भारत में आज ही के दिन 1977 में खत्म हुआ था आपातकाल, जानिए कैसे

मोरारजी देसाई और अन्य  जनता दल नेताओं ने 1977 के चुनावों (1977 Elections) को जनमत संग्रह कहा था. (तस्वीर: Wikimedia commons)

मोरारजी देसाई और अन्य जनता दल नेताओं ने 1977 के चुनावों (1977 Elections) को जनमत संग्रह कहा था. (तस्वीर: Wikimedia commons)

21 मार्च 1977 के दिन ही 19 महीनों से भारत में लगा आपातकाल (Emergency) समाप्त हो गया था. इस समय को देश (India) के लोकतंत्र (Democracy) का सबसे बड़ा धब्बा माना गया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 21, 2021, 6:54 AM IST
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भारतीय लोकतंत्र (Indian Democracy) के इतिहास (History) में 23 जून 1975 के बाद के 19 महीनों के आपातकाल (Emergency) के समय काले दौर के रूप में याद किया जाता है. इसका खात्मा 21 मार्च 1977 को हुआ था जिसे लोकतंत्र की जीत की तरह से मनाया जाता है. आपातकाल में जिस तरह से लोगों को मौलिक अधिकारों का हनन किया गया था, उसे भारत में लोकतंत्र की हत्या की तरह देखा गया था. इसका जवाब भारत के लोगों ने उस  समय के सत्तासीन लोगों को चुनाव में सबक सिखा कर दिया था जिससे देशमें लोकतंत्र की बहाली हुई थी.

कब लगा था आपातकाल

25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी को घोषणा की थी 25 और 26 जून 1975 की रात आदेश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत के साथ देश में आपातकाल लागू हो गया. इसके बाद देश भर में तानाशाही आदेशों की बाढ़ आ गई. लोगों के मौलिक अधिकारियों को सीमित कर दिया.

क्या थी वजह
यह आपातकाल संविधान का उपयोग करते हुए ही लगाया था. इंदिरा गांधी ने संविधान की धारा 352 का उपयोग किया था. यह सब न्यायपालिक के उस आदेश के बाद हुआ था जिसमें 1971 में इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध करार देने वाले इलाहबाद हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया  गया था.

लाखों लोगों की गिरफ्तारी

आपातकाल में कई तरह के काले कानून लागू किए गए. लाखों लोगों को गिरफ्तार किया गया. लोगों की जबरन नसबंदी कराई गई. प्रेस की आजादी छीन ली गई. सरकार का विरोध करने पर मीसा और डीआईआर जैसे कानूनों का उपयोग कर देश में एक लाख ग्यारह हजार लोग जेल में बंद कर दिए गए.



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इन चुनावों (1977 Elections) में संजय गांधी और इंदिरा गांधी दोनों को हार का सामना करना पड़ा. (फाइल फोटो)


1977 में चुनाव

आपातकाल कि मियाद छह महीने तक रहती है जिसके बाद चुनाव होना चाहिए था, लेकिन  इंदिरा गांधी ने चुनाव टालते-टालते 18 महीने का समय ले लिया. जिसके बाद मार्च 1977 में चुनाव हुए. पूरे देश में विरोध तीव्र था और जेल में बंद सभी बड़े, छोटे नेताओं और प्रदर्शनकारियों को रिहा कर दिया गया. सभी विपक्षी पार्टियां कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हो गईं और जनता पार्टी के नाम से एक नई पार्टी का गठन किया गया.

पूरी तरह से पलट गए हालात

इस चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस के आपातकालीन जुल्मों को मुद्दा बनाया जिससे कांग्रेस की जबर्दस्त हार हुई. यहां तक कि इंदिरा गांधी और संजय गांधी तक चुनाव हार गए. नतीजे पूरी तरह से बता रहे थे कि जनता और प्रेस तक उस सरकार के पूरी तरह से खिलाफ हो गए थे. और जयप्रकाश नारायण लोकतंत्र के प्रतीक बन चुके थे.

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पूरी तरह से चौंकाने वाले नतीजे

आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस को 1977 के चुनावों में करारी शिकस्त मिली थी. कांग्रेस को सिर्फ 154 सीटें मिलींजनता पार्टी और गठबंधन को 542 में से 330 सीटें मिलीं. 295 सीटें अकेले जनता पार्टी के खाते से थीं. बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब के हर चुनाव क्षेत्र में कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा. राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस सिर्फ एक सीट ही जीत सकी.

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इन चुनावों (1977 Elections) में इंदिरा गांधी के निरंकुश शासन जनता ने उखाड़ फेंका था. (फाइल फोटो)


पहली बार ऐसी सरकार

भारत में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार देखने को मिलने वाली थी. यह चुनाव भारतीय लोकतंत्र में जान फूंकने वाला माना जा रहा था. जनता पार्टी से लोगों को बहुत उम्मीदें थी, लेकिन गुटबाजी ने 18 महीने में ही इस सरकार का अंत ला दिया और मोरारजी देसाई के नेतृत्व की सरकार ने अपना बहुमत खो दिया. लेकिन 21 मार्च को भारतीय लोकतंत्र में ऐतिहासिक दिन माना जाता है.

जब महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ टैगोर की हुई मुलाकात

साल 1977 के आम चुनावों के बाद जब जनता पार्टी को बहुमत हासिल हुआ तो पूरी दुनिया दंग रह गई. यकीन ही नहीं हुआ कि भारत में अब भी लोकतंत्र जिंदा है. इमरजेंसी की आग में झुलस चुके देशवासियों ने अपना फैसला सुना दिया था. पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. लेकिन जिस भरोसे के साथ लोगों ने जनता पार्टी को गद्दी में बिठाया. उस भरोसे पर पार्टी खरी नहीं उतर पाई.
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