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डॉ. जाकिर हुसैन: भारत के पहले अल्पसंख्यक राष्ट्रपति जो जामिया का VC रहते लेते थे 80 रुपए सैलरी

News18Hindi
Updated: February 8, 2020, 11:57 AM IST
डॉ. जाकिर हुसैन: भारत के पहले अल्पसंख्यक राष्ट्रपति जो जामिया का VC रहते लेते थे 80 रुपए सैलरी
डॉ. जाकिर हुसैन ने जर्मनी से अर्थशास्त्र में पीएचडी की थी.

बर्लिन में इकॉनॉमिक्स में पीएच.डी कर रहे जाकिर हुसैन ने जामिया मिलिया को चलाने का दायित्व अपने कंधे पर लेना (1925) स्वीकार किया. तय हुआ कि 150 रुपए की तनख्वाह पर वे जामिया का काम संभालेंगे लेकिन 1928 यानी हकीम अजमल खां की मौत के बाद उन्होंने अपनी तनख्वाह घटाकर 80 रुपए महीना कर ली.

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  • Last Updated: February 8, 2020, 11:57 AM IST
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आज भारत के पहले अल्पसंख्यक राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन (Dr. Zakir Husaain) की जयंती है. डॉ. राजेंद्र प्रसाद (Dr. Rajendra Prasad) और सर्वपल्ली राधाकृष्णन (Sarvpalli Radhakrishnan) के बाद डॉ. जाकिर हुसैन भारत के तीसरे राष्ट्रपति बने थे. वो 13 मई 1967 से 3 मई 1969 तक राष्ट्रपति पद पर रहे. 3 मई 1969 को उनकी आकस्मिक मृत्यु हो गई थी. हैदराबाद में जन्मे मूल रूप से अफगानी पश्तून परिवार से ताल्लुक रखने वाले डॉ. जाकिर हुसैन ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में बड़ा योगदान दिया. उनके जीवन से जुड़े कई किस्से मशहूर हैं. इन्हीं किस्सों में से एक है जामिया में उनका वाइस चांसलर रहते महज 80 रुपए की सैलरी लेना.

कुछ ऐसा था माहौल
वह 1920 का वक्त था और महात्मा गांधी जानते थे कि आजादी के आंदोलन को एक व्यापक आधार देना जरूरी है. देश के मुस्लिम समुदाय के भीतर अंग्रेजों के विरुद्ध दो अलग-अलग रुझानों के लोग संघर्ष कर रहे थे. कुछ की सोच थी कि अंग्रेजी राज इस्लाम विरोधी है, सो उसका हरचंद विरोध होना चाहिए जबकि कुछ पश्चिमी शिक्षा प्राप्त नवयुवक थे और बिल्कुल लोकतांत्रिक मिजाज से सोचते थे कि अंग्रेजों ने भारत को नाहक ही उपनिवेश बना रखा है, एक राजनीतिक समुदाय के रूप में भारतीयों को अपने फैसले खुद करने का अख्तियार है.



मुस्लिम समुदाय के भीतर अंग्रेजों की मुखालफत करने वाला यह दोनों तबका गांधी की तरफ मुड़ा और गांधी ने इस मौके को अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन में तब्दील कर दिया. गांधी के आह्वान था कि लोग अंग्रेजी राज के बनाये स्कूल-कॉलेज को छोड़ें, अंग्रेजियत की सीख से अपने दिमाग को धो डालें.

गांधी का असर
उनके आह्वान के असर में जिन छात्रों और शिक्षकों ने नौकरी या पढ़ाई छोड़ी उनमें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक छात्र जाकिर हुसैन भी थे. खिलाफत आंदोलन और अंग्रेजों से असहयोग की रणनीति से उभरे जन-ज्वार को स्थायी रूप देने के लिए जाकिर हुसैन जैसे कई छात्रों और विद्वानों के एक समूह ने नए तर्ज के तालीम का एक संस्थान बनाने का फैसला लिया. वही संस्थान आज जामिया मिलिया इस्लामिया कहलाता है लेकिन आज के रूप तक आने से पहले उसे अपना वजूद बचाने की लड़ाई लड़नी पड़ी.एक तरफ सियासी संकट थे तो दूसरी तरफ आर्थिक मजबूरी. एक तो इस शिक्षा संस्थान के छात्रों और शिक्षकों ने सारे देश में चल रहे सत्याग्रह में हिस्सेदारी की और अंग्रेजों की जेल में बंद किए गए. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की इस्लामी धारा इस विश्वविद्यालय को अपने वजूद के लिए खतरे की तरह देख रही थी.

तुर्की के मुस्तफा कमाल पाशा ने 1924 में खिलाफत का खात्मा कर दिया और इससे पहले 1922 में गांधीजी भी असहयोग-आंदोलन वापस ले चुके थे. संस्थान के आगे चुनौती यह थी कि वो अपने को चलाए-बनाए रखे तो किस आधार पर. आर्थिक संकट अलग से थे. खिलाफत के जरिए मिलने वाली आर्थिक मदद खत्म हो चुकी थी. लेकिन गांधी डटे रहे, कहा कि विश्वविद्यालय चलेगा चाहे उसके लिए लोगों से भीख ही क्यों ना मांगनी पड़े.

मुस्तफा कमाल पाशा


ऐसे ही संकल्प के साथ जामिया अलीगढ़ से दिल्ली के करोलबाग में आया, कुछ दिनों तक संस्थान को स्वदेशी शिक्षा के पैरोकार हकीम अजमल खां का सहारा रहा, वे संस्था के सह-संस्थापक और पहले वाइस चांसलर भी थे लेकिन उनकी मौत के बाद सवाल खड़ा हुआ कि आखिर ऐसा कौन है जो जामिया मिलिया को बचाने के लिए अपनी जिंदगी होम कर सके.

जामिया का संभाला जिम्मा
संकट के ऐसे ही वक्त में बर्लिन में इकॉनॉमिक्स में पीएच.डी कर रहे जाकिर हुसैन ने जामिया मिलिया को चलाने का दायित्व अपने कंधे पर लेना (1925) स्वीकार किया. तय हुआ कि 150 रुपए की तनख्वाह पर वे जामिया का काम संभालेंगे लेकिन 1928 यानी हकीम अजमल खां की मौत के बाद उन्होंने अपनी तनख्वाह घटाकर 80 रुपए महीना कर ली.

जामिया का ह्यूमैनिटीज ऐंड लैंगुएज डिपार्टमेंट


जामिया को दिए इन 21 सालों ने ही जाकिर हुसैन को एक महान शिक्षाप्रेमी की शख्सियत अता की बल्कि यह कहना ठीक होगा कि जिन बातों को वे अपने बचपन से महसूस करते आ रहे थे, उन्हें जिंदगी के अमल और उसूल के रूप में साकार करना उनके लिए संघर्ष के इन सालों में संभव हो सका.
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First published: February 8, 2020, 11:39 AM IST
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