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जानिए किस तरह के ‘Ecosystem Engineer’ हुआ करते थे पुरातन मानव

वैज्ञानिकों को ऐसे प्रमाण मिले हैं जिनसे पता चला है कि पुरातन मानव (Ancient Humans) आग का उपयोग वे पारिस्थितिकी तंत्र को नियंत्रण में करने के लिए करते थे.(प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

अफ्रीका (Africa) में मिले प्रमाण बताते हैं कि पुरातन मानव (Ancient Man) ने अपने आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) में उल्लेखनीय बदलाव करने का जरिए आग को बनाया था.

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    पुरातन मानव (Ancient Humans) को आग जलाने (Fire) के हुनर ने अपने आसपास की प्राकृतिक संसार पर हावी होने में सबसे ज्यादा मदद की थी. यह नतीजा हाल ही में हुए एक अध्ययन से निकला है जिसमें ऐसे प्रमाण मिले हैं कि आग जलाकर पुरातन मानव ने पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को बदल कर रख दिया था.

    इन प्रमाणों से जुटाई जानकारी
    येल यूनिवर्सिटी का यह अध्ययन पिछले सप्ताह ही साइंस एडवांस जर्नल में प्रकाशित हुआ है. इसमें 92 हजार साल पुराने पत्थर की शिल्पाकृतियों के घने समूह के पुरातत्विक प्रमाण के साथ पूर्वी अफ्रीका का मलावी झील के उत्तरी तटों के पुरातन पर्यावरणीय आंकड़े शामिल किए गए हैं. इन प्रमाणों के दस्तावेजीकरण करने पर पता चला कि पुरातन मानव पारिस्थितिकी इंजीनियर हुआ करते थे.

    खास पद्धति का उपयोग
    अध्ययन में पाया गया कि पुरातन मानव आग का उपयोग इस इलाके में जंगलों को फिर से पनपने से रोकने के लिए किया करते थे. इसके लिए वे झाड़ियों का एक फैला हुआ इलाका तैयार करते थे जो आज भी मौजूद है. येल यूनिवर्सिटी के पुरातन मानवशास्त्री जैसिका थॉमसन ने इस तरह के सबसे पुराने प्रमाण के बारे में बताया.

    पहली बार देखी ऐसी क्षमता
    इस शोध के प्रमुख लेखिका और फैकल्टी ऑफ आर्ट एंड साइंसेस में मानवशास्त्र की एसिस्टेंट प्रोफेसर जैसिका ने बताया कि यह उनके द्वारा देखा सबसे पुराना प्रमाण है जिसमें मानव ने आग के जरिए उनके पारिस्थितिकी तंत्र में आमूल-चूल बदलाव ला दिया. इससे पता चलता है कि 20 लाख से 11 हजार साल पहले तक मानव ने आग जलाने के नए तरीके ईजाद कर लिए थे जिससे वे इलाके के घने जंगलों को खुल क्षेत्र में बदल लेते थे.

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    पुरातन मानव (Ancient Humans) की शिल्पाकृतियां भी उसी समय की पाई गईं जब आग लगने से पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव हुए थे. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


    इनका मिला थॉमसन के अध्ययन में सहयोग
    थॉमसन के अध्ययन में अमेरिका, अफ्रीका, यूरोप, एशिया और ऑस्ट्रेलिया के संस्थानों के 27 सहयोगियों ने योगदान दिया. इसमें मलावी डिपार्टमेंट ऑफ म्यूजियम एंड मॉन्यूमेंट्स, ओस्लो यूनिवर्सिटी के डेविट राइट जिन्होंने पुरातत्व स्थलों का अध्ययन किया और पुरात्व पर्यावरण के विश्लेषण के लिए  साराआइवरी ऑफ पेन स्टेट का भी योगदान रहा.

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    कितने पुराने समय का रिकॉर्ड
    जिन शिल्पाकृतियों का शोधकर्ताओं ने अध्ययन किया, उस तरह के आकृतियां अफ्रीका में मध्य पाषाण युग में बनाई जाती थीं. यह समया कम से कम 3.15 लाख साल पहले का है. पुरातन आधुनिक मानव ने इसी युग में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी. अफ्रीका का पुरातत्व रिकॉर्ड बताता है कि इस समय तक ज्ञान संबंधी और सामाजिक जटिलताएं काफी हद तक विकसित होने लगी थीं.

    झील के बदलाव ने संजोए प्रमाण
    थॉमप्सन और राइड ने लंबे समय तक आंकड़ों का जमा किया और फिर पुरातत्व रिकॉर्ड का पर्यावरण के लिहास से अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि जो रिकॉर्ड उन्होंने जमा किए और जो पर्यावरण के पुरातन रिकॉर्ड उन्हें मिले उनमें काफी समसामियकता थी. युगों से मलावी झील के जलस्तर में काफी उतार चढ़ाव आते रहे हैं. झील के सबसे सूखे समय में, जो 85 हजार साल पहले खत्म हुआ, वह दो छोटी नमकीन पानी की झील बन चुकी थी. इसके बाद झील का जलस्तर ऊंचा बना रहा. इसी झील में शोधकर्ताओं का पुरातन पर्यावरण और अन्य तरह के प्रमाण मिले.

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    ऐसे प्रमाण मिले हैं कि पुरातन मानव (Ancient Humans) ने लगातार आग चलाकर घने जंगलों को फैलने से रोक रखा था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


    पनपने नहीं दिए घने जंगल
    झील में राख और परागों के अवशेषों के आधार पर शोधकर्ताओं पाया है कि इस इलाके में ज्यादा पारिस्थिकी संबंधी बदलाव नहीं आए और इलाके में घने जंगल तो दोबारा बिलकुल भी नहीं पनप सके. और वहां आग जलने के प्रमाण जरूर पाए गए. इन आगों का संबंध किसानों और चरवाहों से ज्यादा था ना कि शिकारी मानवों से. इन आगों का संबंध आसपास पाई गई शिल्पाकृतियों के समय और पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव के समय से था.

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    शोधकर्ताओं को यह तो स्पष्ट तौर से पता नहीं चला कि आग किस वजह से लगाई जाती थी. लेकिन इतना तय है कि यह मानवजनित ही थी. इससे यह भी साबित हुआ कि इंसान ने तब तक अपने आसपास के पर्यावरण को नियंत्रित करना शुरू कर दिया था. और दोनो का यह संबंध आज भी जारी है.