भारत को 'गंदा' कहने वाले ट्रंप को पता भी है अमेरिका में कैसी है हवा?

डिबेट के दौरान डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडेन.
डिबेट के दौरान डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडेन.

कार्बन उत्सर्जन (Carbon Emission) की बात हो या पर्यावरण संबंधी नीतियों (Environment Policies) की, अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े दोषियों में रहा है और लगातार बना हुआ है. एशियाई देशों (Asian Countries) को निशाना बनाने वाले ट्रंप का बयान कितना झूठ है और सच क्या है?

  • News18India
  • Last Updated: October 27, 2020, 11:59 AM IST
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अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव (US President Election 2020) के ठीक पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पूर्व उप राष्ट्रपति जो बाइडेन (Trump vs Biden) के बीच चल रही प्रेसिडेंशियल डिबेट (US Presidential Debate) में भारत और अमेरिका के रिश्तों के साथ ही भारतीयों के मन को ठेस पहुंची. अस्ल में, इस डिबेट में छह में से एक मुद्दा क्लाइमेट चेंज (Climate Change) का भी था, जिस पर चर्चा के दौरान ट्रंप ने कहा था 'चीन को देखिए, कितना गंदा है!, रूस को देखिए, भारत को देखिए, कितने गंदे हैं ये, हवा बहुत गंदी है.' ट्रंप के इस बयान के बाद से ही भारतीयों में गुस्से के साथ पर्यावरण को लेकर अमेरिका भी निशाने पर है.

डिबेट में जब ट्रंप से सवाल किया गया था कि वह क्लाइमेट चेंज के खिलाफ कैसे लड़ेंगे जबकि एक ही वक्त में उन्हें जॉब बढ़ाने पर भी विचार करना है. इस सवाल के जवाब में भारत के खिलाफ बात करते हुए ट्रंप ने यह भी दावा किया कि अमेरिका में 'कार्बन उत्सर्जन सबसे कम' है. लेकिन यह ट्रंप का एक और झूठ साबित हुआ क्योंकि आंकड़े (हवा की क्वालिटी संबंधी फैक्ट्स देखें) कुछ और कह रहे हैं!

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अमेरिका बहुत बड़ा दोषी है, भारत नहीं!
इतिहास भी देखें और ताज़ा डेटा भी, तो साफ हो जाता है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में अमेरिका का शेयर सबसे ज़्यादा रहा है. दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों के प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के हिसाब से अमेरिका पहले और प्रति व्यक्ति की बात न करें तो कुल उत्सर्जन के मामले में दूसरे नंबर पर है. दूसरी तरफ, भारत इस मामले में अमेरिका से बहुत पीछे रहा है और दोनों के बीच गैप भी बहुत बड़ा है. इस मामले में रूस और चीन के मुकाबले भी भारत कम दोषी है.

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यूएनईपी के डेटा पर आधारित यह ग्राफिक डाउन टू अर्थ से साभार.


संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण प्रोग्राम ने साल 2019 की एमिशन गैप रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जो साफ तौर पर डेटा देती है और बताती है कि अमेरिका किस तरह इस मामले में भारत से काफी आगे है. क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर का अनुमान है कि कोविड 19 महामारी के कारण 2020 में अमेरिका का उत्सर्जन करीब 10 फीसदी कम होगा.

नीति नहीं, मौकापरस्ती पर ज़ोर
जैसा कि डिबेट में पूछे गए सवाल पर ट्रंप अमेरिका की नीति ठीक तरह से बताने में नाकाम रहे, क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर ने अमेरिका को उस मोर्चे पर भी 'गंभीर रूप से अक्षम' बताया है, जिसका मकसद दुनिया भर में तापमान को 2°C तक कम करना है और कम से कम 1.5°C कम करने की भरसक कोशिश करना है.

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इन तमाम मुद्दों के बावजूद ट्रंप प्रशासन के पास ग्रीन रिकवरी के लिए नीति के नाम पर कुछ खास नहीं है. डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट की मानें तो ट्रंप सरकार कोरोना वायरस महामारी को एक बहाने के तौर पर इस्तेमाल करेगी और इसके कारण तापमान या उत्सर्जन में ​जो गिरावट आएगी, उसे पर्यावरण के हित में उठाए गए कदम के तौर पर प्रचारित किया जाएगा.

यह भी चिंता की बात है कि अमेरिका की प्रतिबद्धता संस्था NDC देश के फेयर शेयर की रेंज पर विफल साबित हुई है और तापमान को 2°C के नीचे रखने के प्रयास नाकाम साबित हुए हैं. इसका मतलब यह है कि अगर और भी सरकारें इसी तरह की रेंज में रहें, तो ग्लोबल वॉर्मिंग 4°C तक बढ़ेगी.

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नेटवर्क 18 क्रिएटिव


क्लाइमेट चेंज से मुंह फेरने वाली सरकार
ट्रंप प्रशासन के बारे में रिपोर्ट साफ कहती है कि अमेरिका चुनाव के बाद यह सरकार क्लाइमेट चेंज पर पेरिस समझौते से अलग होने की तैयारी कर चुकी है. ईरान और तुर्की की जमात में शामिल होकर अमेरिका इस समझौते का हिस्सा नहीं रहेगा. यही नहीं, साफ हवा, पानी, वन्यजीवन और ज़हरीले केमिकलों के मुद्दे पर क्लाइमेट नीतियों के मामले में भी ट्रंप प्रशासन आरोपी ही साबित हुआ है.

एनवायटी के विश्लेषण में बताया जा चुका है कि ट्रंप सरकार ने पर्यावरण संबंधी 72 नियम, नियंत्रण आदि या तो पलट दिए, या हटाए या वापस ​ले लिये और अन्य 27 को भी हटाए जाने की तैयारी चल रही है. मिसाल के तौर पर, पावर प्लांट व वाहनों से कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन की लिमिट कम कर दी गई, पावर प्लांट से मर्करी एमिशन की लिमिट भी और आधे से ज़्यादा उपजाऊ ज़मीनों की सुरक्षा भी खत्म की जा चुकी है.

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ट्रंप के बयान की टाइमिंग?
जब अमेरिका के स्टेट सेक्रेट्री माइक पॉम्पियो और डिफेंस सेक्रेट्री मार्क एस्पर नई दिल्ली आने वाले हैं और भारत और अमेरिका के बीच पार्टनरशिप को और मज़बूत करने पर बातचीत करने वाले हैं, उससे ठीक पहले ट्रंप का यह बयान आया है.

यही नहीं, ट्रंप का बयान इस समय आया है, जब एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन एजेंसी ने अनुमान दिया है कि अफोर्डेबल क्लीन एनर्जी यानी ACE का नतीजा यह होगा कि साल 2030 तक 1630 अतिरिक्त प्री मैच्योर मौतें होंगी, 1,20,000 अस्थमा दौरे पड़ेंगे, 1,40,000 स्कूल दिवस छूट जाएंगे और 48,000 वर्किंग डे का नुकसान होगा. वास्तव में ओबामा के समय जो क्लीन पावर प्लान था, उसे पलटकर ट्रंप प्रशासन ने ACE का नियम दिया, जिसकी काफी आलोचना पहले भी हुई थी.
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