इन देशों में आ गई मंदी, क्या हमारे यहां भी जाएंगी बड़े पैमाने पर नौकरियां

भारत समेत कई देशों के कई सेक्टर्स से नौकरियां जाने की खबरें आ रही हैं. सवाल उठने लगे हैं कि क्या दुनिया में मंदी आ चुकी है और वो कौन से देश हैं, जो मंदी की चपेट में आ चुके हैं...

News18Hindi
Updated: July 30, 2019, 3:29 PM IST
इन देशों में आ गई मंदी, क्या हमारे यहां भी जाएंगी बड़े पैमाने पर नौकरियां
दुनिया के कई देशों में इकोनॉमिक स्लोडाउन का दौर चल रहा है
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Updated: July 30, 2019, 3:29 PM IST
एक बार फिर मंदी के शोर-शराबे से दुनिया भर के लोग परेशान हैं. 2008 के बाद मंदी के एक बार फिर पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लेने की खबरों ने नई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं. कई सेक्टरों से बुरी खबरें सामने आ रही हैं. भारत में इसकी आहट से लोग खौफजदा हैं.

पहले खबर आई कि देश का ऑटो मोबाइल सेक्टर भयानक संकट से जूझ रहा है. पिछले दो वर्षों में गाड़ियों की बिक्री में काफी कमी आई है. बताया गया कि ऑटो मोबाइल सेक्टर से 10 लाख नौकरियां जा रही हैं. इसके बाद भारतीय रेलवे में छंटनी की खब ने बुरी तरह से झकझोर दिया है. खबर है कि इंडियन रेलवे बड़े पैमाने पर अपने कर्मचारियों को निकालने जा रहा है. भारतीय रेलवे अपने सभी जोन को मिलाकर 3 लाख कर्मचारियों की छंटनी करने जा रहा है. रेलवे 55 साल से अधिक उम्र वाले कर्मचारियों की परफॉर्मेंस को रिव्यू कर रहा है.

इन खबरों के बीच एक सवाल ये उठता है कि क्या दुनिया में मंदी आ चुकी है? वो कौन से देश हैं जो मंदी की चपेट में आ चुके हैं? उन देशों के क्या हाल हैं और उनका भारत में क्या असर पड़ने वाला है?

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में स्लोडाउन

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में स्लो डाउन है. इसे अब तक मंदी तो नहीं माना गया है कि लेकिन अमेरिका, मंदी से निपटने की तमाम कोशिशें कर रहा है. दुनियाभर के देश इकोनॉमिक स्लो डाउन से गुजर रहे हैं. मंदी से निपटने के लिए अमेरिका ने 1995 के बाद पांचवीं बार रेट कट कैंपेन शुरू किया है. अमेरिका में इसके पहले 1995, 1998, 2000 और 2007 में ब्याज दरों में कटौती की जा चुकी है.

मई 2019 से पहले एक साल तक अमेरिका में कंज्यूमर प्राइसेज़ में डेढ़ फीसदी का इजाफा दर्ज किया जा चुका है. जून 2009 की महामंदी के खत्म होने के दौरान अमेरिका में कंज्यूमर प्राइसेज़ की यही स्थिति थी. अमेरिका के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर ग्लोबल स्लोडाउन का सबसे ज्यादा असर पड़ा है. अमेरिकी इकोनॉमी में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का योगदान 10 फीसदी का है.

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अमेरिका में बेरोजगारी भत्ता पाने के आवेदनों की संख्या बढ़ी है, इसे मंदी का संकेत माना जा रहा है

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कई अर्थशास्त्री अमेरिका में बेरोजगारी भत्ता लेने के ज्यादा आवेदन आने को मंदी की आहट मान रहे हैं. अमेरिका में इस बारे में वीकली रिपोर्ट से अर्थशास्त्री चिंतित हैं. इन सबके बीच अर्थशास्त्री बताते हैं कि कोई जरूरी नहीं है कि अमेरिका में मंदी आए ही.

