Mission Paani: मीट खाना कम कर दें तो ऐसे बचा सकेंगे पानी

खाने की मेज़ तक जो गोश्त पहुंचता है, उसपर साग-सब्जियों की तुलना में लगभग 10 गुना ज़्यादा पानी खर्च होता है.

फर्स्टपोस्ट.कॉम
Updated: July 22, 2019, 10:27 AM IST
Mission Paani: मीट खाना कम कर दें तो ऐसे बचा सकेंगे पानी
पानी बचाने का एक आसान तरीका नॉनवेज खाना छोड़ना भी है (प्रतीकात्मक फोटो)
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Updated: July 22, 2019, 10:27 AM IST
मेनका गांधी (सौजन्य: फर्स्टपोस्ट हिंदी)
भारत में, सिंचाई विभाग में एक शब्दावली का इस्तेमाल किया जाता है- 'डार्क जोन.' इसका अर्थ है ऐसा इलाका जहां किसी भी जगह पर ट्यूबवेल गाड़ना नामुमकिन है, क्योंकि जल स्तर 500 फुट से भी नीचे जा चुका है. बीते दस वर्षों में ज्यादा से ज्यादा इलाके डार्क जोन बनते गए.

लोग निजी तौर पर पानी बचाने के लिए भरपूर कोशिशें कर रहे हैं- हम दांतों को ब्रश करते वक्त नल को बंद कर देते हैं, हम किचन में इस्तेमाल किए पानी से बगीचे की सिंचाई करते हैं, और हममें से कइयों ने अपने घरों में कम पानी खर्च करने वाले शॉवर और फ्लश लगवाए हैं. लेकिन अगर हम चाहते हैं कि निकट भविष्य में कर्नाटक बनाम तमिलनाडु बनाम केरल या फिर पंजाब बनाम हरियाणा जैसे दंगों का सामना ना करना पड़े तो हमारे अर्थशास्त्रियों को हमारी प्लेटों में पहुंचने वाले खाने को तैयार करने में लगने वाले पानी की अलग-अलग मात्रा का आकलन करना होगा.

खाना तैयार करने में भी खर्च होता है पानी

हम जो भी खाना खाते हैं, उसके उगाने, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और घरों व दुकानों में डिलीवरी के लिए पानी की जरूरत होती है. एक कैलोरी मीट के लिए एक कैलोरी अनाज या सब्जी तैयार करने की तुलना में 10 गुना पानी की जरूरत होती है. एक किलो कैलोरी बीफ तैयार करने के लिए 10.19 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है, एक किलो कैलोरी पोटैटो तैयार करने में 0.47 लीटर पानी, अनाज के लिए 0.51, सब्जी के लिए 1.34 लीटर और फल के लिए 2.09 लीटर की जरूरत पड़ती है. तो हम जितना ज्यादा मीट खाते हैं, उतना ही ज्यादा पानी खर्च करते हैं. वह सिर्फ मुर्दा जानवरों का शरीर नहीं है, जो हम निर्यात कर रहे हैं. हम अपनी पूरी वाटर सप्लाई भी साथ में भेज दे रहे हैं.

एक कैलोरी मीट के लिए एक कैलोरी अनाज या सब्जी तैयार करने से ज्यादा पानी चाहिए (प्रतीकात्मक फोटो)
एक कैलोरी मीट के लिए एक कैलोरी अनाज या सब्जी तैयार करने से ज्यादा पानी चाहिए (प्रतीकात्मक फोटो)


