14 भाई-बहनों में सबसे छोटे थे डॉ. भीमराव, ऐसे मिला 'अंबेडकर' उपनाम

4 अप्रैल 1891 को डॉ. आंबेडकर मध्यप्रदेश के महू में एक महार परिवार में पैदा हुए. उनका परिवार मराठी भाषी था और मूल रूप से वो महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के अंबावाड़ी के थे.

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Updated: December 6, 2018, 10:55 AM IST
14 भाई-बहनों में सबसे छोटे थे डॉ. भीमराव, ऐसे मिला 'अंबेडकर' उपनाम
भीमराव आंबेडकर (न्यूज18 क्रिएटिव)
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Updated: December 6, 2018, 10:55 AM IST
6 दिसंबर को संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर का महापरिनिर्वाण दिवस है. युगों-युगों में एक मसीहा पैदा होता है, जिनके विचारों का देश, समाज पर गहरा असर पड़ता है. उनके विचार युगों को बदल जाते हैं. ऐसे ही युग-प्रर्वतक डॉ. अंबेडकर भी थे. अपने समय से कई आगे की सोच रखने वाले अंबेडकर आज भी जीवंत हैं. प्रधानमंत्री हों अथवा विपक्ष के नेता, सभी अपने आपको अंबेडकर के करीब दिखाने की कोशिश में लगे रहते हैं. चुनाव हो या फिर आन्दोलन डॉ. अंबेडकर चर्चा में बने ही रहते हैं.

दरअसल डॉ. अंबेडकर ने अर्थ-नीतियों से लेकर सामाजिक नीतियों तक, वेलफेयर स्टेट, दलित, किसान, मजदूर और महिला अधिकार जैसे मुद्दों पर गहन विचार दिए हैं. ये विचार आज भी प्रासंगिक हैं. जिनका फायदा आज समाज के हर तबके को हो रहा है.

'अंबेडकर' उपनाम के पीछे है दिलचस्प कहानी
डॉ. भीमराव का जन्म 4 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू में एक महार परिवार में हुआ था. उनका परिवार मराठी भाषी था और मूल रूप से वो महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के अंबावाड़ी के थे. उनके पिता रामजी मालोजी सकपाल ब्रिटिश आर्मी में सुबेदार जबकि मां भीमाबाई गृहणी थीं. अंबेडकर अपने चौदह भाई-बहनों में सबसे छोटे थे. पिता रामजी ने अंबेडकर की पढ़ाई पर शुरू से ही ध्यान दिया.

डॉ. अंबेडकर ने 1907 में बम्बई के गर्वमेंट हाई स्कूल से मैट्रिक परीक्षा पास की. ऐसा करने वाले वह हिंदुस्तान के पहले महार थे. इससे अंचभित होकर उनके गुरु ने बालक सकपाल से कहा, 'आज तुमने पूरे अंबावाड़े गांव का पूरा नाम रोशन किया है, तो तुम आज से अंबेवाड़ीकर कहलाओगे.' और यहीं उनका सरनेम सकपाल से बदलकर अंबेडकर हो गया. बाद में उन्होंने एलफिंस्टन कॉलेज से ग्रेजुएशन किया.

कोलंबिया यनिवर्सिटी से की PHD
हायर एजुकेशन के लिए डॉ. अंबेडकर बड़ौदा के शासक सैयाजीराव गायकवाड़ से मिली स्कॉलरशिप की मदद से अमेरिका गए. 1917 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी से Ph. D. की. इसी साल उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में एडमिशन लिया. स्कॉलरशिप बंद होने से उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी, लेकिन 1920-1923 के बीच आंबेडकर फिर लंदन गए. लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी की. इसके लिए उन्हें D.Sc. की उपाधि मिली.
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भारत के संविधान निर्माता बने अंबेडकर
संविधान के मुख्य वास्तुकार के रूप में अंबेडकर के योगदान को भूलाया नहीं जा सकता है. उन्होंने 1948 में संविधान सभा के सामने हिंदू कोड बिल पेश किया. ये बिल संयुक्त और अविभाजित हिंदू परिवार में संपत्ति के अधिकार से जुड़ा था. इसके अलावा इसमें स्त्रियों को अपनी मर्जी से विवाह और तलाक होने पर पति से अलग रहने पर गुजारा भत्ता, गोद लेने खासकर बच्ची को भी गोद लिए जाने और बच्चों के संरक्षण का भी अधिकार भी दिया. लेकिन कट्टर हिंदुओं और कांग्रेस के अंदर उठे विरोध के चलते ये बिल पास न हो सका. इससे नाराज अंबेडकर ने 1951 में कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. हालांकि, बाद में ये बिल टुकड़ों में बांट कर पास किया गया.

जीवन के आखिरी दिनों में अपनाया बौद्ध धर्म
हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों से आहत डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि 'मैं एक हिंदू के तौर पर पैदा हुआ क्योंकि इस पर मेरा बस नहीं था, लेकिन हिंदू के तौर पर मरूंगा नहीं, इसलिए 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने नागपुर की दीक्षा भूमि में अपने 10 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली. इसी साल डॉक्टर अंबेडकर ने 'बुद्धा एंड हिज' धम्म लिखी.

जीवन के आखिरी समय भी अंबेडकर समाज के हित की दिशा में काम करते रहे. उनकी आखिरी पुस्तक 'बुद्धा और कार्लमास्क' थी. इस किताब को उन्होंने अपनी मृत्य के 4 दिन पहले ही पूरा किया. 6 दिसंबर 1956 को बाबा साहेब पंचतत्व में विलीन हो गए. उनके कार्यों के लिए 1990 में उन्हें देश के सर्वोच्चय सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया.

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