जिन्हें 1938 में चीन-जापान युद्ध के दौरान चीनी सैनिकों की मदद के लिए भेजा गया था. ये वो समय था जब जापान ने चीन पर आक्रमण कर दिया था और चीनी कम्युनिस्ट नेता झू डे ने जवाहर लाल नेहरू से भारतीय डॉक्टरों को भेजने के लिए मांगा था.

इस डॉक्टरों के दल का नेतृत्व एम. अटल कर रहे थे. उनके अलावा दल में बीके बसु, एम. चोलकर, डॉ. मुखर्जी और कोटनिस शामिल थे. लेकिन वहां से कुछ समय बाद कोटनिस को छोड़कर बाकी सभी वापस आ गए. कोटनिस वहीं रुके रहे और चीनी सैनिकों का इलाज करते-करते अपने प्राणों का बलिदान दे दिया. लेकिन उनके बलिदान ने उन्हें चीन का आइकॉन बना दिया.

जहां फैला है कोरोना वायरस, वहीं पहुंचे थे कोटनिस
ये संयोग ही कहा जा सकता है आज चीन के जिस वुहान प्रांत में कोरोना वायरस का सबसे ज्यादा आतंक पसरा हुआ है, डॉ. कोटनिस ने उसी इलाके में पहला कदम रखा था. इसके बाद उन्हें दूसरे डॉक्टरों के साथ उन इलाकों में भेज दिया गया जहां चीनी सैनिक जापानियों से लड़ाई लड़ रहे थे.

डॉ. कोटनिस की याद में उनके गृहनगर शोलापुर में म्यूजियम बनाया गया है.


चार सालों तक चीन में रहे
कोटनिस चीन में चार सालों तक रहे. उन्होंने इस दौरान चीन के सुदूर इलाकों में टेंट के मेडिकल क्लिनिक में अनगिनत चीनी सैनिकों की जान बचाई. 1939 में वो माओत्से तुंग की रिवोल्यूशनरी आर्मी का हिस्सा बन गए.

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फिर उनकी आगे की जिंदगी चीन में ही बीती
यहीं से तय हो गया था कि अब उनकी आगे की जिंदगी चीन में ही बीतने वाली है. अंग्रेजी अखबार द ट्रीब्यून में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान कोटनिस ने 800 मेजर ऑपरेशन किए थे. उन्हें 1941 में चीन के डॉ. बेथुने इंटरनेशनल पीस हॉस्पिटल का डायरेक्टर बना दिया था. लेकिन तीन साल तक अपने स्वास्थ्य की चिंता न करने की कीमत उन्होंने चुकानी शुरू कर दी थी. उन्हें मिर्गी के दौरे पड़ने शुरू हो गए. दिन ब दिन उनकी हालत बिगड़ती चली गई. 9 दिसंबर 1942 को महज 32 साल की उम्र कोटनिस ने दुनिया छोड़ दी.

चीन की लड़की से प्यार हुआ और शादी कर ली
चीन में रहने के दौरान डॉ. कोटनिस को वहां की एक लड़की से प्रेम हो गया था. किंग्लान गुओ नाम की इस लड़की से उनकी मुलाकात एक मेडिकल क्लीनिक में ही हुई थी. दोनों की शादी हुई और एक लड़का भी हुआ जिसका नाम बेहद दिलचस्प था. बेटे का नाम रखा गया Yinhua. इस नाम में Yin इंडिया का द्योतक था और Hua चीन का.

 मराठी परिवार से ताल्लुक रखते थे कोटनिस
डॉ. कोटनिस का जन्म महाराष्ट्र के शोलापुर में 10 अक्टूबर 1910 को एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम शांताराम और मां का नाम सीता था. कोटनिस के दो भाई और पांच बहनें थीं. परिवार में सब उन्हें प्यार से बाबा कह कर बुलाते थे. उन्होंने मुंबई के जी.एस. मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई की थी.

चीन में लगाई गई द्वारकानाथ कोटनिस की प्रतिमा.


शायद ही चीन किसी विदेशी की करता हो इतनी इज्जत
डॉ. कोटनिस को चीन में जितना सम्मान मिला है उतना शायद ही किसी विदेशी को कभी मिला हो. उनकी मृत्यु पर माओत्से तुंग ने कई बार दुख जाहिर किया था. वो हमेशा कोटनिस के व्यक्तिगत रूप से आभारी रहे. जब में चीन में कम्यूनिस्ट पार्टी का शासन स्थापित हो गया तो फिर उसके बाद तकरीबन सभी बड़े नेताओं ने कोटनिस के प्रति आभार व्यक्त किया.

शी जिनपिंग के अलावा 1950 में चीनी प्रधानमंत्री झाऊ एन लाई, 1996 में चीनी राष्ट्रपति जियांग जेमिन, 2001 और 2002 में प्रधानमंत्री ली पेंग और झू रोंगजी, 2006 में राष्ट्रपति हू जिताओ और 2013 में प्रधानमंत्री ली केकियांग ने कोटनिस के परिवार से मुलाकात की थी.
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