विश्व स्तर पर, दुनिया के एक तिहाई पानी का इस्तेमाल परोक्ष, या प्रत्यक्ष रूप से पशु उत्पादन के लिए होता है. वाटर फुटप्रिंट, यानी कि उत्पादन में खर्च होने वाले पानी की मात्रा, का आकलन नीदरलैंड्स में ट्वेंटी यूनिवर्सिटी के मेकोन्नेन और होएक्सत्रा ने किया है. यह आकलन भूजल व जमीन पर उपलब्ध पानी के इस्तेमाल और खाद्यान्न के उत्पादन के दौरान प्रदूषित किए गए पानी की मात्रा पर आधारित था. अध्ययन में मीट का वाटर फुटप्रिंट खाद्यान्न और सब्जियों के मुकाबले बहुत ज्यादा पाया गया. मीट में बीफ (गोमांश) का वाटर फुटप्रिंट सबसे ज्यादा था. दुनिया भर में पशुधन उत्पादन में हर साल 2,422 अरब घनमीटर पानी खर्च होता है, जिसमें से अकेले बीफ के उत्पादन में 798 अरब घनमीटर खर्च होता है.
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‘फीड कन्वर्जन एफिशिएंसी’ क्या है?
यह मीट की एक यूनिट के उत्पादन के लिए लगने वाले इनपुट की मात्रा है. सभी किस्म के मीट में, बीफ का फीड कन्वर्जन सबसे कम है, जिसका अर्थ है कि बीफ के उत्पादन के लिए सबसे ज्यादा चारे और पानी की जरूरत होती है.
बीफ उत्पादन के लिए अलग-अलग चरण में बहुत ज्यादा मात्रा में पानी की जरूरत होती है. गाय के लिए एक टन चारा तैयार करने में औसतन 1,62,59,000 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है. मवेशी को खिलाने के लिए फसल तैयार करनी होती है जिसके उगाने में भारी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है. गाय और भैंसें रोजाना तकरीबन 20 किलो चारा खाती हैं, जिसमें धान, जवार, बरसीम, बिनौला, सरसों या मूंगफली की खली इत्यादि शामिल हैं. चूंकि इनमें से कोई भी एक किलो भोजन तैयार करने में एक मोटे अनुमान के मुताबिक 1,000-2,000 लीटर पानी खर्च होता है, हम एक अंदाजे से कह सकते हैं कि भारत में बीफ तैयार करने में इस्तेमाल होने वाले मवेशी को चारा खिलाने के लिए रोजाना 20,000-40,000 लीटर पानी खर्च होता है.

शाकाहार को बढ़ावा देना भी पानी बचाने की ओर एक कदम है (प्रतीकात्मक फोटो)
शाकाहार को बढ़ावा देना भी पानी बचाने की ओर एक कदम है (प्रतीकात्मक फोटो)


मीट पर हजारों लीटर पानी खर्च होता है

अलग-अलग मौसमों में ये मवेशी रोजाना 35-75 लीटर सीधे पानी पीते हैं. इसके बाद एक मवेशी को नहलाने-धुलाने पर रोजाना 28 लीटर पानी खर्च होता है. प्रति गाय/ भैंस तकरीबन 150 लीटर पानी धुलाई और खाद आदि हटाने पर खर्च होता है. अपने जीवन के खात्मे पर, जब मवेशी को उसके मीट के लिए मार दिया जाता है, तो बूचड़खाने में खून और दूसरे अंगों को साफ करने के लिए हर घंटे करीब 15,000 लीटर पानी खर्च किया जाता है. पैकेजिंग से पहले मीट को धोना और ट्रांसपोर्टेशन एक और बोझा है.

अगर आप इसे भी जोड़ लें और सोचें कि 300 किलो के एक मवेशी से 100 किलो मीट मिलेगा, तो एक किलो मीट के उत्पादन पर करीब 15,000 लीटर पानी का खर्च आएगा. इसकी तुलना में सिर्फ 322 लीटर में एक किलो सब्जी तैयार जाती है. 962 लीटर में फल, 1,644 लीटर में मक्का, ओट्स (जई), जौ, गेहूं जैसे अन्न और 4,055 लीटर पानी में एक किलो दाल तैयार होती है.

