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23 सालों में पृथ्वी ने गंवा दी 280 खरब टन बर्फ, जानिए इससे कितना खतरा है

दुनिया में बर्फ पिघलने (Ice melting) की दर में तेजी चिंता का विषय हो गया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)
दुनिया में बर्फ पिघलने (Ice melting) की दर में तेजी चिंता का विषय हो गया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

पृथ्वी (Earth) ने साल 1994 से 2017 तक 280 खरब टन बर्फ (Ice) गंवा (Loss) दी है जिसके हमारी जलवायु (climate) के लिए एक खतरनाक संकेत हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 28, 2021, 7:00 AM IST
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जलवायु परिवर्तन (Climate change) को लेकर बहुत सारे शोध नई लेकिन चेतावनी भरी जानकारियां दे रहे हैं. हाल के शोधों में ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) और अन्य जलवायु पहलुओं को लेकर बताया जा रहा है कि हालात किस तरह से बेकाबू होते जा रहे हैं. ताजा अध्ययन में बताया गया है कि पिछले 23 सालों में हमने अभूतपूर्व मात्रा में बर्फ गंवाई (Ice loss) है. जिस दर से दुनियाभर में बर्फ गायब हो रही है  यूके के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह दुनिया में क्लाइमेट वार्मिंग (Climate Warming) के अब तक के सबसे खराब हालात हैं.

सैटेलाइट से लिए आंकड़े
एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी, लीड्स यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं की एक टीम का कहना है कि दुनिया के ध्रुवों और पहाड़ी इलाकों में बर्फ जिस दर से पिघल रही है वह पिछले तीन दशकों में बहुत ज्यादा बढ़ी है. सैटेलाइट के आंकड़ों का उपोयग कर विशेषज्ञों ने पता लगाया है कि पृथ्वी ने 1994 से लेकर 2017 के बीच 280 खरब टन की बर्फ खो दी है.

कैसे बदली बर्फ पिघलने की दर
इस अध्ययन के अनुसार 1990 के दशक में बर्फ खोने की दर 8 खरब टन प्रति वर्ष से साल 2017 तक 13 अरब टन प्रतिवर्ष तक पहुंच गई थी. यह एक बहुत ही खतरनाक स्थिति मानी जा रही है. माना जा रहा है कि इसका सबसे बुरा असर दुनिया भर में तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों पर होना तय है.



गंभीर असर होगा इन इलाकों में
लीड्स के सैंटर ऑफ पोलर ऑबजर्वेशन एंड मॉडलिंग के रिसर्च फैलो डॉ थॉमस स्लैटर का कहना है कि बर्फ की चादरें  जलवायु परिवर्तन पर अंतरशासन पैनल (IPCC) के द्वारा निर्धारित के जलवायु वार्मिंग के हालातों में से सबसे खराब स्थिति में पहुंच गई हैं. समुद्र सतह तल का स्तर   जिस तरह से बढ़ रहा है उसके इसी सदी में तटीय इलाकों में रह रहे समुदायों पर गंभीर असर होगा.

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इस अध्ययन में सैटेलाइट (Satellite) के आंकड़ों का उपयोग किया था. (तस्वीर:@ChinaInSpace)


बहुत संवेदनशील रही है ऐसी जानकारी
संयुक्त राष्ट्र की आईपीसीसी से मिली जानकारी जलवायु परिवर्तन को लेकर बनने वाली अंतरराष्ट्रीय रणनीति के लिहाज से बहुत ही संवेदनशील रही है. इसमें साल 2015 का पेरिस समझौता ही शामिल हैं जिसमें ग्रीनहाउस उत्सर्जन करने वाले ज्यादातर देश  ग्लोबल वार्मिंग के असर को कम करने के लिए सहमत हुए हैं.

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किन जगहों का किया अध्ययन
यह अध्ययन यूरोपियन जियोसाइंसेस यूनियन के द साइबर स्पेस जर्नल में प्रकाशित हुआ है जो इस तरह से सैटेलाइट के आंकड़ों का उपयोग करने वाला अध्ययन अपने आप में पहला है. इस अध्ययन में पूरी दुनिया के 215 हजार पर्वतों के ग्लेशियर, ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की ध्रवीय बर्फ की चादरें, अंटार्कटिका के आसपास तैरने वाली बर्फ की चट्टानें और आर्कटिक एवं दक्षिणी महासागरों में मिलने वाली समुद्री बर्फ का सर्वेक्षण किया गया.

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बर्फ के तेजी से पिघलने (Ice melting) से अप्रत्यक्ष रूप से दुनिया के महासागरों का जलस्तर (Sea Level) बढ़ रहा है. (फाइल फोटो)


कैसे बढ़ता है इससे महासागरों में पानी
इस सर्वेक्षण में पाया गया कि पिछले तीन दशकों में सबसे ज्यादा बर्फ गंवाने का काम आर्कटिक सागर की बर्फ और अंटार्कटिका की चट्टानों में हुआ है. दोनों ही ध्रवीय महासागरों में तैरती हैं. जहां इस तरह के नुकसान का सीधे-सीधे समुद्र का जलस्तर बढ़ाने में योगदान नहीं होता है, लेकिन इससे बर्फ से सूर्य की रोशनीको प्रतिबिंबित करने का काम जरूर रुक जाता है जो अप्रत्यक्ष रूप से समुद्र तल को बढ़ाने लगता है.

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डॉ इसोबोल लॉरेंस ने बताया कि जैसे-जैसे सागरों की बर्फ सिकुड़ती है, बहुत सारी सौर ऊर्जा महासागर और वायुमंडल अवशोषित करने लगते हैं. इससे आर्कटिक बाकी ग्रह की तुलना में तेजी से गर्म होने लगता है. इससे बर्फ पिधलने की दर बढ़ने लगती है और यह ग्लेशियर और बर्फ की चादरें पिघलने लगती है जिससे  समुद्र का जलस्तर बढ़ने लगता है.
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