Exit Poll 2018: प्री, पोस्ट और एग्जिट पोल में क्या है फर्क?

Election 2018 Exit Poll: क्यों, क्या और कैसे तैयार किया जाता है आपको दिखाया जाने वाला प्री पोल, पोस्ट पोल, और एग्जिट पोल.

Pankaj Kumar | News18Hindi
Updated: December 11, 2018, 9:07 AM IST
Exit Poll 2018: प्री, पोस्ट और एग्जिट पोल में क्या है फर्क?
सांकेतिक तस्वीर
Pankaj Kumar | News18Hindi
Updated: December 11, 2018, 9:07 AM IST
राजस्थान और तेलंगाना में वोटिंग के बाद हर न्यूज चैनल पर एग्जिट पोल-एग्जिट पोल सुनाई दिया. लेकिन हर किसी के अलग जुमले, अलग आंकड़े और चेहरे. यहाँ पढ़िए कैसे जमाई जाती है आंकड़ों की ये रबड़ी. क्यों, क्या, कैसे और कब, मिला कर तैयार किया जाता है आपको दिखाया जाने वाला प्री पोल, पोस्ट पोल, और एग्जिट पोल.

इन तीनों को समझने के लिए सबसे पहले आपको ओपिनियन पोल समझना पड़ेगा क्योंकि ये तीनों ही तरीके के पोल, ओपिनियन पोल से उपजते हैं.

ओपिनियन पोल क्या है?
ओपिनियन पोल का सीधा मतलब है जनता की राय. जनता की राय को समझने या मापने के लिए अलग – अलग तरह के वैज्ञानिक तरीकों का प्रयोग किया जाता है.

चुनावी सर्वे में हमेशा रैंडम सैंपलिंग का ही प्रयोग होता है. देश की बड़ी सर्वे एजेंसी लोकनीति – CSDS भी रैंडम सैंपलिंग ही करती है. इसमें सीट के स्तर पर, बूथ स्तर पर और मतदाता स्तर पर रैंडम सैंपलिंग होती है. मान लीजिए किसी बूथ पर 1000 मतदाता है. उसमें से 50 लोगों का इंटरव्यू करना है. तो ये 50 लोग रैंडम तरीके से शामिल किए जाएंगे.

तो इसके लिए एक हज़ार का 50 से भाग दिया तो उत्तर आ गया 20. इसके बाद वोटर लिस्ट में से कोई एक ऐसा नंबर रैंडम आधार पर लेंगे जो 20 से कम हो. जैसे मान लीजिए आपने 12 लिया. तो वोटर लिस्ट में 12वें नंबर पर जो मतदाता होगा वो आपका पहला उत्तरदाता है

जिसका आप इंटरव्यू करेंगे, फिर उस संख्या 12 में आप 20, 20 ,20 जोड़ते जाइये और जो संख्या आए उस नंबर के मतदाता का इंटरव्यू करते जाइए.
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ओपिनियन पोल की तीन शाखाएं हैं. प्री पोल, एग्जिट पोल और पोस्ट पोल. आम तौर पर लोग एग्जिट पोल और पोस्ट पोल को एक ही समझ लेते हैं लेकिन ये दोनों एक दूसरे से काफी अलग हैं.

प्री पोल क्या होता है?
चुनाव की घोषणा के बाद और मतदान तिथि से पहले जो सर्वे होते हैं उन्हें प्री पोल कहा जाता है. जैसे मान लीजिए कि राजस्थान में चुनाव 7 दिसंबर को है और चुनाव की घोषणा 6 अक्टूबर को होती है तो ऐसी स्थिति में 6 अक्टूबर के बाद और 7 दिसंबर के पहले जो सर्वे होंगे उन्हें प्री पोल कहा जाएगा.

एग्जिट पोल क्या है?
एग्जिट पोल हमेशा मतदान के दिन ही होता है. एग्जिट पोल में मतदान देने के तुरंत बाद जब मतदाता पोलिंग बूथ से बाहर निकलता है तो उसकी राय पूछी जाती है और फिर उसका विश्लेषण किया जाता है. इसे एग्जिट पोल कहते हैं.

जैसे मान लीजिए कि 7 दिसंबर को राजस्थान में चुनाव है और शाम 7 बजे आप राजस्थान का चुनावी सर्वे देख रहे हैं. यानी की आप एग्जिट पोल देख रहे हैं. क्योंकि मतदाता जैसे ही वोट देकर बाहर निकलता है उसकी राय पूछी जाती है और फिर इकट्ठा की गई जानकारियों का विश्लेषण किया जाता है.

