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इतिहास में आज: वो राष्ट्रपति जो जामिया के भी VC रहे, सैलरी लेते थे केवल 80 रुपए

डॉ. जाकिर हुसैन और इंदिरा गांधी (फाइल फोटो)

डॉ. जाकिर हुसैन और इंदिरा गांधी (फाइल फोटो)

डॉ. जाकिर हुसैन आज ही के दिन 1967 में भारत के तीसरे राष्ट्रपति बने थे. वह बड़े शिक्षाविद भी थे. राष्ट्रपति बनने से पहले वो जामिया मिलिया इस्लामिया के उप कुलपति थे. तब उनका वेतन 150 रुपया था, जिसे उन्होंने खुद ही कम करके 80 रुपए लेना मंजूर किया था

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    डॉ जाकिर हुसैन (Dr. Zakir Husaain) आज ही के दिन 1967 में भारत के तीसरे राष्ट्रपति बने थे. उनके जीवन से जुड़े कई किस्से मशहूर हैं. इन्हीं किस्सों में से एक है जामिया में उनका वाइस चांसलर रहते महज 80 रुपए की सैलरी लेना.

    वो देश के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति थे, जिन्होंने 13 मई 1967 से 3 मई 1969 तक राष्ट्रपति पद संभाला.  3 मई 1969 को उनकी आकस्मिक मृत्यु हो गई थी. वह 1957 से 1962 तक बिहार के राज्यपाल थे. इसके बाद 1962 से 1967 तक भारत के उपराष्ट्रपति भी रहे.

    डॉ जाकिर हुसैन का जन्म हैदराबाद में हुआ था. बाद में उनके पिता उत्तर प्रदेश के शहर कायमगंज रहने आ गए. डॉक्टर हुसैन यहीं बड़े हुए. भारत में शैक्षिक ढांचे को खड़ा करने में उनका अहम योगदान रहा. वह अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री के लिए जर्मनी के बर्लिन विश्वविद्यालय गए. लौट कर 1920 में उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी की स्थापना में खास योगदान दिया. वहां वो उपकुलपति भी बने. आजादी के बाद अलीगढ़ विश्वविद्यालय के भी उपकुलपति बने.

    कुछ ऐसा था माहौल
    वह 1920 का वक्त था. महात्मा गांधी जानते थे कि आजादी के आंदोलन को एक व्यापक आधार देना जरूरी है. तब देश के मुस्लिम समुदाय के भीतर अंग्रेजों के विरुद्ध दो अलग-अलग रुझानों के लोग संघर्ष कर रहे थे. कुछ की सोच थी कि अंग्रेजी राज इस्लाम विरोधी है, सो उसका हरचंद विरोध होना चाहिए जबकि कुछ पश्चिमी शिक्षा प्राप्त नवयुवक थे. वो बिल्कुल लोकतांत्रिक मिजाज से सोचते थे कि अंग्रेजों ने भारत को नाहक ही उपनिवेश बना रखा है, एक राजनीतिक समुदाय के रूप में भारतीयों को अपने फैसले खुद करने का अख्तियार है.

    महात्मा गांधी आजादी की लड़ाई में मुस्लिमों को सक्रिय तौर पर जोड़ना चाहते थे. तमाम मुस्लिम अंग्रेजों के खिलाफ तो थे लेकिन वो दो अलग वैचारिक स्तर पर अंग्रेजों की मुखालफत कर रहे थे


    मुस्लिम समुदाय के भीतर अंग्रेजों की मुखालफत करने वाला यह दोनों तबका गांधी की तरफ मुड़ा और गांधी ने इस मौके को अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन में तब्दील कर दिया. गांधी के आह्वान था कि लोग अंग्रेजी राज के बनाये स्कूल-कॉलेज को छोड़ें, अंग्रेजियत की सीख से अपने दिमाग को धो डालें.

    गांधी का असर
    उनके आह्वान के असर में जिन छात्रों और शिक्षकों ने नौकरी या पढ़ाई छोड़ी उनमें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक छात्र जाकिर हुसैन भी थे. खिलाफत आंदोलन और अंग्रेजों से असहयोग की रणनीति से उभरे जन-ज्वार को स्थायी रूप देने के लिए जाकिर हुसैन जैसे कई छात्रों और विद्वानों के एक समूह ने नए तर्ज के तालीम का एक संस्थान बनाने का फैसला लिया. वही संस्थान आज जामिया मिलिया इस्लामिया कहलाता है लेकिन आज के रूप तक आने से पहले उसे अपना वजूद बचाने की लड़ाई लड़नी पड़ी.

