ये अंग्रेज़ महिला अंबेडकर पर रीझी और पीछे-पीछे चली आई इंडिया

इंग्लैंड में पढाई के दौरान फ्रांसिस और अंबेडकर करीब आ गए थे. कुछ की नजर में ये एक प्लेटोनिक रिश्ता था. लेकिन इन 92 पत्रों में फ्रांसिस का अंबेडकर के प्रति अपनत्व झलकता है और प्यार भी. आज है अंबेडकर का महापरिनिर्वाण दिवस.

News18Hindi
Updated: December 6, 2018, 11:08 AM IST
ये अंग्रेज़ महिला अंबेडकर पर रीझी और पीछे-पीछे चली आई इंडिया
डॉ बीआर अंबेडकर
News18Hindi
Updated: December 6, 2018, 11:08 AM IST
ये वर्ष 2005 के आसपास की बात है. डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और अंग्रेज महिला फ्रांसिस फिट्जेराल्ड के बीच लंबे पत्राचार को किताब के रूप में प्रकाशित करने की योजना बनाई गई. ये कुल मिलाकर 92 पत्र थे, जिनसे जाहिर होता है कि इंग्लैंड में पढ़ाई के दौरान फ्रांसिस और अंबेडकर करीब आ गए थे. कुछ की नजर में ये एक प्लेटोनिक रिश्ता था.

इन 92 पत्रों में फ्रांसिस का अंबेडकर के प्रति अपनत्व झलकता है और प्यार भी. उनके प्रति फिक्र भी और कुछ हद तक अधिकार की भावना भी. कुछ पत्र प्यार के अहसासों में डूबे हुए थे.

किताब के लेखक थे प्रोफेसर अरुण कांबले, जो न केवल अंबेडकर के विश्वस्त सहयोगी थे बल्कि अंबेडकर पर साहित्य प्रकाशित करने को लेकर महाराष्ट्र सरकार द्वारा बनाए गए संपादकीय मंडल के सदस्य भी. हालांकि इस किताब के प्रकाशन पर अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर ने आपत्ति की थी.

भारतीय संविधान के प्रारूप के निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर किताब पढ़ते हुए..


आखिरी किताब फ्रांसिस को समर्पित की थी
अंबेडकर और फ्रांसिस के बीच पत्राचार 1923 में शुरू हुआ और 1943 तक चला. उसके बाद ये रिश्ता अचानक खत्म हो गया. डॉ. अंबेडकर की बायोग्राफी लिखने वाले सीबी खैरमोडे ने 12 खंडों की सीरीज की दूसरे खंड की किताब में फ्रांसिस का जिक्र विस्तार से किया है.

जब अंबेडकर ने अपनी आखिरी किताब 'व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू अनटेचेबल' लिखी तो ये किताब उन्होंने फ्रांसिस को समर्पित की.
Loading...

इंडिया हाउस में टाइपिस्ट थीं फ्रांसिस
ये 92 पत्र अंबेडकर के जीवन पर नई रोशनी डालते हैं. ये भी कहा जाता है कि ये दो बौद्धिक हस्तियों का रिश्ता था. फ्रांसिस उन दिनों हाउस ऑफ कामंस और इंडिया हाउस में टाइपिस्ट थीं. अंबेडकर से वह 1920 के आसपास लंदन में ही मिलीं. वह अपनी मां के साथ बोर्डिंग हाउस चलाती थीं. जहां अंबेडकर भी लंदन में पढ़ाई के दौरान रहे थे.

पहली पत्‍नी रमाबाई अंबेडकर के साथ डॉ. अंबेडकर


भारत भी आना चाहती थीं फ्रांसिस
अंबेडकर के पत्रों से लगता है कि वह फ्रांसिस को डी कहकर बुलाते थे जबकि उनकी अंग्रेज मित्र उन्हें प्यारे भीम के रूप में संबोधित करती थीं. वह वर्ष 1943 में भारत आना चाहती थीं. लेकिन तत्कालीन राजनीतिक हालात के चलते उन्हें वीजा नहीं मिल सका.

1964 में बाबासाहेब के सहयोगी और बैरिस्टर केके खाडे लंदन में फ्रांसिस से मिले. जब उन्होंने उनसे पूछा, 'क्या उन्हें मालूम है कि डॉ. अंबेडकर ने अपनी आखिरी किताब उन्हें समर्पित की है' तो उनका कहना था, 'हां मुझे मालूम है.'

