अब एक मिनट में कुत्ता बताएगा कैंसर है या नहीं?

ब्रिटेन में कुत्तों को कैंसर के पहचान की ट्रेनिंग दी जा रही है. अगर मेडिकल साइंस में ट्रायल की इस प्रक्रिया को इस्तेमाल में लाया जाए तो मिनटों में कैंसर रोगी का पता किया जा सकता है.

Samarth Saraswat
Updated: September 19, 2018, 1:37 PM IST
Samarth Saraswat
Updated: September 19, 2018, 1:37 PM IST
ब्रिटिश मेडिकल ट्रायल में रिसर्चर्स को कैंसर के खिलाफ बड़ी सफलता मिली है. तीन साल के ट्रायल के बाद रिसर्चर्स ने घोषणा की, कि कुत्तों की मदद से इंसान में कैंसर की बीमारी का पता लगाया जा सकता है.

ये ट्रायल यॉर्कशायर के द हुल एंड ईस्ट हॉस्पिटल ट्रस्ट में अंजाम दिया गया. इस ट्रायल के दौरान 2000 स्वस्थ्य और बीमार रोगियों के यूरीन सैंपल लिए गए.

इन सैंपलों के जरिए कुत्तों को कैंसर के पहचान की ट्रेनिंग दी गई. अगर मेडिकल साइंस में ट्रायल के इस प्रक्रिया को इस्तेमाल में लाया जाए तो मिनटों में कैंसर रोगी का पता किया जा सकता है.

लेकिन अभी तक रिसर्चरों ने आंतों के कैंसर में ही ये महारत हासिल की है. आगे जानिए कि क्या एक कुत्ता वाकई कैंसर रोगी को पहचान सकता है?



कुत्तों में सुंघने की अविश्वसनीय ताकत!
अपनी सूंघने की क्षमता के कारण कुत्तों का इस्तेमाल ड्रग्स पकड़ने से लेकर लैंड माइन डिटेक्ट करने, संदिग्धों की तलाश और बेड बग तलाशने में भी किया जाता है. नए रिसर्च के बाद दावा किया गया है कि कुत्ते कैंसर रोगी की भी एक मिनट के अंदर पहचान कर सकते हैं.
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मेडिकल डिटेक्शन डॉग के मुताबिक कुत्ते एक ट्रिलियन (एक लाख करोड़) में से भी एक हिस्सा सुंघकर पहचानने की क्षमता रखते हैं. इसे आसान शब्दों में समझें तो दो ओलंपिक साइज स्विमिंग पूल में एक चम्मच चीनी की मात्रा. इससे पहले प्रोस्टेट कैंसर को लेकर हुए ट्रायल में कुत्तों ने 93% की विश्वसनीयता के साथ सैंपल्स की पहचान की.

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मुश्किल टेस्टों से मिलेगी निजात
रिसर्चरों का मानना है कि इस नए तरीके के इस्तेमाल में आने के बाद बीमारी की जांच के लिए होने वाले कठिन टेस्टों से निजात मिलेगी. साथ ही फीस खर्च में भी आम आदमी को काफी राहत मिलेगी.

वर्तमान में शुरुआती कैंसर की जांच के लिए कई टेस्ट होते हैं. इनमें ब्लड की जांच से लेकर स्पेशल सैंपिलिंग किट तक का इस्तेमाल किया जाता है. इस जांच के दौरान रोगी के मल की जांच भी की जाती है. इसमें मौजूद खून के आधार पर रिपोर्ट तैयार की जाती है.



कई स्तर पर टेस्ट!
कोलोरेक्टल सर्जरी के कंसल्टेंट इयान हंटर के मुताबिक कैंसर की जांच के लिए कई स्तर पर टेस्ट होते हैं. अगर मल की जांच में ये सामने नहीं आता, तो इसके बाद रेक्टम (मलाशय) में कैमरा डालकर जांच की जाती है. जो टेस्ट का एक मुश्किल और कष्टकारी हिस्सा है.

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रोगी को क्या फायदा?
यूरो न्यूज़ के मुताबिक कैंसर की जांच के इस नए तरीके से इंसान को ज्यादा सटीक परिणाम और कम कष्ट सहना पड़ेगा. इससे बेवजह की कोलोनोस्कोपी से निजात मिलेगी. आसान टेस्ट के कारण ज्यादा लोग अपनी जांच के लिए सामने आएंगे.

इससे मरीज को ज्यादा जल्दी अपनी बीमारी का पता चल सकता है. इंग्लैंड में कोलोरेक्टल कैंसर से बचने वालों की दर 51% है. स्टेज वन पर 95% पुरुषों और 100% महिलाओं के बचने के चांस होते हैं.

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और कहां काम आते हैं स्निफर डॉग?
1. बेड बग ढूंढने
2. मानव अवशेष के सर्च में
3. कैंसर की जांच
4. ड्रग्स की तलाश
5. लुप्तप्राय पशु प्रजातियां ढूंढने
6. विस्फोटकों की तलाश
7. ज्वलनशील पदार्थों की खोज
8. करेंसी की तलाश
9. खोए मोबाइल की खोज
10. कस्टम की जांच के दौरान
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