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मीट का उत्पादन साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है. भारत में अकेले बीफ का उत्पादन 1999-2001 में 3.1 लाख टन से बढ़कर साल 2016 में 15.6 लाख पर पहुंच गया है. यह आंकड़ा और ऊपर जाने की उम्मीद है. इसका मतलब है कि हम अपने कीमती जल-स्रोतों से खरबों लीटर पानी का इस्तेमाल खुद की प्यास बुझाने के लिए नहीं कर रहे, बल्कि इसका इस्तेमाल दुनिया का पेट भरने के लिए कर रहे हैं.

हम मध्य-पूर्व के अमीर देशों के लिए अपने ऊपर बोझा डाल रहे हैं, और वो हमारे यहां से आयात करके अपना पानी बचाते हैं. जबकि हमारे देश में कई जगह सूखा और अकाल पड़ रहा है. फूड के निर्यात में भारी मात्रा में ईंधन की जरूरत होती है, जिसके लिए एक बार फिर प्रसंस्करण में भारी मात्रा में पानी का इस्तेमाल होगा. चूंकि हम पेट्रोलियम पदार्थों का आयात करते हैं, इसलिए यह एक और बोझ होगा.

खाद्यान्न की जरूरत बढ़ेगी, उसी तरह इसे उगाने के लिए ज्यादा पानी की जरूरत होगी (प्रतीकात्मक फोटो)
खाद्यान्न की जरूरत बढ़ेगी, उसी तरह इसे उगाने के लिए ज्यादा पानी की जरूरत होगी (प्रतीकात्मक फोटो)


अगर शाकाहार की मात्रा बढ़ा दें...
डच वैज्ञानिक होएक्सत्रा ने अध्ययन में दिखाया है कि मीट-आधारित डाइट से शाकाहारी डाइट में बदलाव करके एक उपभोक्ता के फूड से संबंधित वाटर फुटप्रिंट में 36 % तक की कमी लाई जा सकती है. एक आसान से समाधान को आप भी आजमा कर देखिए- अगर आप मीट की आधी मात्रा खाते हैं तो इसका नतीजा होगा कि आप पानी की आधी मात्रा का ही इस्तेमाल करेंगे. इस कदम से दुनिया को बेहतर इस्तेमाल के लिए काफी ज्यादा पानी उपलब्ध होगा जो जरूरी खाद्यान्न संसाधन के उगाने में मददगार होगा और जानवरों के बजाय इंसानों का पोषण करेगा. आकलन के मुताबिक तीस वर्षों में दुनिया की आबादी 9.6 अरब हो जाएगी. इससे तालमेल बिठाने के लिए विश्व स्तर पर खाद्यान्न उत्पादन 70% बढ़ाना होगा और सिर्फ विकासशील देशों की बात करें तो यहां 100% बढ़ाना होगा.

तो जिस तरह ज्यादा खाद्यान्न की जरूरत बढ़ेगी, उसी तरह इसे उगाने के लिए ज्यादा पानी की जरूरत होगी. मीट पर निर्भर आबादी का पेट भर पाना फायदेमंद नहीं होगा. साथ ही साथ यह मानवाधिकार का भी मुद्दा है- यह समतामूलक नहीं होगा कि कुछ लोगों को मीट खिलाने के लिए दुर्लभ पानी खर्च किया जाए, जबकि अन्य लोगों को अनाज भी ना मिले.

डार्क एरिया एक काली परछाईं की तरह बढ़ता जा रहा है. सिर्फ वक्त की बात है कि यह आपके दरवाजे तक कब पहुंचता है और आधी रात को 2 बजे एक बाल्टी पानी लेने के लिए आपको लाइन में खड़ा होना पड़ता है. तब मीट अपने आप गायब हो जाएगा. लेकिन तब तक वो क्षति हो चुकी होगी, जिसकी कभी भरपाई नहीं की जा सकेगी.

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First published: July 22, 2019, 10:27 AM IST
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