Mission Paani: 'एग्रोफॉरेस्ट्री से बचेगा पानी, किसानों की होगी खूब कमाई'

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Updated: August 27, 2019, 3:03 PM IST
Mission Paani: 'एग्रोफॉरेस्ट्री से बचेगा पानी, किसानों की होगी खूब कमाई'
News18 के मिशन पानी कार्यक्रम में सद्गुरु भी शामिल हुए

कावेरी के बारे में तमिल में एक बहुत ही सुंदर कहावत है: “अगर कावेरी धीरे-धीरे आए तो समृद्धि लेकर आती है. अगर भागती हुई पहुंचे तो मुसीबत लेकर आती है. ”

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सद्गुरु

पिछले कुछ सालों में तमिलनाडु दो एकदम अलग तरह की परेशानियों से जूझता दिखा. दिसंबर 2015 में यहां पर भयंकर बाढ़ आई, जिसमें लगभग पूरा सूबा परेशान हो गया. दूसरी तरफ कुछ महीनों के भीतर हम लगातार चेन्नई में पानी की किल्लत की कहानियां सुन रहे हैं. हाल ही के दिनों में नहीं, बल्कि साल 2016 में भी तमिलनाडु ने सूखा झेला था.

बाढ़ और सूखे के इस चक्र को एक क्लासिक मामले की तरह देखा जा सकता है जो पानी को लेकर हमारी सीधी लापरवाही को बताता है. पानी एक संसाधन यानी resource है जिसके प्रबंधन की जरूरत है, लेकिन हम इस बारे में तभी सोचते हैं जब इसकी किल्लत झेलते हैं. कोई भी संसाधन हमेशा के लिए नहीं है अगर हम इसका प्रबंधन नहीं करते हैं.

नदियां, तालाब या कुएं पानी के स्त्रोत नहीं हैं. वे सिर्फ पानी का जरिया हैं. हमारे देश में 96% पानी का स्त्रोत सिर्फ मानसून की वजह से होने वाली बारिश है. यानी हमारे पास पानी सिर्फ बारिश के महीनों में, वो भी 50 से 60 दिन के लगभग आता है. इसके अलावा 4%पानी ग्लेशियरों के पिघलने से भी मिलता है. अगर इस आंकड़े पर ध्यान दिया जाए तो पूरे साल या 365 दिनों के लिए यही 50 से 60 दिन हमारे पास होते हैं.

फिलहाल हम बांधों के जरिए इस पानी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, ये तरीका हालांकि उतना कारगर नहीं. हमारे लगभग 20% बांध गाद से भरे हैं. कृत्रिम तरीके लंबे वक्त तक काम नहीं आएंगे. पानी के प्रबंधन का अकेला तरीका ज्यादा से ज्यादा वृक्षारोपण है. अगर मिट्टी पेड़-पौधों और पशुओं के अपशिष्ट के कारण जैव तत्वों से भरपूर है तो ये उस पानी को सहेजकर रख सकेगी जो भूजल में बदलता हुआ नदियों तक पहुंचता है.

बारिश का पानी तेजी से नदियों को भरता है और बाढ़ आ जाती है (प्रतीकात्मक फोटो)


कुल मिलाकर ये साफ है कि नदी पानी की स्रोत नहीं, सिर्फ एक गंतव्य है. पानी कितने धीरे-धीरे अपने गंतव्य तक पहुंचता है, यही तय करेगा कि साल के कितने दिन नदी में पानी रहेगा. फिलहाल चूंकि जमीन में पर्याप्त पेड़-पौधे नहीं है इसलिए बारिश का पानी तेजी से नदियों को भरता है और बाढ़ आ जाती है.
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कावेरी के बारे में तमिल में एक बहुत ही सुंदर कहावत है: “अगर कावेरी धीरे-धीरे आए तो समृद्धि लेकर आती है. अगर भागती हुई पहुंचे तो मुसीबत लेकर आती है. ”

कैचमेंट में भरपूर पेड़-पौधे हों तभी कावेरी टहलते हुए आएगी. कैचमेंट का मतलब सिर्प वो जगह या जमीन नहीं, जहां नदी बहती है. उष्णकटिबंधीय जलवायु में जमीन का हरेक रक्बा कैचमेंट है. जहां भी पेड़ और अन्य वनस्पतियां हैं, वहां पानी मिट्टी में समा जाएगा. पेड़ नहीं होंगे तो पानी बर्बाद हो जाएगा.

स्टडी कहती है कि अगर किसी क्षेत्र में 10,000 पेड़ हैं, तो 38 मिलियन लीटर पानी मिट्टी में प्रवेश करेगा. कावेरी 83,000 वर्ग किमी क्षेत्र में है और हमने 87% वृक्षों को हटा दिया है. कल्पना कीजिए कि हम कितना पानी बर्बाद कर रहे हैं!

पानी की कमी ऐसी चीज नहीं है जिसपर सिर्फ गर्मियों के मौसम में ध्यान दें. देखें कि मानसून के बाद कितना पानी बर्बाद हो रहा है. यही वक्त है चेतने का. न ही गर्मियां, जिसमें पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची होती है.

