सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इस्तेमाल के बाद EVM से वोटिंग पर लगा दी थी रोक

केरल के एर्नाकुलम जिले के परवूर निर्वाचन क्षेत्र में पहली बार 19 मई, 1982 को EVM से वोट डाले गए थे.


Updated: April 18, 2019, 3:22 PM IST
सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इस्तेमाल के बाद EVM से वोटिंग पर लगा दी थी रोक
केरल के एर्नाकुलम जिले के परवूर निर्वाचन क्षेत्र में पहली बार 19 मई, 1982 को EVM से वोट डाले गए थे

Updated: April 18, 2019, 3:22 PM IST
ईवीएम पर आए दिन सवाल खड़े होते रहते हैं. लेकिन यह नई बात नहीं है. यह सवाल 36 साल पहले केरल के एर्नाकुलम चुनावों के दौरान भी खड़ा हुआ था. इतना ही नहीं उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम से चुनाव बंद करके बैलेट पेपर से ही मतदान कराने के निर्देश दे दिए थे.

दरअसल, एर्नाकुलम के उस चुनाव में ईवीएम का पहला ट्रायल किया गया था. हालांकि इसके लिए कोई संसदीय स्वीकृति नहीं ली गई थी. फिर भी एर्नाकुलम के परवूर निर्वाचन क्षेत्र में 19 मई, 1982 को 84 बूथों में से 50 पर ईवीएम के जरिये मतदान कराए गए थे. इसका फायदा यह हुआ की बैलेट पेपर वाले बूथों के बजाए ईवीएम वाले बूथों पर जल्दी मतदान समाप्त हो गया और बैलेट पेपर के मुकाबले ईवीएम वाले बूथों की गिनती भी जल्दी पूरी हो गई.



वोटों की गिनती के बाद CPI के सिवन पिल्लई को इस सीट पर 30,450 वोट मिले थे. वहीं कांग्रेस की ओर से पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एसी जोस को 30,327 मत मिले थे. जिसके हिसाब से मात्र 123 मतों से सिवन पिल्लई ने एसी जोस को हरा दिया था. कांग्रेस ने हार मानने से इनकार कर दिया. उसने ईवीएम की तकनीकी पर ही सवाल खड़ा कर दिया. जोस ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर बताया कि बिना संसदीय स्वीकृति के ईवीएम का इस्तेमाल हुआ है, जो सही नहीं है.

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जोस ने जनप्रतिनिधि अधिनियम, 1951 और चुनाव अधिनियम, 1961 का हवाला दिया, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी. इसके बाद जब जोस सुप्रीम कोर्ट पहुंचे तो फैसला उनके पक्ष में आया. जिन 50 बूथों पर ईवीएम से वोटिंग हुई थी, वहां सुप्रीम कोर्ट ने बैलेट पेपर से चुनाव करााने का आदेश दिया. इसके बाद हुई मतगणना में जोस को 2000 वोट ज्यादा मिले. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह के नए प्रयोग चुनाव के दौरान किए जाने पर रोक लगा दी.

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद 1984 में चुनाव आयोग ने ईवीएम के उपयोग को रोक दिया. इसे 1992 में संसद की मंजूरी मिलने के बाद फिर चालू किया गया. वर्ष 1998 के बाद से लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों में ईवीएम का उपयोग किया जाने लगा. हाल में ईवीएम पर फिर सवाल उठे तो चुनाव आयोग ने वोटर वैरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) मशीनों के प्रयोग की बात शुरू की ताकि पारदर्शिता बनाई जा सके.

फिलहाल ईवीएम कितनी सुरक्षित?
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चुनाव आयोग के मुताबिक ईवीएम कंप्‍यूटर नियंत्रित नहीं है. ये स्वतंत्र मशीनें हैं. ईवीएम इंटरनेट या किसी अन्य नेटवर्क के साथ किसी भी समय कनेक्‍टेड नहीं होती हैं. इसलिए किसी रिमोट डिवाइस के जरिये उन्हें हैक करने की गुंजाइश नहीं है.

