जब सरदार पटेल के बड़े भाई ने नेताजी सुभाष बोस के नाम कर दी थी अपनी वसीयत

सरदार वल्लभभाई पटेल के बड़े भाई थे विट्ठलभाई. कांग्रेस के बड़े नेताओं में एक. वो भी बैरिस्टर थे. बाद में छोटे भाई से मतभेद हुए और बरकरार रहे

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: October 31, 2018, 9:42 AM IST
जब सरदार पटेल के बड़े भाई ने नेताजी सुभाष बोस के नाम कर दी थी अपनी वसीयत
नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ विट्टल भाई पटेल (फाइल फोटो)
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: October 31, 2018, 9:42 AM IST
लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल को हम सब जानते हैं लेकिन उनके बड़े भाई विट्ठलभाई पटेल हम कम जानते होंगे. दोनों भाइयों में बाद के दौर में मतभेद हो गए थे. विट्ठलभाई का निधन आस्ट्रिया में हुआ. उससे पहले उन्होंने वहीं अपनी वसीयत की और अपनी संपत्ति का तीन चौथाई हिस्सा सुभाष चंद्र बोस को दे दिया.
इस वसीयत पर वल्लभभाई पटेल ने कई वाजिब सवाल खड़े किए. उन्होंने जब इस वसीयत को मानने से मना कर दिया तो नेताजी सुभाष चंद्र बोस अदालत पहुंचे लेकिन वहां उनके हाथ नाउम्मीद ही लगी.
विट्ठलभाई पटेल के विश्वस्त सहयोगी गोवर्धन आई पटेल ने उनकी बॉयोग्राफी लिखी है.

ये "विट्ठलभाई पटेलःलाइफ एंड टाइम्स" के नाम से प्रकाशित हुई. इस किताब में बताया गया कि किस तरह दोनों भाई कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में थे लेकिन फिर विट्ठल ना केवल अपने छोटे भाई से दूर होते गए बल्कि उन्होंने सुभाष के साथ मिलकर गांधीजी के नेतृत्व पर सवाल भी खड़े किए.

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1932 में विदेश चले गए
विट्ठलभाई पटेल केंद्रीय संविधान सभा के पहले निर्वाचित अध्यक्ष थे. वो मुंबई के मेयर भी बने. साथ ही बाम्बे काउंसिल के सदस्य भी रहे. वो 1920 के दशक और उसके बाद कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में थे. कई बार आजादी के आंदोलन में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार भी किया. 1932 में विट्ठलभाई जेल में थे. अंग्रेजों ने उन्हें हेल्थ ग्राउंड पर रिहा कर दिया. मार्च 1932 में उन्होंने भारत छोड़ दिया. फिर वो कभी जिंदा भारत नहीं लौटे.
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पहले वो अमेरिका गए. वहां भारत की आजादी पर लेक्चर देते रहे. फिर आस्ट्रिया आ गए. उस समय वहां सुभाष बोस भी थे. दोनों ने वहीं से संयुक्त बयान जारी करके गांधी की लीडरशिप को नाकाम कहा. इसकी आलोचना भी की.

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जब 1922 में चौरी चौरा कांड के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस लिया तो कांग्रेस के कई सीनियर नेताओं ने उनके इस कदम की बहुत आलोचना की. कई ने पार्टी छोड़कर नई पार्टी का गठन किया. विट्ठलभाई उन्हीं नेताओं में थे. उन्होंने चित्तरंजन दास देशबंधु और मोतीलाल नेहरू के साथ स्वराज पार्टी के नाम से नई पार्टी बनाई.

सरदार पटेल के बड़े भाई विट्ठलभाई कांग्रेस के बड़े नेता थे. उनका निधन आस्ट्रिया में हुआ (फाइल फोटो)


आस्ट्रिया में विट्टल ने क्लिनिक में लिखी वसीयत
आस्ट्रिया में ही विट्ठल गंभीर तौर पर बीमार पड़े. उन्हें जिनेवा के करीब एक क्लिनिक में भर्ती कराया गया लेकिन वो बच नहीं सके. 22 अक्टूबर 1933 को उनकी मृत्यु हो गई. उन्होंने निधन से पहले गोवर्धन आई पटेल और कई लोगों की मौजूदगी में वसीयत लिखी. इस मौके पर सुभाष भी वहां मौजूद थे. वसीयत को लागू करने की जिम्मेदारी उन्होंने गोवर्धन पटेल और डॉक्टर डीटी पटेल को सौंपी.

