डार्क मैटर मापने का नया तरीका, आइंस्टीन के सिद्धांत ने की मदद

ब्रह्माण्ड (Universe) में मौजूद डार्कमैटर (Dark Matter) को उसके प्रभाव के जरिए मापने की कोशिश हुई है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)
ब्रह्माण्ड (Universe) में मौजूद डार्कमैटर (Dark Matter) को उसके प्रभाव के जरिए मापने की कोशिश हुई है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

डार्क मैटर (Dark Matter) की मात्रा को मापने के लिए शोधकर्ताओं ने अलबर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein) के सापेक्षता के सिद्धांत (Theory of Relativity) के वीक ग्रेविटेशनल लेंसिंग सिद्धांत का उपयोग किया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 8, 2020, 5:07 PM IST
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ब्रह्माण्ड (Universe) का 85 प्रतिशत भार दिखाई नहीं दे पाता है. साधारण पदार्थ (Normal Matter) की तुलना में यह डार्क मैटर (Dark Matter) प्रकाश (Light) से अंतरक्रिया नहीं करता है इसलिए इसे सीधे तौर पर अवलोकित नहीं किया जा सकता है. डार्कमैटर की मौजूदगी को साबित करने के प्रयास तो चल ही रहे हैं, लेकिन इसकी मात्रा को मापने (Measure) का भी वैज्ञानिकों ने एक नया तरीका निकाला है.

डार्कमैटर को मापने की चुनौती
ऐसे में वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही आया कि उस चीज को कैसे मापा जाए जिसे देका नहीं जा सकता है. इस मामले में सबसे अहम यही था कि गुरुत्व के उस प्रभाव को नापा जाए जो डार्क मैटर से पैदा होता है. खगोलविदों की एक टीम ने डार्क मैटर के हालोस को नापने के नया तरीका निकाला. उनहोंने ऐसी तकनीक निकली जो इससे पहले के तरीकों से दस गुना ज्यादा सटीक है.

इस तकनीक का उपयोग
खगोलविदों ने  मुख्य रूप से एक खास प्रभाव पर जोर दिया जिसे वीक ग्रैविटेशनल लेंसिंग (Weak Gravitational Lensing) कहा जाता है. यह खास प्रभाव आइंस्टीन Albert Einstein) के सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत (General Theory of Relativity) का हिस्सा है.



तस्वीरों की विकृति
एसोसिएट प्रोफेसर एडवर्ड टेलर ने कहा, “डार्क मैटर किसी भी चीज की तस्वीर को हल्का से विकृत कर देता है जो उसके पीछे होती है.  यह प्रभाव एक तरह से वाइन ग्लास से अखबार पढ़ने जैसा है” टीम ने ऑस्ट्रेलिया के एक 2.3 मीटर के ANU टेलीस्कोप का उपयोग एक नक्शा बनाने के लिए किया कि ग्रैविटेशनल लेंसिंग से प्रभावित गैलेक्सी कैसे घूम रही हैं.

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डार्कमैटर (Dark Matter) पर प्रकाश (Light) का कोई असर नहीं होता इसलिए उसे मापना बहुत मुश्किल है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


तुलना करने से चलेगा पता
स्विनबर्न यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के पीएचडी छात्र पो गुरी ने बताया, “क्योंकि हम जानते हैं कि किसी गैलेक्सी में तारों और गैसों को कैसे गतिविधि करना चाहिए,  हम मौटे तौर पर जानते हैं कि गैलेक्सी कैसी दिखाई देनी चाहिए. यह माप कर कि गैलेक्सी की वास्तविक तस्वीरें कितनी विकृत हुई हैं, हम पता लगा सकते हैं कि कितने डार्क मैटर से यह विकृति आई होगी.

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लेंसिग के प्रभाव से मापन
इस अध्ययन से पता चला है कि इस जानकारी से लेंसिंग के प्रभाव का सटीक मापन हो सकेगा, बजाए की केवल आकार के ही उपयोग से. इस नए तरीके से डार्कमैटर को देखने से टीम को उम्मीद है कि उन्हें बेहतर जानकारी मिल सकेगी कि डार्क मैटर कहां है. टीम उम्मीद करती है उसे डार्क मैटर की मौजूदगी की बेहतर जानकारी मिल सकेगी और साथ यह भी पता चलेगा कि गैलेक्सी के निर्माण में उनकी क्या भूमिका होती है.

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सुदूर गैलेक्सी (Galaxy) की ली गई तस्वीरों में विकृति (Distortation) से डार्कमैटर (Dark Matter) की मात्रा का पता लगाने की कोशिश की गई है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: M81@chandraxray)


भविष्य की तकनीकों से आस
भविष्य के अभियान जैसे की नासा का नैन्सी ग्रेस रोमन स्पेस टेलीस्कोप और यूरोपीय स्पेस ऐजेंसी का यूक्लिड स्पेस टेलीस्कोप, को इसी तरह के मापन करने के लिए डिजाइन किया जा रहा  जो करोड़ों गैलेक्सियों के आकार के आधार पर होगा.

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टेलर ने कहा, “हमने दिखाया है कि हम समस्या को केवल अलग ही नजरिए से देखकर इन वैश्विक प्रयासों में 1980 के दशक के छोटे टेलिस्कोप के जरिए वास्तव में योगदान दे सकते हैं.
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