आयोग के अनुसार, ईवीएम में वायरलेस या किसी बाहरी हार्डवेयर पोर्ट के लिए कोई फ्रीक्वेंसी रिसीवर नहीं है. इसलिए हार्डवेयर पोर्ट, वायरलेस, वाईफाई या ब्लूटूथ डिवाइस के जरिये किसी प्रकार की टैम्परिंग या छेड़छाड़ संभव नहीं है.

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कंट्रोल यूनिट (सीयू) और बैलेट यूनिट (बीयू) से केवल एन्क्रिप्टेड या डाइनामिकली कोडिड डेटा ही स्वीकार किया जाता है. सीयू द्वारा किसी अन्य प्रकार का डेटा स्वीकार नहीं किया जा सकता.

आयोग के मुताबिक, उसकी ईवीएम स्‍वदेशी तरीके से बनाई गई हैं. पब्‍लिक सेक्‍टर की भारत इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स लिमिटेड, बंगलूरु और इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद में ये मशीनें बनती हैं.

दोनों कंपनियां ईवीएम के सॉफ्टवेयर प्रोग्राम कोड आं‍तरिक तरीके से तैयार करती हैं. उन्‍हें आउटसोर्स नहीं किया जाता. प्रोग्राम को मशीन कोड में कन्‍वर्ट किया जाता है. इसके बाद विदेशों के चिप मैन्‍युफैक्‍चरर को दिया जाता है, क्‍योंकि हमारे पास सेमीकंडक्‍टर माइक्रोचिप निर्माण करने की क्षमता नहीं है.

हर माइक्रोचिप के पास मेमोरी में एक पहचान संख्‍या होती है. उन पर निर्माण करने वालों के डिजिटल हस्‍ताक्षर होते हैं. माइक्रोचिप को हटाने की किसी भी कोशिश का पता लगाया जा सकता है. साथ ही ईवीएम को निष्‍क्रिय बनाया जा सकता है.

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क्या ईवीएम का निर्माण करने वाले इसमें कोई हेराफेरी कर सकते हैं?
आयोग का कहना है कि ऐसा संभव नहीं है. सॉफ्टवेयर की सुरक्षा के बारे में निर्माण के स्तर पर कड़े सुरक्षा प्रोटोकाॅल हैं. निर्माण के बाद ईवीएम को राज्य और किसी राज्य के भीतर जिले से जिले में भेजा जाता है. निर्माता इस स्थिति में नहीं हो सकते कि वे कई वर्ष पहले ये जान सकें कि कौन सा उम्मीदवार किस निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ेगा और बैलेट यूनिट में उम्मीदवारों की सीक्वेंस क्या होगी.

वीवीपैट
ईवीएम की विश्वसनीयता कायम रखने के लिए आयोग वीवीपैट (वोटर वेरीफ़ाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल यानी वीवीपैट)  मशीन की मदद ले रहा है. दरअसल, ईवीएम पर उठ रहे सवालों ने ही वीवीपैट को जन्म दिया. इसे ईवीएम मशीन के साथ जोड़ा जाता है. वीवीपैट व्यवस्था के तहत वोट डालने के तुरंत बाद कागज की एक पर्ची बनती है. इस पर जिस उम्मीदवार को वोट दिया गया है, उनका नाम और चुनाव चिह्न छपा होता है. यह व्यवस्था इसलिए है कि किसी तरह का विवाद होने पर ईवीएम में पड़े वोट के साथ पर्ची का मिलान किया जा सके.

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हर ईवीएम का होता है सीरियल नंबर
चुनाव आयोग के मुताबिक हर ईवीएम का एक सीरियल नंबर होता है. निर्वाचन आयोग ईवीएम-ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके अपने डेटा बेस से पता लगा सकता है कि कौन सी मशीन कहां है. इसलिए कोई गड़बड़ी होने की आशंका नहीं है.

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