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कैसे हल हो सकती है दुनियाभर से ईवेस्ट की समस्या

बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक कचरे (E- Waste) की समस्या का समाधान पुनः उपयोग में निहित है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक कचरे (E- Waste) की समस्या का समाधान पुनः उपयोग में निहित है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

दुनिया में बहुत सारा इलेक्ट्रॉनिक कचरा (E-Waste) पुनः उपयोग (Reuse) में लाया जा सकता है, जबकि उसे पूरी रह खारिज कर कचरे (Waste) में फेंक दिया जाता है जिससे ई-वेस्ट एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है.

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    दुनिया में तकनीक के साथ इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों (Electronic Equipments) का उपयोग बेतहाशा बढ़ गया है. टनों की मात्रा में प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर रोज सेमीकंडक्टर चिप और अन्य उपकरणों के घटकों का उत्पादन हो रहा है. ये प्रिटेंड सर्किट बोर्ड (PCB) पर लगाए जा रहे हैं आज के तकनीकों उपकरणों में से अधिकांश के दिमाग की तरह काम करते हैं. गाड़ियों, उत्पान मशीनों, वायुयान, टर्बाइन्स आदि को नियंत्रित करने वाले ये महंगे बोर्ड हजारों डॉलर की कीमत के होते हैं. समय के साथ ये बोर्ड खराब हो जाते हैं और खारिज कर दिए जाते हैं. इस समस्या का समाधान इन्ही खारिज किए गए उपकरणों के हिस्सों के सुधार और पुनः उपयोग में हैं जिससे बहुत सारा इलेक्ट्रॉनिक कचरा (E-Waste) पैदा होने से बच सकता है.

    क्यों फेंक दिए जाते हैं उपकरण
    दिक्कत यही है कि समय के साथ सर्किट बोर्ड के घटक बेकार हो जाते हैं. सॉफ्टेवेयर अपडेट के कारण ये हिस्से धीमे हो जाते हैं और काम करने लायक ना रहकर बेकार घोषित कर खारिज कर दिए जाते हैं.  जबकि थोड़े से सुधार के साथ इन्हें फिर से उपयोग में लाया जा सकता है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि यह सच जानने के बाद भी बहुत सारे उपकरण पूरे के पूरे खारिज कर कचरे में क्यों फेंक दिए जाते हैं.

    बच सकता है ये कचरा
    हर स्थिति में यदि किसी इंजीनियर तक टेक्नीशियन को सह उपचार उपकरणों के से सुसज्जित कर प्रशिक्षण दिया जाए तो वह इन महंगे उपकरणों को सुधार कर बहुत से सारे घटकों को कचरा बनने से बचा सकता है. लेकिन खराब हिस्सों वाले उपकरणों को नए उपकरणों से ही बदल देना ई वेस्ट के समस्या को गहरा कर देता है.

    एक खास मानसिकता जिम्मेदार
    यूनाइटेड नेशन्स यूनिवर्सिटी के मुताबिक पूरी दुनिया में हर साल 5 करोड़ टन से ज्यादा ई- वेस्ट पैदा होता है. पूरे वाणिज्यिक संसार में फैली “सुधारने की जगह बदलने” की मानसिकता इसकी जिम्मेदार है. लेकिन एक अहम काम कचरे को हटाना होता है जिससे उत्सर्जन कम होते हैं और कीमती संसाधन बचाए जा सकते हैं.

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    आधुनिक उपकरणों के हिस्सों को सुधारने (Repair) की बजाए पूरा उपकरण ही बदलने की मानसिकता सबसे नुकसानदायक है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    नए उपकरण लाने से नुकसान भी
    कई जगह कचरे में फेंके गए सर्किट बोर्ड के अध्ययनों में पाया गया है कि उनमें से बड़ी संख्या में बोर्ड सुधारे जा सकते थे. लेकिन प्रबंधन ने उस कचरे की अहमियत नहीं समझी. पुराने बोर्ड की जगह नए बोर्ड का उपयोग करना महंगा ही नहीं पड़ता, बल्कि संसाधनों का खराब उपयोग भी साबित होता है. नए बोर्ड खरीदने तक उपकरण बंद रहते हैं इससे उत्पादकता और आर्थिक नुकसान भी होता है.

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    इस वजह से भी बढ़ी ये समस्या
    ऐसे ही तौर तरीकों के कारण उद्योग में ई वेस्ट की समस्या पिछले कई दशकों से बढ़ती ही जा रही है. इसमें धारणा यह बनाई जाती है कि सुधारे गए उपकरण से नए उपकरण बेहतर काम करते हैं. मूल उपकरण निर्माता नीति में सुधार को हमेशा हतोत्साहित किया जाता है. ऐसा ना होने पर तक टेक्नीशियनों के पास जरूरी सुधार के लिए सही उपकरण नहीं होते हैं. इससे अरबों डॉलर का नुकसान होता है और टनों की मात्रा में जहरीला कचरा पैदा हो जाता है.

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    कोविड-19 महामारी का असर चिप उत्पादन (Chip production) पर पड़ा और उससे उकरणों के उत्पादन पर भी असर हुआ जिससे सुधार की जरूरत ज्यादा महसूस हुई. (फाइल फोटो)

    समय ने चेताया है हमें
    कोविड-19 महामारी ने हमें उपकरणों के हिस्सों की कमी से बखूबी वाकिफ करा दिया है. इससे कई उपकरण बनने ही बंद हो गए. वहीं उपकरणों की मरम्मत भी आसानी से उपलब्ध नहीं थी. अच्छे और काबिल टेक्नीशियन को रखना भी मुश्किल काम है. हाल ही में ‘रिप्एर डोन्ट वेस्ट’ अभियान चलाया गया जिसमें सुधार पर जोर दिए जाने की वकालत की गई. लेकिन इस दिशा में भी बहुत काम किया जाना बाकी है.

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    बेशक “बदलने की जगह सुधार” के बहुत फायदे हैं लेकिन इसे बहुत व्यापक बनाने की जरूरत है. खुद उत्पादनकर्ताओं को इसका बढ़ावा देना होगा. एमओयू में रखरखाव और जीवन चक्र समर्थन जैसी चीजों को सही तरह से शामिल करना सबसे अहम होगा. इसके लिए हर स्तर पर शिक्षा और जागरुकता भी जरूरी है. जरूरत लोगों की सोच और नजरिए में बदलाव की सबसे ज्यादा है.

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