आमतौर पर टीवी चैनल चुनाव खत्म होने के तुरंत बाद एग्जिट पोल ही दिखाते हैं. कई बार आपने ध्यान दिया होगा कि एग्जिट पोल गलत हो जाते हैं. इसकी चर्चा इस लेख के आखिर में करेंगे.

पोस्ट पोल क्या बला है?
पोस्ट पोल हमेशा मतदान के बाद होता है. यानी की मतदान के अगले दिन या फिर उसके एक दो दिन बाद. जैसे मान लीजिए कि 7 दिसंबर को राजस्थान में चुनाव है और सर्वे करने वाला व्यक्ति 8 दिसंबर, 9 दिसंबर या फिर 10 दिसंबर को जाकर मतदाता की राय ले तो उसे पोस्ट पोल सर्वे कहेंगे. पोस्ट पोल सर्वे, एग्जिट पोल सर्वे के मुकाबले परिणाम के ज्यादा करीब होते हैं.

तो एग्जिट पोल गलत क्यों होते हैं?
अगर आप आंकड़ों को देखें तो प्री पोल या पोस्ट पोल के मुकाबले एग्जिट पोल के गलत होने की संभावना ज्यादा होती है क्योंकि एग्जिट पोल की प्रक्रिया में उन वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग नहीं हो पाता है जो पोस्ट पोल या प्री पोल में अपनाई जाती है.

जैसे पोस्ट पोल में रैंडम सैंपलिंग की जाती है. विधानसभा के स्तर पर भी, बूथ के स्तर पर भी और मतदाता के स्तर पर भी. लेकिन ये प्रक्रिया का ठीक तरीके से पालन एग्जिट पोल में नहीं हो पाता है क्योंकि उसी दिन आपको रिजल्ट भी देना होता है.

एग्जिट पोल के गलत होने की तीन खास कारण हैं- 
1. रिप्रजेंटेटिव सैंपलिंग के लिए रैंडम सैंपलिंग विधि का प्रयोग किया जाता है लेकिन जब आप एग्जिट पोल कर रहे होते हैं तब रैंडम सैंपलिंग नहीं हो पाती है. जैसे मान लीजिए कि तय किया गया कि हर 10वें मतदाता का आप इंटरव्यू करेंगे लेकिन जब तक आप 10वें से बात कर रहे होते हैं उस दौरान उसके आगे के मतदाता निकल चुके होते हैं. आप 10वें नंबर से बात रह रहे हैं और 40वां वोट देकर निकल गया. इस तरह आपकी सैंपलिंग गलत हो जाती है. यही बात बूथ स्तर पर भी लागू होती है. आप बूथ की सैंपलिंग भी नहीं कर पाते हैं.

2. दूसरी अहम बात मतदाता के मनोवैज्ञानिक दबाव की है. मतदान गुप्त होता है और पोलिंग बूथ पर आमतौर पर मतदाता अपने मत का खुलासा नहीं करना चाहेगा. वैसे मतदाता तीन तरह के होते हैं. पार्टी के प्रतिबद्ध मतदाता, शांत मतदाता और फ्लोटिंग मतदाता. इनमें से पार्टी के प्रतिबद्ध मतदाता ही डंके की चोट पर अपने वोट का खुलासा कर देते हैं. शांत मतदाता और फ्लोटिंग वोटर्स कभी भी पोलिंग बूथ पर अपने मत का खुलासा नहीं करते हैं. इसलिए एग्जिट पोल में उनकी राय खुलकर सामने नहीं आ पाती है लकिन जब आप पोस्ट पोल में इनके घर जाकर इनसे सवाल पूछते हैं तो वहां पोलिंग बूथ के मुकाबले प्राइवेसी ज्यादा होती है और वो वहां अपनी राय खुलकर रख पाते हैं.

3. तीसरा और एक अहम् कारण यह भी है कि अगर सर्वे करने वाला सजग मेहनती और पूरी तरह से ये काम करने का इच्छुक ना हो तो भी सर्वे के रिज़ल्ट गलत ही आते हैं. और ऐसा होना दुर्लभ नहीं है.

यह भी पढ़ें: क्या हैं एग्जिट पोल्स, कितने सटीक होते हैं उनके रिजल्ट्स?
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