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गंदे मोजे सूंघकर इस खतरनाक बीमारी की पहचान कर सकते हैं कुत्ते

अक्सर जांच में देरी की वजह से मलेरिया जानलेवा साबित होता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 16, 2019, 5:35 PM IST
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बम निरोधक दस्ते के साथ आपने अक्सर कुत्तों को फिल्मों, खबरों या असल जिंदगी में देखा होगा. कुत्ते सूंघकर ही पता लगा लेते हैं कि अमुक जगह बम है या नहीं. अब कुत्ते ये भी पता लगा सकेंगे कि आपको मलेरिया हो चुका है. इसके लिए मलेरिया टेस्ट कराने की भी जरूरत नहीं, वे बस आपके गंदे मोजे सूंघकर ये बता सकेंगे.

दुनियाभर में विश्वयुद्धों और गृहयुद्धों में भी उतनी मौतें नहीं हुईं, जितनी अकेली मच्छरों के काटने से हुईं. और ये लगातार चला आ रहा है. साल 2017 में जारी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) का आंकड़ा बताता है कि सिर्फ 2016 में पूरे विश्व में लगभग साढ़े 4 लाख लोगों की मौत मलेरिया की वजह से हुई. इसी साल के आंकड़े कहते हैं कि दुनिया की आधी आबादी इस बीमारी के खतरे में जीती रही.





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मलेरिया का इलाज है लेकिन इसके शुरुआती लक्षणों की पहचान इतनी मुश्किल है कि कई बार इसी जांच में देरी की वजह से जान चली जाती है. कई बार ये बीमारी तेजी से बढ़ती है और पहले 24 घंटों के भीतर इलाज न मिले तो जान का खतरा बढ़ जाता है. फिलहाल जांच के जो तरीके हैं, उनमें खून की जांच के लिए लैब भेजा जाता है और रिपोर्ट आने में वक्त लगता है. स्मियर माइक्रोस्कोपी जांच के जरिए 24 घंटों के भीतर तय होता है कि आपको मलेरिया है कि नहीं. ये रक्त जांच है. अगर ये उपलब्ध न हो तो तुरंत इलाज शुरू करने के लिए आरडीटी (Rapid Diagnostic Test) भी किया जाता है, हालांकि इसके नतीजे बहुत भरोसेमंद नहीं होते हैं लेकिन इलाज शुरू करने के लिए काफी होते हैं. इसी वक्त को बचाने और इलाज शुरू करने के लिए कुत्तों को प्रशिक्षित किया जा रहा है.

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यूके में अलग-अलग नस्ल के दो कुत्तों को इसकी ट्रेनिंग दी गई कि कैसे मोजों को सूंघकर बीमारी की पहचान की जा सकती है. इन्हीं कुत्तों पश्चिमी अफ्रीका के गैंबिया में मलेरिया के मरीजों की पहचान इसी प्रक्रिया से कर ली. जांच में इसकी पुष्टि हुई कि उन्हें मलेरिया है. शोधकर्ताओं का मानना है कि इन प्रशिक्षित कुत्तों को एयरपोर्ट जैसी जगहों पर रखा जा सकता है जहां उन जगहों से लोग आते-जाते हैं, जहां मलेरिया की आशंका ज्यादा होती है. ऐसे में कुत्तों की स्क्रीनिंग की मदद से मलेरिया को फैलने से रोका जा सकता है.



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ब्रिटेन की दुरहैम यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ बायोसाइंस में कुत्तों की ट्रेनिंग हुई. बाद में इसके निष्कर्ष अमेरिकन सोसाइटी ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड हाइजीन में छपे. यहां शोधकर्ताओं ने मोजों के 175 सैंपल इकट्ठा किए. इनमें से 30 मोजे उन बच्चों के थे जिनकी रक्त जांच में प्लाज्मोडियम फेल्सिपेरस नामक मलेरिया के परजीवी की पुष्टि हो चुकी थी. कुत्तों ने बीमारों और स्वस्थ लोगों के मोजे अलग-अलग करने में लगभग 90 प्रतिशत सफलता पाई.

एक तीसरे कुत्ते को भी मलेरिया-डिटेक्शन ट्रेनिंग दी गई और वो भी इस पैमाने पर खरा उतरा. इसके बाद से पश्चिमी देश कुत्तों को बीमारी की पहचान के लिए ट्रेनिंग देने में जुटे हुए हैं. इससे पहले भी प्रशिक्षित कुत्ते कुछ खास तरह के कैंसर और शुगर लेवल में बदलाव की जांच करते रहे हैं.
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