स्टडी: खतरनाक रेडिएशन को 'नीली रोशनी' में बदल देता है ये जीव, 300 डिग्री टेम्परेचर में भी रहता है जिन्दा

एक स्टडी में पाया गया है कि धरती के सबसे कठोर जीव कहे जाने वाले 'वॉटर बीयर को पराबैगनी किरणों से कोई नुकसान नहीं पहुंचता है.
एक स्टडी में पाया गया है कि धरती के सबसे कठोर जीव कहे जाने वाले 'वॉटर बीयर को पराबैगनी किरणों से कोई नुकसान नहीं पहुंचता है.

घातक पराबैंगनी किरणों (Ultra Voilet radiation) से किसी का बचना मुश्किल है. इनकी वजह से कैंसर (Cancer) जैसी कई बीमारियां हो जाती हैं. लेकिन एक स्टडी में पाया गया है कि धरती के सबसे कठोर जीव (Earth's toughest Creature) कहे जाने वाले 'वॉटर बीयर (Water bears)' को इन किरणों से कोई नुकसान नहीं पहुंचता है. वॉटर बीयर को टार्डिग्रेड्स (Tardigrades) या मॉस पिग्लेट्स (Moss Piglets) के नाम से भी जाना जाता है. अजीब दिखने वाले ये जानवर पानी में रहते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 23, 2020, 3:50 PM IST
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इंसान जहां 50 डिग्री टेम्परेचर में परेशान हो जाता है, वहीं ये जीव 300 डिग्री टेम्परेचर (फारेनहाइट) को भी सहन कर सकते हैं. इतना ही नहीं अंतरिक्ष (Space) के ठंड और मरियाना ट्रेच (Mariana Trech) से जैसे भारी दबाव वाले क्षेत्रों में भी ये जीव आसानी से जीवित रह सकते हैं. वहीं, पिछले साल हुए एक अध्ययन से पता चला है कि लचीले छोटे जीव परमाणु विकिरण (Nuclear Radiation) के बीच 25 घंटे तक चेरनोबिल (Chernobyl) के ग्राउंड जीरो (Ground Zero) पर जीवित रह सकते हैं.

भारत के शोधकर्ताओं ने इस जीव के अंदर एक नए जीन की खोज की है - जिसे 'पैरामैक्रोबियोटस' कहा गया है, जो आल्ट्रा वॉयलेट रेडिएशन का विरोध करता है। दरअसल, 'पैरामैक्रोबियोटस (Paramacrobiotus)' एक सुरक्षात्मक फ्लोरोसेंट ढाल है जो हानिकारक पराबैंगनी विकिरण को अवशोषित करता है और इसे हानिरहित नीली रोशनी के रूप में वापस बाहर निकालता है.

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (Indian Institute of Science) के बायोकेमिस्ट हरिकुमार सुमा (Harikumar Suma) ने अपने रिसर्च पेपर में लिखा है कि हमारे अध्ययन (Study) से पता चला है कि 'पैरामैक्रोबियोटस' के नमूने यूवी प्रकाश (UV Light) के तहत प्राकृतिक प्रतिदीप्ति (Natural Fluorescence) प्रदर्शित करते हैं, जो यूवी विकिरण की घातक खुराक के खिलाफ Tardigrades की रक्षा करता है. हरिकुमार के मुताबिक, 'संभवतः इस प्रतिदीप्ति तंत्र को विकसित करने के लिए यह जीव दक्षिणी भारत के [उष्णकटिबंधीय] उच्च पराबैंगनी विकिरण - यूवी सूचकांक 10 तक पहुंच सकता है. बेंगुलुरु के इस क्षेत्र में गर्मी के मौसम में UV किरणें 4 किलोजूल प्रति वर्ग मीटर होती हैं.



रिसर्चर्स के मुताबिक, जहां सामान्य जीव रेडिएशन के बीच महज 15 मिनट ही जिन्दा रह सकते हैं, वहीं 'पैरामैक्रोबियोटस' की वजह से यह जीव न सिर्फ खुद को बचाने में सक्षम है, बल्कि रेडिएशन किरणों को सोखने के बाद अपने अंदर से हानिरहित ब्लू लाइट निकालता है. रिसर्चर्स का कहना है कि वे इस जीव से 'पैरामैक्रोबियोटस' निकालकर अन्य जीवों में भी ट्रांसफर कर सकते हैं. ऐसे में इन खतरनाक किरणों और रेडिएशन से अन्य जीव भी जीवित रह सकते हैं.
हालांकि, अन्य देशों के एक्सपर्ट इस स्टडी को अधूरा मान रहे हैं. द गार्जियन से बात करते हुए जीवविज्ञानी लुकास कैजमारेक (Łukasz Kaczmarek) ने बताया कि हमें इस स्टडी में बताया गया कि वॉटर बीयर घातक परिस्थितियों में खुद को बचाने में सक्षम हैं, लेकिन हमें यह नहीं पता है कि विशेषता उनके अंदर नैचुरल इन्वॉरमेंट की वजह से या अन्य किसी वजह से आया है. वहीं, पोलैंड के एडम मिकिविक्ज़ विश्वविद्यालय (Adam Mickiewicz University) के विशेषज्ञ ने कहा कि टीम ने पराबैंगनी किरणों से बचाने के लिए जिम्मेदार सटीक पदार्थ की पहचान नहीं की है. मुझे लगता है इन जीवों में यह विशेषता प्रतिदीप्ति की वजह से नहीं बल्कि प्रोटेक्टिव प्रोटिन्स की वजह से हो सकता है.
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