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विट्ठल के अंतिम संस्कार में नहीं पहुंचे वल्लभ
विट्ठलभाई का शव जब भारत पहुंचा तो वल्लभ नासिक जेल में थे. दोनों भाइयों में इससे पहले ही ना जाने कैसे गलतफहमी पैदा हो गई कि वो आपस में एक दूसरे को नजरंदाज कर रहे हैं.

विट्ठलभाई पटेल ने 1922 के असहयोग आंदोलन की नाकामी के बाद गांधीजी को छोड़कर नई पार्टी बनाई थी (फाइल फोटो)


विट्ठलभाई के अंतिम संस्कार से पहले कोशिश की गई कि वल्लभ को पेरोल मिल जाए ताकि वो अंतिम संस्कार में शामिल हो सकें. अंग्रेजों ने कुछ ऐसी शर्तें लगा दीं कि वल्लभ को लगा कि ये शर्तें मानना आत्मसम्मान के खिलाफ होगा, लिहाजा उन्होंने इसे मानने से इनकार कर दिया. वो बाहर नहीं आ सके. विट्ठलभाई के कोई संतान नहीं थी, ऐसे में वल्लभभाई के बड़े बेटे दाहयाभाई ने उनका अंतिम संस्कार किया.

वल्लभ ने उठाए वसीयत पर सवाल
जब वसीयत की मूल कॉपी नासिक जेल में ही वल्लभभाई को दिखाई गई तो उन्होंने वसीयत में हस्ताक्षर के प्रमाणीकरण पर कई सवाल उठाए, जो एक कानून जानकार होने के नाते बहुत वाजिब थे.

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उन्होंने ये भी सवाल किया कि अगर जिनेवा में तब विट्ठलभाई के तीन परिचित भूलाभाई देसाई, वालचंद हीराचंद और अंबालाल साराभाई भी मौजूद थे तो उन्हें मौके पर क्यों नहीं बुलाया गया. वसीयत करते समय तीन बंगाल के लोग ही वहां क्यों थे. इनमें एक सुभाष और दो आस्ट्रिया में अध्ययन कर रहे बंगाली स्टूडेंट थे.

क्यों सुभाष को वसीयत में दी थी संपत्ति
ऐसे में गोवर्धन पटेल ने सुभाष को कई पत्र लिखकर इन सवालों पर जवाब देने को कहा. कोई जवाब नहीं आया. तब गोवर्धन पटेल ने वसीयत हाईकोर्ट में पेश कर दी.

बाद के दिनों में जब वसीयत को लेकर विवाद बढ़ा तो इसका असर सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल के रिश्तों पर भी दिखने लगा (फाइल फोटो)


वसीयत में विट्ठलभाई ने सुभाष को क्यों अपनी तीन चौथाई संपत्ति देने की घोषणा की थी, हालांकि ये बात समझ से बाहर थी कि उन्होंने ऐसा क्यों किया. वैसे वसीयत में कहा गया था कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि सुभाष इस संपत्ति के जरिए आजादी की लड़ाई को आगे बढ़ा सकें.

बिगड़ते गए सुभाष और वल्लभ के ताल्लुकात
वसीयत के चलते सुभाष और वल्लभभाई के ताल्लुकात बिगड़ते गए. सुभाष जब 1938 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने तब वल्लभभाई पटेल ने उन्हें प्रस्ताव दिया कि वसीयत के धन को कांग्रेस की एक समिति को दे दिया जाना चाहिए. सुभाष सहमत थे लेकिन समिति को लेकर विवाद हो गया.

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सुभाष हाईकोर्ट में हार गए
बाद में बांबे हाईकोर्ट में जस्टिस बीजे वाडिया ने वल्लभ को उनके बड़े भाई की संपत्ति का कानूनी वारिस माना. वल्लभभाई ने घोषणा की कि ये संपत्ति विट्ठलभाई मेमोरियल ट्रस्ट को दी जाएगी. सुभाष ने इसके खिलाफ अपील की. शरतचंद्र बोस उनके वकील थे.

सरदार पटेल बाद में वसीयत का मुकदमा जीत गए और उन्होंने ये पूरी संपत्ति विट्टलभाई पटेल मेमोरियल ट्रस्ट को दे दी (फाइल फोटो)


सितंबर 1939 में चीफ जस्टिस सर जॉन ब्यूमांट और जस्टिस एचजे कानिया ने पुराने फैसले को बहाल रखा. एक साल बाद वल्लभभाई ने भाई की संपत्ति को बेचकर मिले एक लाख 20 हजार रुपए ट्रस्ट को दे दिये.

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First published: October 31, 2018, 8:00 AM IST
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