एक नई धातु, जो है काफी रहस्यमयी

रहस्यमयी धातु को आइंस्टीनियम नाम दिया गया

रहस्यमयी धातु को आइंस्टीनियम नाम दिया गया

पचास के दशक से वैज्ञानिक जिस धातु के बारे में जानने की कोशिश कर रहे थे, उसपर पहली बार कुछ जानकारियां सामने आई हैं. रहस्यमयी धातु को आइंस्टीनियम (Einsteinium) नाम दिया गया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 22, 2021, 11:18 AM IST
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कोरोना के दौरान वैसे तो दुनिया का बड़ा हिस्सा रुका हुआ है लेकिन विज्ञान की दुनिया में लगातार प्रयोग चल रहे हैं. हाल ही में बर्कले लैब में वैज्ञानिकों की टीम ने एक नई धातु की खोज की, जिसे वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के नाम पर आइंस्टीनियम नाम दिया गया. ये धातु पहले हाइड्रोजन बम के मलबे में साल 1952 में मिली थी, लेकिन अब जाकर इस बारे में ज्यादा जानकारियां सामने आ सकी हैं.

पहला हाइड्रोजन बम विस्फोट 1 नवंबर साल 1952 में प्रशांत महासागर में किया गया था. ये विस्फोट एक परीक्षण का हिस्सा था. इसी विस्फोट से निकले मलबे में एक अलग तरह की धातु मिली. बेहद रेडियोएक्टिव इस धातु के बारे में तब से जानने की कोशिश हो रही थी. हालांकि ये काफी मुश्किल हो रहा था क्योंकि तत्व काफी सक्रिय था और उसे बनाना मुश्किल था.

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अब वैज्ञानिक पत्रिका नेचर में इस बारे में स्टडी आई है, जिसमें पहली बार इस धातु के बारे में चुनिंदा जानकारियां साझा की गईं. इसमें 50 के दशक में हुए शोध से लेकर अब तक की जानकारियां दी गई हैं. दक्षिण प्रशांत महासागर के एक छोटे से द्वीप Elugelab पर हाइड्रोजन बम का विस्फोट किया गया. इससे जो धमक हुई, वो उस धमाके से 500 गुना से भी ज्यादा थी, जो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नागासाकी में हुआ था.

Einsteinium
धातु पहले हाइड्रोजन बम के मलबे में साल 1952 में मिली थी- सांकेतिक फोटो (pixabay)

विस्फोट के बाद जो मलबा मिला, उसे वैज्ञानिकों ने इकट्ठा किया और कैलीफोर्निया के बर्कले की लैब में परीक्षण के लिए भेजा गया. इस दौरान बड़े-बड़े वैज्ञानिकों की टीम ने मलबे में एक नई धातु पाई, जिसमें 200 से ज्यादा एटम महीनेभर के भीतर खोज लिए गए. हालांकि इससे ज्यादा जानकारी फिर वे नहीं निकाल सके. इस बीच रहस्यमयी और अज्ञात होने के कारण धातु को महान वैज्ञानिक आइंस्टीन के नाम पर आइंस्टीनियम कहा गया.

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धातु बेहद ज्यादा रेडियोएक्टिव थी इसलिए इस पर प्रयोग नहीं हो पा रहा था. मालूम हो कि रेडियोएक्टिव पदार्थ स्वयं विघटित होता है. इससे जो विकिरण निकलती है, वो आसपास के लिए काफी हानिकारण होती है. यानी धातु पर काम कर रहे वैज्ञानिकों की जान पर भी इससे खतरा हो सकता था. इससे गामा किरण निकलती है, जिससे कैंसर का खतरा रहता है और अलग किसी तरह की प्रतिक्रिया हुई तो जान का भी खतरा रहता है.

Albert Einstein
धातु को वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के नाम पर आइंस्टीनियम नाम दिया गया

यही देखते हुए वैज्ञानिकों ने धातु की 250 नैनोमीटर से भी कम मात्रा लेकर उसपर लैब में काफी सावधानी से प्रयोग शुरू किया. ये माज्ञा इतनी कम थी जो नग्न आंखों से देखी नहीं जा सकती. हाइड्रोजन विस्फोट के बाद भी धातु की मात्रा काफी कम थी और इसे बनाने की कोशिश में लगभग 9 साल लगे. अब इतने सालों की मेहनत के बाद समझ आ रहा है कि शायद ये धातु पहले भी धरती पर रही होगी लेकिन बहुत ज्यादा क्रियाशील होने के कारण ये गायब हो गई.

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जिन वैज्ञानिकों ने इस धातु को देखा था, वो इसे चांदी के रंग का और काफी नर्म बताते थे. साथ ही अंधेरे में ये नीले रंग का दिखता है लेकिन तुरंत प्रतिक्रिया के कारण और बेहद खतरनाक होने के कारण इसे देखना संभव नहीं.

आइंस्टीनियम नाम की इस धातु पर प्रयोग अब भी चल रहा है, हालांकि इसके उपयोग के बारे में वैज्ञानिकों को खास जानकारी नहीं. केमिकल वर्ल्ड (Chemical World) ने अपने पॉडकास्ट में कहा था कि इस रेडियोएक्टिव धातु का कोई इस्तेमाल शायद ही हो सके. कम से कम फिलहाल तक तो यही समझ आ सका है.

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