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सियासी दल: वो पार्टी जिसने कभी 404 सीटें जीतीं तो कभी 44 पर सिमटी, पढ़ें इसका पूरा सफर

पार्टी के अधिवेशन में भाषण देते जवाहरलाल नेहरू (फोटो क्रेडिट: ओल्ड इंडियन फोटोज)

पार्टी के अधिवेशन में भाषण देते जवाहरलाल नेहरू (फोटो क्रेडिट: ओल्ड इंडियन फोटोज)

यह भारत की ऐसी पार्टी है, जिसका चुनाव चिन्ह तीन बार बदला जा चुका है.

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    कांग्रेस भारत की सबसे पुरानी पार्टी है. इसका इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के साथ जुड़ा है. साल 1885 में शुरू हुई कांग्रेस को बनाने का श्रेय एलन ऑक्टेवियन ह्यूम नाम के एक अंग्रेज अफसर को जाता है. जिन्होंने तत्कालीन बॉम्बे में पार्टी की पहली बैठक करके इसके शुरुआत की थी. हालांकि कांग्रेस के पहले अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी थे. शुरुआत में कांग्रेस का लक्ष्य ब्रिटिश सरकार के साथ मिल कर भारत की समस्याओं को दूर करना था. इसने इसी उद्देश्य से प्रांतीय विधायिकाओं में भी हिस्सा लिया. लेकिन 1905 में बंगाल के विभाजन के बाद पार्टी में गरम दल के नेताओं का प्रभाव बढ़ गया और वे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खुलकर बोलने लगे. इसी बीच महात्मा गांधी भारत लौटे और जिसके बाद कांग्रेस ने साधारण जनता को अपने आंदोलन में तेजी से जोड़ा और उसके स्वर्णिम काल की शुरुआत हुई.

    महात्मा गांधी का कांग्रेस में जब प्रभाव बढ़ा तो उन्होंने अहिंसक तरीके से खिलाफत को बढ़ावा देने की नीति अपनाई. उनकी इस रणनीति को लेकर कांग्रेस में अंदरुनी मतभेद थे. इसके चलते कांग्रेस का विभाजन हुआ और चित्तरंजन दास, एनी बेसेंट, मोतीलाल नेहरू जैसे नेताओं ने स्वराज पार्टी नाम का एक अलग दल बना लिया. हर साल कांग्रेस का सम्मेलन होता था.

    कांग्रेस ने गांधी के शुरुआती दौर में अंग्रेजों की देखरेख में एक डोमिनियन राज्य की मांग की थी लेकिन 1929 में ऐतिहासिक लाहौर सम्मेलन में जवाहर लाल नेहरू ने पूर्ण स्वराज का नारा दिया, जिसका मतलब था कि अब कांग्रेस को पूरी तरह से अंग्रेजों से आजादी चाहिए थी. पहले विश्व युद्ध के बाद से ही पार्टी में महात्मा गांधी की भूमिका कांग्रेस में बढ़ चुकी थी. भले ही वे आधिकारिक तौर पर इसके अध्यक्ष नहीं बने लेकिन कहा जाता है कि सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस से निष्कासित करने में उनकी मुख्य भूमिका थी.

    आज़ादी के बाद सिर्फ कांग्रेस ही कांग्रेस थी
    भारत जब आजाद हुआ तो कांग्रेस ही सबसे मज़बूत राजनीतिक ताकत थी. महात्मा गांधी की हत्या और सरदार पटेल के निधन के बाद जवाहरलाल नेहरु के नेतृत्व में पार्टी ने पहले संसदीय चुनावों में शानदार सफलता पाई और ये सिलसिला 1967 तक लगातार चला. पहले प्रधानमंत्री के रुप में नेहरू ने धर्मनिरपेक्षता, आर्थिक समाजवाद और गुटनिरपेक्ष विदेश नीति को सरकार का मुख्य आधार बनाया जो कांग्रेस पार्टी की पहचान बनी. नेहरू की अगुआई में 1952, 1957 और 1962 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने अकेले दम पर बहुमत हासिल करने में सफलता पाई. वर्ष 1964 में जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री के हाथों में कमान सौंप गई लेकिन उनकी भी 1966 में ताशकंद में संदेहास्पद स्थितियों में मौत हो गई. इसके बाद पार्टी की अग्रिम पंक्ति के नेताओं में इस बात को लेकर ज़ोरदार बहस हुई कि अध्यक्ष पद किसे सौंपा जाए. आख़िरकार मोरारजी देसाई को दरकिनार कर नेहरु की बेटी इंदिरा गांधी के नाम पर सहमति बनी.