मिसाल के तौर पर चेन्नई को ही लें. एक वक्त पर यहां 1500 से ज्यादा झीलें और तालाब थे. अब उनमें से कोई बाकी नहीं. ऐसा इसलिए है, क्योंकि हमने प्राकृतिक पानी को नजरअंदाज करते हुए बस शहर बसाने पर ध्यान दिया.

पानी की कमी ऐसी चीज नहीं है जिसपर सिर्फ गर्मियों के मौसम में ध्यान दें (प्रतीकात्मक फोटो)


अब माहौल बदला है. कितने ही लोग अब झीलों और तालाबों को गहरा करने पर बात कर रहे हैं. यह सिर्फ तमिलनाडु में नहीं है, हर जगह हो रहा है. इन कदमों की जरूरत है लेकिन अगर हम बेसिक्स पर ध्यान नहीं देंगे तो इन सब बातों के कोई मायने नहीं हैं.

झीलों के साथ सहायक धाराएं हुआ करतीं जो उन्हें सालभर पानी से भरा रखतीं. उन सहायक धाराओं पर अब हमारे घर और इमारतें बनी हुई हैं. अगर हम झील को गहरा करें तो मानसून में तो इसमें पानी आ जाएगा, लेकिन बाकी साल ये फिर खाली रहेगी.

7 मिलियन लोगों का शहर सिर्फ 2 बड़ी झीलों पर नहीं चल सकता. हमें पक्का करना होगा कि भूजल का स्तर बढ़े. ऐसा तभी मुमकिन है जब मानसून का पानी मिट्टी में समा जाए.

शॉर्ट टर्म उपाय के तौर पर हम चेक डैम बना सकते हैं और पानी के तेज बहाव को कम करने के लिए contours बना सकते हैं जो पानी को छितरा दें ताकि उसकी चाल घट जाए. लेकिन बेसिक की बात करें तो पेड़-पौधे लगाना ही अकेला तरीका है जो पानी की गति को मंथर कर सकता है.

क्या इसका मतलब ये है कि हमें हर तरफ जंगल लगाना होगा? ये तो मुमकिन नहीं. ऐसे में आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका एग्रोफॉरेस्ट्री है. अगर हम किसानों को जैविक वृक्ष आधारित खेती के लिए प्रोत्साहित करते हैं तो पेड़ों और पशुओं के अपशिष्ट से पैदा जैविक सामग्री मिट्टी को फिर से भर देगी.

एग्रोफॉरेस्ट्री से न केवल मिट्टी और नदियों में पानी की भरपाई होगी, बल्कि ये किसानों की आय 3 से 8 गुना बढ़ा सकती है. अगर किसानों को इस बारे में देशव्यापी कैंपेनों के जरिए समझाया जाए तो बेहद आसानी से किसान इसे अपनाने को तैयार हो जाएंगे.

एग्रोफॉरेस्ट्री किसानों की आय 3 से 8 गुना बढ़ा सकती है (प्रतीकात्मक फोटो)


यही वजह है कि हम "कावेरी कॉलिंग" नामक एक अभियान शुरू कर रहे हैं. हम कावेरी के पुनरोद्धार पर ध्यान देना चाहते हैं. हम दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि 10 से 12 सालों के भीतर किसी नदी को दोबारा जिंदा किया जा सकता है. साथ ही किसानों की आय भी बढ़ सकती है.

सबसे जरूरी बात ये है कि ये पारिस्थितिकी बनाम अर्थव्यवस्था नहीं है. पारिस्थितिकी को दोबारा जिंदा करना जमीन के मालिकों के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है. यही बात हम साबित करने में लगे हुए हैं.

हालांकि किसानों को इसके लिए काफी मदद की जरूरत होगी. अभी तक वो केवल अपनी आजीविका के लिए काम कर रहा है. हम उससे नदी या पर्यावरण बचाने की उम्मीद नहीं कर सकते. सरकार को उन्हें इसकी समझ देनी होगी और जो इस दिशा में काम करें, उन्हें अगले 3 से 5 सालों के लिए इंसेंटिव भी दिया जाना चाहिए.

बचपन से ही मैं हमेशा प्रकृति, जंगलों और नदियों, खासकर कावेरी के बहुत करीब रहा. अब जब देखता हूं कि नदी का क्या हो रहा है तो मेरा दिल दहल जाता है. हमें यह समझना होगा कि नदियां हमारा राष्ट्रीय खजाना हैं.

पानी कोई चीज नहीं, यह जीवनदायिनी है. हमारे शरीर का 72% पानी है. यानी हम पानी से बने हुए हैं. इस ग्रह पर नदियां भी पानी से बनी हैं. इस मायने में देखें तो इंसान और नदियों का बेहद करीब का रिश्ता है.

हजारों सालों से इन नदियों ने हमें गले लगाया और पाला-पोसा. अब वक्त है कि हमें अपनी नदियों को गले लगाना है, उन्हें पोसना है. कावेरी आवाज दे रही है. क्या आप सुन सकेंगे?

(लेखक पद्मविभूषण पुरस्कार प्राप्त हैं जिन्होंने इशा फाउंडेशन बनाया जो योग सिखाता है. साथ ये फाउंडेशन सामाजिक कार्यों, शिक्षा और पर्यावरण पर भी काम करता है.)

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First published: August 27, 2019, 3:03 PM IST
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