कैसे होते थे पत्र
किताब के लेखक अरुण कांबले को लगता था कि फ्रांसिस बाबासाहेब के प्यार में थीं. भारत आने के बाद अंबेडकर जब भी इंग्लैंड जाते थे तब वह 10 किंग हेनरी रोड स्थित हेम्पस्टीड स्थित फ्रांसिस के अपार्टमेंट ठहरते थे. फ्रांसिस अपने पत्रों का अंत योर लविंगली या विद फांडेस्ट लव के साथ करती थीं.

इन पत्रों में प्यार की गर्मी और अहसास महसूस होते हैं. चूंकि फ्रांसिस हाउस आफ कामंस में काम करती थीं लिहाजा वहां की गतिविधियों की जानकारी उन्हें देती रहती थीं,.

पुणे में बने अंबेडकर मेमोरियल मेें सहेजकर रखी हुई वस्‍तुएं और यादें


पत्रों में स्वास्थ्य को लेकर चिंता
अक्सर उनके पत्रों में अंबेडकर के स्वास्थ्य को लेकर चिंता झलकती है. वह एक पत्र में लिखती हैं, 'मैं सोचती हूं 16 पाउंड वजन कम होना बड़ी बात है. मैं डर रही हूं कि अगर आप वहां लंबा रह गए तो कंकाल न बन जाएं. आपकी काम करने की क्षमता पर भी असर पड़ेगा.'

फ्रांसिस का एक पत्र 

10, किंग हेनरी रोड

प्रिमोर्स हिल

एन डब्ल्यू 3

डियर तुम्हारे पत्र और पांच पाउंड के चेक के लिए धन्यवाद. मैने एलीन के लिए गोल्ड रिस्टलेट वाच औऱ ब्रेसलेट खरीदी है. वह इससे खुश होगी. मुझे दुख है कि तुम यहां पार्टी में नहीं होगे.

तुमने अभी तक नहीं बताया तुम कहने के बाद भी क्यों नहीं आए. क्या दिक्कतें तुम्हें आने से रोक रही थीं. जल्दी से जल्दी आने की कोशिश करो. मैं दिन गिन रही हूं. मेरे प्यार और देखभाल से तुम फिर अच्छे हो जाओगे. अगर तुम मुझे अपने आने के बारे में बता दोगे तो मैं स्टेशन पर आउंगी. भगवान तुम्हें हमारे मिलने तक सुरक्षित रखे.

प्यार सहित

हमेशा तुम्हारी

आगाह भी किया
अपने एक पत्र में फ्रांसिस ने उन्हें आगाह भी किया कि वह उसके प्यार में नहीं पड़ें, वह केवल उनके हैं. लेकिन न जाने क्या हुआ कि वर्ष 1943 के बाद दोनों के बीच पत्राचार औऱ संबंध खत्म हो गया. अंबेडकर की व्यस्तताएं भी भारतीय राजनीति में बढ़ गईं थीं.

डॉक्टर सविता से नजदीकी और दूसरा विवाह
वर्ष 1947 के आसपास बाबासाहेब डायबिटीज, ब्लड प्रेशर से काफी परेशान थे. पैरों में दिक्कत बढ़ गई थी.  इलाज की सलाह दी गई. मुंबई की डॉक्टर सविता  ने इलाज शुरू किया. वह पुणे के सभ्रांत मराठी ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखती थीं. इलाज के दौरान वह डॉक्टर अंबेडकर के करीब आईं. दोनों की उम्र में अंतर था. 15 अप्रैल 1948 को अंबेडकर ने अपने दिल्ली स्थित आवास में उनसे शादी कर ली.

डॉ. भीम राव अंबेडकर


दूसरी शादी से फैली नाराजगी
जब शादी हुई तो न केवल ब्राह्मण बल्कि दलितों का बड़ा वर्ग भी खासा कुपित था. अंबेडकर के बेटे और नजदीकी रिश्तेदारों को भी ये शादी रास नहीं आई. खटास जिंदगी भर बनी रही. विवादों को किनारे रखें तो कोई शक नहीं कि डॉक्टर सविता माई (बाद में उन्हें माई ही कहा जाने लगा था) ने पूरी निष्ठा के साथ मरते दम तक अंबेडकर का ख्याल रखा. उनकी सेवा में जुटी रहीं.

बाबासाहेब की पहली शादी
बाबासाहेब की पहली शादी 1906 में हुई थी. बाबासाहेब 15 साल के थे. पहली पत्नी रमाबाई और कम उम्र की. शादी के बाद अंबेडकर की पढ़ाई जारी रही. बैरिस्टरी की पढ़ाई करने के लिए वह इंग्लैंड गए. लौटकर दलितों के उत्थान के अभियान से जोरशोर से जुड़ गए. पहली पत्नी से पांच बच्चे हुए. लंबी बीमारी के बाद रमाबाई का 1935 में निधन हो गया.
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
-->