अब खोजी जा सकेगी चार हजार साल पुराने धूमकेतु से भी निकली उल्कावर्षा -शोध

पहली बार ऐसा दावा किया जा रहा है कि इतने पुराने धूमकेतु (Comet) के अवशेषों की जानकारी जुटाई जा सकती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

नासा (NASA) और सेटी के कैम्स अभियान की नेटवर्क वृद्धि से खगोलविद अब 4 हजार साल पुराने धूमकेतु (Comets) से निकलने उल्काओं (Meteors) की जानकारी भी हासिल कर सकेंगे.

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    टूटते तारे हमेशा से ही पृथ्वीवासियों के लिए कौतूहल का विषय रहे हैं. सदियों से बहुत सारे लोग इसका संबंध अपनी किस्मत से मानते आ रहे हैं. ये टूटते तारे दरअसल उल्का (Meteors) होते हैं जिनकी पृथ्वी (Earth) की सतह तक पहुंचने की संभावना नहीं के बराबर होती है. जब एक साथ बहुत सारे उल्का दिखाई देते हैं तो उसकी वजह धूमकेतु (Comet) होते हैं. हाल ही में शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि वे उन उल्काओं की भी खोज कर सकते है जो चार हजार साल पुराने धूमकेतु से निकले हैं.

    क्या होते हैं धूमकेतु
    धूमकेतु वे खगोलीय पिंड होते हैं जो गैस, धूल, तारों की धूल और पत्थर, खासतौर पर बर्फ की चट्टानों से बने होते हैं.  ये सूर्य का चक्कर लगाते हैं और इनकी कक्षा दो या तीन सालों से 70 हजार सालो तक हो सकती है. ताजा खोज सर्च फॉर एक्स्ट्राटेरेस्ट्रियल इंटेलिजन्स इंस्टीट्यूट, सेटी (SETI) के खगोलविदों ने की है . उनका दावा है कि वे इतने पुराने धूमकेतु के उल्काओं तक की पहचान कर सकते हैं.

    नासा और सेटी के सहयोग वाली परियोजना
    यह क्षमता नासा और सेटी के सहयोग से चलाई जा रही कैमराज फॉर ऑलस्काई मीटियोर सर्विलिएंस यानि कैम्स (CAMS) परियोजना में जोड़े गए नए नेटवर्क की वजह से आई है. इकारस जर्नल के सितंबर संस्करण में प्रकाशित मीटियॉर शॉवर सर्वे के मुताबिक ये नेटवर्क ऑस्ट्रेलिया, चिली और नामीबिया में स्थापित किए गए हैं जो खगोलविदों को रात में होने वाली उल्कावर्षा की बेहतर और संपूर्ण तस्वीर बनाने में मददगार होते हैं.

    एक बड़ी उपलब्धि
    इसी नई क्षमता का नतीजा है कि वैज्ञानिक अब यह दावा कर रहे हैं कि वे हर चार हजार साल में पृथ्वी के पास से गुजरने वाले धूमकेतुओं के द्वारा उनके रास्ते में छोड़े अवशेषों की पड़ताल भी कर सकते हैं. यह पृथ्वी के पास से गुजरने वाले पिंडों की पहचान करने के लिहाज से बहुत अहम उपलब्धि मानी जा रही है.

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    एक धूमकेतु (Comet) ग्रहों के पास बहुत से अवशेष छोड़ जाता है जिन्में उल्का प्रमुख होते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


    क्या क्या चलेगा पता
    सेटी संस्थान की ओर से जारी बयान में संस्थान के एक खगोलविद और उल्का सर्वेक्षण के एक लेखक पीटर जेनिस्केन्स ने बताया कि इससे दो हजार ईसापूर्व तक के पृथ्वी के पास आए धूमकेतुओं के उस समय के हालात के बारे में जानकारी दे सकेंगे. इतना ही नहीं इससे यह भी पता चल सकेगा कि इनमें से कौन से धूमकेतुओं ने खतरनाक उल्काओं की बारिश पृथ्वी पर की थी.

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    एक विस्तृत सर्वेक्षण होगा संभव
    जेनिस्केन्स इस कैम्स अभियान की अगुआई कर रहे हैं. इस अभियान में लो लाइट वीडियो कैमराओं का उपयोग किया जा रहा है जिससे रात के आसमान में दिखने वाली उल्कावर्षा का अवलोकन और त्रिकोणमिति सर्वेक्षण किया जा सकते. इस अभियान में उल्कापिंडों और उनके धूमकेतुओं की कक्षा और प्रेक्षपपथ को मापने का काम भी शामिल है.

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    धूमकेतु (Comet) की पूंछ हमेशा ही सूर्य से विपरीत दिशा में ही होती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


    क्या होता है धूमकेतु के सूर्य के पास आने पर
    जब कोई एक छोटे शहर के आकार का बर्फीला धूमकेतु सूर्य के पास से अपनी कक्षा में गुजरता है, वह गर्म होने से अपने पीछे गैसे और धूल छोड़ता है. यह गर्म धूमकेतु ग्रहों से भी विशाल जलते हुई सिर में बदलता है जिसकी धूल और गैस की बनी पूंछ लाखों किलोमीटर लंबी हो जाती है जो हमेशा ही सूर्य के विपरीत दिशा में होती है.

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    धूमकेतु के से निकलने वाले अवशेष उससे अलग हो जाते हैं जिन्हें उल्का कहा जाता है. यदि ये उल्का पृथ्वी के पास होते हैं तो वे वायुमंडल में प्रवेश कर जाते हैं और टूटते  हुए तारे के रूप में दिखाई देते हैं जिसे उल्कावर्षा भी कहा जाता है. रोचक बात यह है कि टूटते तारों जैसी चमक उल्का से नहीं आती बल्कि हमारे ग्रह के वायुमंडल के कैसे के घर्षण के कारण पैदा होती है.