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19 जनवरी 1989: कश्मीरी पंडितों की पीढ़ियां भी नहीं भूल पाएंगी ये तारीख

News18Hindi
Updated: January 19, 2020, 4:31 PM IST
19 जनवरी 1989: कश्मीरी पंडितों की पीढ़ियां भी नहीं भूल पाएंगी ये तारीख
कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की घटना को तीस साल पूरे हो चुके हैं.

कश्मीरी पंडितों (Kashmiri Pundits) के विस्थापन के दर्द पर बनी फिल्म शिकारा (Shikara) जल्दी ही रिलीज होने वाली है. इस फिल्म के ट्रेलर लॉन्च के साथ कश्मीर में 30 पहले हुए अमानवीय कृत्यों की यादें एक बार फिर लोगों के ज़हन में ताजा हो गई हैं.

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19 जनवरी 1990 वो तारीख है जिसे देश के किसी भी हिस्से में रहने वाला विस्थापित कश्मीरी पंडित अपने पूरे जीवन नहीं भूल पाएगा. आज इस घटना को तीस साल पूरे हो चुके हैं. कश्मीरी पंडितों के विस्थापन के दर्द पर बनी फिल्म 'शिकारा' जल्दी ही रिलीज होने वाली है. इस फिल्म के ट्रेलर लॉन्च के साथ कश्मीर में 30 पहले हुए अमानवीय कृत्यों की यादें एक बार फिर लोगों के ज़हन में ताजा हो गई हैं.

कश्मीर में अलगाववाद की आग के बाद शुरू हुए इस पलायन की कहानी किसी से छिपी नहीं है. सिलसिलेवार घटनाओं में कश्मीरी पंडितों के घर पर नारेबाजी हुई, मंदिर बर्बाद किए गए, महिलाओं के साथ बलात्कार हुए और पंडित पुरुषों की निर्मम हत्याएं हुईं.

क्या  हुआ था  उस दिन
19 जनवरी, 1990 की भयावह घटना से कुछ समय पहले पंडित और राजनीतिक कार्यकर्ता, टीका लाल टपलू की 19 सितंबर, 1989 को उनके घर के बाहर हथियारबंद लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. यह कश्मीरी पंडितों में पहली बड़ी हत्या थी जो बाद में 1990 में पलायन के कारण बनी. इसके बाद घाटी के हालात बिगड़ते ही चले गए. साल 1990 के जनवरी महीने में घाटी की मस्जिदों में बड़े पैमाने पर भीड़ इकट्ठा हुई. भीड़ को कश्मीरी पंडितों के खिलाफ बुरी तरह भड़काया गया. वहां मौजूद लोगों के बीच यह बात बताई गई कि कश्मीरी पंडित भारत सरकार के एजेंट हैं. भीड़ ने भारत और कश्मीरी पंडितों के विरोध में नारे लगाए. स्थितियां जब हद से ज्यादा बिगड़ने लगीं तो कश्मीरी पंडितों के लिए घाटी में रह पाना तकरीबन नामुमकिन जैसा होने लगा. अगले कुछ महीनों में सैकड़ों निर्दोष कश्मीरी पंडितों को प्रताड़ित करके मौत के घाट उतार दिया गया और न जाने कितनी के साथ बलात्कार की घटनाएं भी सामने आईं.



1 से 8 लाख तक के आंकडे़
एक अनुमान के अनुसार लगभग 1 लाख से 8 लाख तक कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर भागना पड़ा. भागे हुए कश्मीरी पंडितों को शरण लेने के लिए उस वक्त सबसे मुफीद जगह जम्मू और नजदीक का पंजाब लगे. ज्यादातर संख्या में कश्मीरी पंडित इन्हीं जगहों पर बसे. काफी संख्या में पंडितों ने दिल्ली को भी अपना ठिकाना बनाया.कैसे थे हालात
उस समय कश्मीर को लेकर प्रकाशित हुई मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि हालात इतने खराब थे कि अस्पतालों में भी कश्मीरी पंडित समुदाय के लोगों के साथ भेदभाव हो रहा था. महज अस्पताल ही नहीं स्कूल से लेकर सड़कों तक कश्मीरी पंडितों को भेदभाव और तीखी टिप्पणियों का शिकार होना पड़ता था.

सेना के उतरने से कम हुई त्रासदी
कश्मीर में तेजी से बिगड़ते हालातों को कुछ हद तक संभालने की कोशिश भारतीय सेना ने की. 19 जनवरी, 1990 की रात को ही नए बने  राज्यपाल जगमोहन ने सेना बुला ली थी. जानकारों के मुताबिक सेना लगने की वजह से कश्मीरी पंडितोंं को अपेक्षाकृत कम अत्याचार झेलना पड़ा. बताया जाता है कि अगर सेना नहीं बुलाई गई होती, तो कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम व महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म और ज्यादा होता.

विस्थापन शिविरों में हजारों की मौत
विस्थापित कश्मीरी पंडितों में से एक मोना राजदान ने एक बार कहा था कि वह रात ‘संभवत: हमारे जीवन की सबसे लंबी रात थी.’ उन्होंने कहा, ‘पूरी घाटी से निकली भीड़ ने कश्मीर में हर एक सड़क पर कब्जा कर लिया. वे कश्मीरी पंडितों के खिलाफ नारेबाजी कर ये मांग कर रहे थे कि या तो हम उनका साथ दें या घाटी छोड़ दें.’ निर्वासित कश्मीरी पंडितों की वर्तमान स्थिति पर दुख व्यक्त करते हुये युवा छात्र विवेक रैना ने कहा कि हमारे 50,000 से अधिक लोग शिविरों में मर गए. वे सांपों और बिच्छुओं के शिकार हुए.

कई नामी लोगों की हुई थी हत्या
कश्मीर में उन्मादी भीड़ ने कई नामी कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी थी. इनमें न्यायाधीश नीलकंठ गंजू, टेलिकॉम इंजीनियर बालकृष्ण गंजू, दूरदर्शन निदेशक लसा कॉल, नेता टीकालाल टपलू जैसे प्रतिष्ठित नाम  शामिल थे. इनके अलावा कई ऐसे नाम हैं, जिनके खिलाफ बर्बरता की गई, लेकिन आज तक कार्रवाई क्या केस तक दर्ज नहीं हुआ.



कश्मीर में कभी नहीं बना मुद्दा
ऐसा माना जाता है कि कश्मीर में अलगाववाद और कट्टरपंथ का उभार 1987 के विधानसभा चुनावों के बाद हुआ जब फारूक अब्दुल्ला राज्य के मुख्यमंत्री बने थे. माना जाता है कि इस चुनाव में बड़े स्तर पर धांधलियां हुई थीं. इसके बाद 1990 में कश्मीरी पंडितों के साथ बड़े स्तर अत्याचार की घटनाएं हुईं जो सालों तक चलती रहीं. इन सबसे के बावजूद कभी राज्य में यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पाया. तीस साल बीत चुके हैं लेकिन आज भी कश्मीरी पंडितों का समुदाय न्याय की बाट जोह रहा है.
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First published: January 19, 2020, 2:25 PM IST
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