    एकजुट विपक्ष ने पेश की पहली चुनौती
    आज़ाद भारत में कांग्रेस के वर्चस्व को 1967 में पहली चुनौती मिल. जब विपक्ष संयुक्त विधायक दल के बैनर तले एकजुट हुआ और कई हिंदीभाषी राज्यों में कांग्रेस की हार हुई. इसके बाद पार्टी के भीतर इंदिरा गांधी की क्षमता पर सवाल उठे. जिसके बाद कामराज की अगुआई में कांग्रेस का एक अलग धड़ा कांग्रेस (ओ) के रुप में अलग हो गया. बाद में कांग्रेस (ओ) जनता पार्टी में मिल गई. चुनाव आयोग ने इंदिरा की अगुआई वाले धड़े को ही असली कांग्रेस पार्टी माना. इसी समय इंदिरा ने 'गरीबी हटाओ' का नारा दिया और 71 के चुनावों में जीती लेकिन उनकी सरकार के काम करने के तरीकों और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ विपक्ष एकजुट होता गया.

    इंदिरा के बाद राजीव ने संभाला
    इसी बीच लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की जीत को अदालत ने अवैध ठहरा दिया जिसके बाद देश भर में आंदोलन शुरु हुए. इन्हें दबाने के लिए इंदिरा गांधी ने 1975 में आपात काल की घोषणा की. जेपी के आंदोलन ने इंदिरा सरकार को हिला दिया. 1977 में जब चुनावों में जनता पार्टी के हाथों कांग्रेस को बुरी हार मिली. हालांकि दो वर्षों में ही ये सरकार गिरी और 1980 में इंदिरा गांधी फिर सत्ता में लौटीं. वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हो गई, जिसके बाद देश भर में सिख विरोधी दंगे होने लगे. उनकी हत्या के बाद उनके बेटे राजीव गांधी ने पार्टी की कमान संभाली और 84 के चुनावों में पार्टी को भारी सफलता मिली.

    खिसकता चला गया जनाधार
    1989 में जब चुनाव हुए तो जनता दल और भाजपा के गठजोड़ ने कांग्रेस को हरा दिया. हालांकि ये सरकार भी दो साल ही चली. 1991 में चुनाव प्रचार के दौरान ही राजीव गांधी की भी बम विस्फोट में मौत हो गई और पार्टी की कमान पीवी नरसिंह राव के हाथों में आई. इस चुनाव में कांग्रेस को 232 सीटें मिलीं. इसके बाद कांग्रेस का जनाधार लगातार गिरा.

    1984 के चुनावों में कांग्रेस को 404 सीटें मिली थीं जो वर्ष 1999 में 114 रह गईं. हालांकि 2004 के चुनावों में उसे 145 सीटें मिलीं पर देशभर में उसका प्रभाव कम हो गया. पार्टी ने सहयोगी दलों के सहारे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए का गठन किया और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने. वर्ष 2004 में कांग्रेस की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने पर लगभग सहमति बन चुकी थी लेकिन विदेशी होने के नाम पर चले विरोध को देखते हुए उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया.

    कांग्रेस के इतिहास का सबसे बड़ा झटका
    2009 में हुए चुनावों में कांग्रेस की विजय हुई और उसे पिछली बार से ज्यादा सीटें मिलीं. लेकिन UPA का यह कार्यकाल चुनौतीपूर्ण रहा. पूरे कार्यकाल के दौरान कांग्रेस घोटालों के आरोप से जूझती रही. इसी दौरान एंटी इंकम्बैंसी और विपक्ष के मजबूत प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के सामने कांग्रेस को उसके पूरे इतिहास की सबसे बड़ी पटखनी लगी. 2014 में हुए चुनावों में कांग्रेस केवल 44 सीटों पर सिमट चुकी थी. 2019 में कांग्रेस एक बार फिर अपने गठबंधन के सहयोगियों के साथ मैदान में है.

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