चीन की आर्थिक विकास दर पिछले 3 दशक में सबसे नीचे
चीन की आर्थिक विकास दर पिछले तीन दशकों में सबसे निचले स्तर पर जा चुकी है. अमेरिका के साथ उसके ट्रेड वॉर को इसके पीछे की वजह बताया जा रहा है. लेकिन सिर्फ यही एक वजह नहीं है. चीन की जीडीपी में दूसरे तिमाही में 6.2 फीसदी की गिरावट आई है. ये 1992 के बाद, जबसे चीन ने जीडीपी के तिमाही आंकड़े जारी करने शुरू किए हैं, अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है.

अमेरिका के साथ चीन के टैरिफ वॉर ने वहां के मैन्युफैक्चरिंग और एग्रीकल्चर सेक्टर को बुरी तरह से प्रभावित किया है. अमेरिकी कंपनियां चीन को छोड़कर वियतनाम, ताइवान, साउथ कोरिया और बांग्लादेश जैसे देशों के सप्लायर का रुख कर रही हैं.

2008 की मंदी के बाद चीन अपने ऊपर लदे कर्ज से छुटकारा पाने की जबरदस्त कोशिश कर रहा है. चीन की सरकार 40 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज के बोझ के तले दबी है. कॉरपोरेट और हाउसहोल्ड कर्ज चीन की जीडीपी के 300 फीसदी के बराबर है. दुनिया के कुल कर्ज का 15 फीसदी सिर्फ चीन ने उठा रखा है.

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चीन की अर्थव्यवस्था पिछले तीन दशक में सबसे निचले स्तर पर है


चीन की अर्थव्यवस्था में स्लोडाउन का असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है. पिछले एक दशक में वैश्विक ग्रोथ में चीन का करीब एक तिहाई योगदान रहा है. हालांकि विशेषज्ञ बता रहे हैं कि चीन की अर्थव्यवस्था में कमजोरी का भारत पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ेगा. भारत के आयात में चीन की बड़ी हिस्सेदारी है. करीब 16 फीसदी से भी ज्यादा. चीन भारत के लिए निर्यात का भी चौथा सबसे बड़ा बाजार है. भारत के निर्यात में चीन की हिस्सेदारी 4.39 फीसदी है. इसलिए भारत पर बहुत ज्यादा असर पड़ने की उम्मीद नहीं है.

इटली में पिछले एक दशक में तीसरी मंदी
इटली पिछले एक दशक में तीसरी बार आर्थिक मंदी से जूझ रहा है. इटैलियन नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्टैटिसटिक्स (ISTAT) के आंकड़े के मुताबिक यूरोज़ोन की तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी मंदी की चपेट में है. 2018 के दूसरी छमाही के बाद से ही स्थितियां खराब हैं. 2018 के आखिरी तिमाही में जीडीपी में 0.2 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. 2018 की तीसरी तिमाही में भी जीडीपी में 0.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी. लगातार गिरावट ने मंदी के संकेत को पुख्ता कर दिया है. 2013 के बाद यहां पहली बार मंदी आई है.

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इकोनॉमिक स्लोडाउन की वजह से जा रही हैं नौकरियां.


जर्मनी की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी है
जर्मनी ने अपनी आर्थिक गति खो दी है. जर्मनी की अर्थव्यवस्था के लड़खड़ाने का असर यूरो ज़ोन के दूसरे देशों पर पड़ सकता है. इसमें इटली, फ्रांस, पोलैंड और स्पेन जैसे देश शामिल हैं. जर्मनी का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर मंदा पड़ा है.

पिछले कुछ महीनों में इसमें सुस्ती देखी जा रही है. इसी से अंदाजा लगाया जा रहा है कि क्या ये मंदी की आहट है? अगर ऐसा होता है तो ये पूरे यूरो ज़ोन को अपनी चपेट में लेगा.

जर्मनी की अर्थव्यवस्था में कार बनाने वाली कंपनियों का बड़ा योगदान होता है. इसका ऑटो मोबाइल सेक्टर पूरे यूरोप में सबसे बड़ा है. स्लोडाउनका असर जर्मनी की नौकरियों पर पड़ेगा. जिसकी वजह से पूरा यूरोप प्रभावित होगा.

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First published: July 30, 2019, 3:08 PM IST
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