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क्या हैं साइबेरिया में मिले हजारों साल पुराने जॉम्बी वायरस के मिलने के मायने?

वैज्ञानिकों ने ये वायरस साइबेरिया (Siberia) की स्थायी तुषार वाली झील के नीचे खोजे हैं. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

वैज्ञानिकों ने ये वायरस साइबेरिया (Siberia) की स्थायी तुषार वाली झील के नीचे खोजे हैं. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

रूस (Russia) के साइबेरिया में वैज्ञानिकों ने एक जमी हुई झील में 13 खतरनाक वायरस खोजे हैं. ये जॉम्बी वायरस (Zombie Virus ...अधिक पढ़ें

हाइलाइट्स

ये वायरस स्थायी तुषार में 48 हजार सालों से जमे हुए पड़े थे.
खोजे गए 13 वायरस बहुत ही खतरनाक हैं और इंसानों के लिए विनाशकारी हो सकते हैं.
जलवायु परिवर्तन के कारण यह स्थायी तुषार पिघलने से ये वायरस दुनिया में फैल सकते हैं.

वायरस (Virus) दुनिया के लिए बहुत ही अहम होते जा रहे हैं. कोविड-19 (Covid-19) महामारी के सार्स कोव-2 जैसे वायरस ने पिछले तीन सालों से दुनिया में तहलका मचाया हुआ है. वायरस दुनिया के सबसे अजीब सूक्ष्मजीव होते हैं और इनकी खास बात यह होती है कि अनुकूल वातावरण ना होने पर ये हजारों सालों तक बर्फीले माहौल में दबे रह सकते हैं और मरते या खत्म नहीं होते हैं. हाल ही में वैज्ञानिकों ने करीब एक दर्जन खतरनाक वायरस की खोज की है जो लगभग 48 हजार सालों से बर्फ में जमे पड़े थे. उन्होंने इन वायरस को जॉम्बी वायरस (Zombie Virus) का नाम है.

जलवायु परिवर्तन के कारण हो सकता है खतरा
यूरोपीय वैज्ञानिकों के अध्ययन में पाया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पुरातन स्थायी तुषार के पिघलने से इन वायरसों से इंसानों क लिए नया खतरा पैदा कर सकते हैं. उन्होंने ये वायरस उन्होंने साइबेरिया में एक जमी हुई झील के नीचे खोजे हैं. शोधकर्ताओं ने इस झील से 13 ऐसे रोगाणु वायरस खोजे हैं जो बिलकुल नए हैं यानि अभी दुनिया में कहीं भी सक्रिय नहीं हैं.

हजारों साल बाद अब भी संक्रामक हैं
इन वायरस के खतरनाक होने की वजह से ही शोधकर्ताओं ने इन्हें जॉम्बी वायरस कहा है. उन्होंने पाया है की हजारों सालों तक जमी हुई जमीन में फंसे होने के बावजूद ये अब भी संक्रामक हैं. वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी दे रहे हैं कि वायुमंडल के गर्म होने के कारण मीथेन जैसी ग्रीन हाउस गैस के मुक्त होनेसे  जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और ज्यादा खतरनाक होते  जा रहे हैं.

अभी समझा नहीं जा सका है इन्हें
ध्रुवों और दुनिया के बाकी बर्फीले इलकों में बर्फ के नीचे बहुत बड़ी मात्रा में सूक्ष्मजीवन दबा पड़ा है जिससे कई तरह के वायरस और बैक्टीरिया पड़े हुए है जो अभी दुनिया में कहीं भी सक्रिय नहीं हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिर्तन का इन सुसुप्त रोगाणुओं पर प्रभाव को कम समझा गया है.

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वायरस (Virus) की खास बात यह होती है वे लंबे समय तक सुसुप्त अवस्था में पड़े रह सकते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

खोजे सभी वायरस खतरनाक नहीं शायद
यूरोपीय शोधकर्ताओं की इस टीम में रूस, जर्मनी, और फ्रांस के वैज्ञानिक शामिल थे. उनका कहना है कि जिन स्ट्रेन का उन्होंने अध्ययन किया है वे मुख्यतः अमीबा सूक्ष्मजीवों को संक्रमित करने में सक्षम है इसलिए इन वायरस के फिर से सक्रिय हो कर फैलने का जैविक जोखम कम है. लेकिन जो वायरस जानवरों और इंसानों में संक्रमण फैला सकते हैं वे ज्यादा समस्याकारक हैं.

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बहुत कुछ नहीं है पता
उनका अध्ययन बता सकता है कि ये खतरा कितना वास्तविक है. शोधकर्ताओं ने बायोरेक्सि में प्रिप्रिंट के लिए प्रकाशित लेख में कहा है कि ऐसी संभावना है कि पुरातान स्थायी तुषार पिघलने पर अज्ञात वायरस फैल सकते हैं. एक बार बाहरी स्थितियों में आने पर ये वायरस कितने लंबे समय तक संक्रामक रह सकेंगे, उनसे कैसे निपटा जा सकता है जैसी बातों का अंदाजा लगाना अभी मुश्किल हैं.

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इस तरह के संक्रामक सूक्ष्मजीव (Microbes) केवल ध्रुवों पर ही नहीं बल्कि ग्लेशियोरों में भी मौजूद हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

ग्लोबल वार्मिंग बिगाड़ेंगे हालात
शोधकर्ताओं का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग जिस तरह से दुनिया और विशेष तौर पर ध्रुवीय क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है, इस तरह का जोखिम बढ़ना तय है. क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से स्थायी तुषार का पिघलना त्वरित होता रहेगा और औद्योगिक गतिविधियों के चलते आर्कटिक में और ज्यादा लोग आने लगेंगे.

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ध्रुवीय इलाकों की जमी झीलों के अलावा दुनिया के पर्वतों में जमे ग्लेशियर में भी संक्रामक सूक्ष्मजीवों का भंडार है. वहीं कोविड-19 महामारी के कारण दुनिया में वायरस के खतरों की संभावना पर शोधकार्य ज्यादा बढ़ गया है. अब विशेषज्ञ बार बार ये चेतावनी दे रहे हैं कि इतनी ज्यादा वैज्ञानिक उन्नति और चिकित्सा सुविधाएं होने के बाद भी हम वायरस संक्रमण से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं. कोविड-19 महामारी ने हम इंसानों को कमजोर साबित किया है. वहीं वायरस की जटिलताएं अब भी बहुत बड़ी चुनौती है. एचआईवी वायरस इसकी अच्छी मिसाल है.

Tags: Climate Change, Research, Russia, Science, Virus

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