    एक जमाने अलीगढ़ यूनिवर्सिटी ही जामिया को खतरा मानती थी
    एक तरफ सियासी संकट थे तो दूसरी तरफ आर्थिक मजबूरी. एक तो इस शिक्षा संस्थान के छात्रों और शिक्षकों ने सारे देश में चल रहे सत्याग्रह में हिस्सेदारी की और अंग्रेजों की जेल में बंद किए गए. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की इस्लामी धारा इस विश्वविद्यालय को अपने वजूद के लिए खतरे की तरह देख रही थी.

    तब गांधीजी ने जामिया के लिए मदद की
    तुर्की के मुस्तफा कमाल पाशा ने 1924 में खिलाफत का खात्मा कर दिया और इससे पहले 1922 में गांधीजी भी असहयोग-आंदोलन वापस ले चुके थे. संस्थान के आगे चुनौती यह थी कि वो अपने को चलाए-बनाए रखे तो किस आधार पर. आर्थिक संकट अलग से थे. खिलाफत के जरिए मिलने वाली आर्थिक मदद खत्म हो चुकी थी. लेकिन गांधी डटे रहे, कहा कि विश्वविद्यालय चलेगा चाहे उसके लिए लोगों से भीख ही क्यों ना मांगनी पड़े.

    मुस्तफा कमाल पाशा


    ऐसे ही संकल्प के साथ जामिया अलीगढ़ से दिल्ली के करोलबाग में आया, कुछ दिनों तक संस्थान को स्वदेशी शिक्षा के पैरोकार हकीम अजमल खां का सहारा रहा, वे संस्था के सह-संस्थापक और पहले वाइस चांसलर भी थे लेकिन उनकी मौत के बाद सवाल खड़ा हुआ कि आखिर ऐसा कौन है जो जामिया मिलिया को बचाने के लिए अपनी जिंदगी होम कर सके.

    जामिया का संभाला जिम्मा
    संकट के ऐसे ही वक्त में बर्लिन में इकॉनॉमिक्स में पीएच.डी कर रहे जाकिर हुसैन ने जामिया मिलिया को चलाने का दायित्व अपने कंधे पर लेना (1925) स्वीकार किया. तय हुआ कि 150 रुपए की तनख्वाह पर वे जामिया का काम संभालेंगे लेकिन 1928 यानी हकीम अजमल खां की मौत के बाद उन्होंने अपनी तनख्वाह घटाकर 80 रुपए महीना कर ली.

    जामिया का ह्यूमैनिटीज ऐंड लैंगुएज डिपार्टमेंट


    जामिया को जाकिर हुसैन ने 21 साल दिए
    जामिया को दिए इन 21 सालों ने ही जाकिर हुसैन को एक महान शिक्षाप्रेमी की शख्सियत अता की बल्कि यह कहना ठीक होगा कि जिन बातों को वे अपने बचपन से महसूस करते आ रहे थे, उन्हें जिंदगी के अमल और उसूल के रूप में साकार करना उनके लिए संघर्ष के इन सालों में संभव हो सका.

    जाकिर हुसैन का परिवार
    जाकिर हुसैन खुद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के चांसलर थे. उनके परिवार के कई लोग बड़े पदों पर रहे. उनके भाई पाकिस्तान बनाने के आंदोलन में पूरी तरह मोहम्मद अली जिन्ना के साथ थे. बंटवारे के बाद वो पाकिस्तान चले गए. वहां वो शिक्षा मंत्री. उनका मुहम्मद हुसैन था. वो पाकिस्तान संसद के सदस्य भी रहे. उन्हें कश्मीर मामलों का मंत्री भी बनाया गया. उनके भतीजे अनवर हुसैन पाकिस्तान टेलीविजन कारपोरेशन के डायरेक्टर रहे.  उसी तरह उनके एक अन्य रिश्ते के भाई रहीमुद्दीन खान पाकिस्तान सेना के चेयरमैन ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ रहे. बाद में उन्हें बलूचिस्तान और सिंध का गवर्नर भी बनाया गया.

    उनके बहुत से रिश्तेदार भारत में भी रहे. जिन्होंने कांग्रेस के साथ जुड़कर राजनीति की. उनके छोटे भाई युसुफ हुसैन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर बने तो बाद में उनके एक भतीजे मसूद हुसैन जामिया यूनिवर्सिटी के वायस चांसलर बने. जाकिर हुसैन के खुद के दामाद खुर्शीद आलम खान कर्नाटक के गर्वनर बने. उनके ग्रैंडसन सलमान खुर्शीद कांग्रेस नेता हैं. वो मनमोहन सरकार में विदेश मंत्री रह चुके हैं.

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