Exit Polls 2019: सारे एक्जिट पोल क्यों दिखा रहे लेफ्ट का खात्मा?

भाकपा की स्‍थापना साल 1925 में कानपुर में एमएन रॉय ने की. किसी भारतीय द्वारा स्‍थापित की गई इसे सबसे पुरानी पार्टी माना जाता है.

News18Hindi
Updated: May 20, 2019, 4:31 PM IST
Exit Polls 2019: सारे एक्जिट पोल क्यों दिखा रहे लेफ्ट का खात्मा?
भाकपा की स्‍थापना साल 1925 में कानपुर में एमएन रॉय ने की. किसी भारतीय द्वारा स्‍थापित की गई इसे सबसे पुरानी पार्टी माना जाता है.
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Updated: May 20, 2019, 4:31 PM IST
लोकसभा चुनाव 2019 की कुल 542 सीटों के एग्जिट पोल सामने आ चुके हैं. करीब सभी प्रतिष्‍ठित एग्जिट पोल सर्वे एजेंसियों ने अबकी बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के जीत का ऐलान कर दिया हैं. इसके अलावा जो दूसरी बात सबसे चौंकाने वाली इन एग्जिट पोल में सामने आ रही है वो ये कि वामदल इस बार पूरी तरह हासिए पर चले गए हैं. सिवाय केरल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPIM) के अगुवाई सभी वाम दलों के लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के किसी अन्य राज्य में खाता तक खुलने के आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं. अलग-अलग एग्जिट पोल में सीपीआईएम को दो से 10 सीटें मिलने के दावे किए जा रहे हैं. लेकिन अगर इस पार्टी को करीब से देखें तो इसका इतिहास बेहद समृद्ध है.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्‍थानपा और शुरुआती लड़ाई


भाकपा की स्‍थापना साल 1925 में कानपुर में एमएन रॉय ने की. किसी भारतीय द्वारा स्‍थापित की गई इसे सबसे पुरानी पार्टी माना जाता है. स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने के बाद यह पार्टी पूरी तरीके राजनीति में उतर गई. साल 1951-52 के पहले आम चुनाव में यह पार्टी कांग्रेस की प्रमुख प्रतिद्वंदी के तौर उभरी. इसने पहले आम चुनाव में 16 सीटों पर विजय हासिल की. दूसरे चुनाव में यह और मजबूत हुई. लोकसभा चुनाव 1957 में भाकना 27 सीटें जीतीं.

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1957 में बनी थी भाकपा की पहली विधानसभा सरकार
अभी भारत को आजाद हुए बस 10 साल ही हुए थे और भारत में दूसरे ही चुनाव हुए थे कि केरल में कांग्रेस को परास्त कर भारती की पहली कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनाई. लेकिन 1959 में नेहरू सरकार ने भाकपा सरकार को बर्खास्त कर दिया. इसके बाद भाकपा में नेहरू को लेकर पनने नाराजगी ने उसका ही दो फाड़ कर दिया. वजह रही नेहरू का सोवियत यूनियन (अब रूस) से अच्छे संबंध होना. जबकि चीनी कम्युनिस्टों से रिश्ते खराब होना. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में इन दोनों का मिश्रण था. ऐसे में पार्टी में अंदरुनी कलह नेहरू को लेकर शुरू हुई और 1964 में इसका एक धड़ा टूटकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPIM) बन गया.


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सपीआईएम बनते ही इसमें सीपीआई के जुझारू नेता नम्बूदरीपाद, ज्योति बसु, हरकिशन सिंह सुरजीत ने पाल्हा बदल दिया. माकपा के उभार से पश्चिम बंगाल सरीखे राज्य वाम दलों के पास तो पहुंचे. लेकिन दो धड़ों में टूटने के बाद इस पार्टी शक्ति कमजोर पड़नी शुरू हो गई. आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के समर्थन के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में खाई और बढ़ गई. लेकिन भाकपा के मुकाबले माकपा ज्यादा ताकतवर होने लगी. पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा सरीखे राज्यों में इस पार्टी की सरकारें बनीं.

वामदलों का पुनर्जागरण काल
20वीं सदी के आखिरी दशक में केंद्र की राजनीति में भूचाल आया था. बाबरी विध्वंस और लाल कृष्‍ण आडवाणी की रथ यात्रा के बाद भारतीय जनता पार्टी ने केंद्र में कांग्रेस को कमजोर कर दिया था. 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में केंद्र सरकार अस्थिर हो गई. साल 1996 के लोकसभा चुनावों में किसी को बहुमत नहीं मिला. एचडी देवेगौड़ा ने संयुक्त मोर्चे की सरकार बनाई. भाकपा इसमें शामिल हुई. हालांकि इससे ठीक पहले ही माकपा नेता ज्योति बसू ने केंद्र सरकार बनाने के आग्रह को ठुकरा दिया था. यही एक मौका था जब भारत में किसी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बन सकती थी, पर बनते-बनते रह गई.

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पतन की ओर वामदल
1998 आम चुनाव के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने ना केवल सरकार बनाई बल्कि यही से भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों की भूमिका प्रधान के बजाए गौण होने लगी. हालांकि 2004 के आम चुनाव के यूपीए की सरकार भाकपा ने समर्थन दिया था इससे पहले 1998 की राजग की सरकार के खिलाफ प्रमुख विपक्षी दल था. लेकिन 2009 आम चुनाव आते-आते सीपीआई और सीपीआईएम दोनों की ही जड़ें उखड़ने लगीं. पहले पश्चिम बंगाल से फिर त्रिपुरा से और अब पूरे देश में महज केरल में ही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बची हुई है. अब जब पूरे देश में कम्युनिस्ट पार्टी आधार खो रही है तो फिर से माकपा और भाकपा ने हाथ मिला लिया है. आखिरी आम चुनाव की बात करें तो 2014 में माकपा को कुल 9 और भाकपा को कुल एक सीट मिली थी.

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