समलैंगिकता पर क्यों बंटी है दुनिया!

सूडान, ईरान, सऊदी अरब, यमन में गे सेक्स के लिए मौत की सजा दी जाती है. सोमालिया और नाइजेरिया के कुछ हिस्सों में भी गे सेक्स के बदले मौत की सजा लोगों को मिलती है.

News18Hindi
Updated: September 6, 2018, 8:17 AM IST
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Updated: September 6, 2018, 8:17 AM IST
समलैंगिकता (होमोसेक्शुएलिटी) को क्राइम ठहराने वाली इंडियन पैनल कोड (IPC) की सेक्शन-377 पर सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक बेंच के सामने सुनवाई चल रही है.

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 में दिल्ली हाईकोर्ट के 2009 के फैसले को पलटते हुए एक ही लिंग के दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बनाए गए रिलेशन को अपराध की श्रेणी में डाल दिया था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर हुईं.

सेक्शन-377 क्या है और उससे ऐतराज क्यों?

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में समलैंगिकता को अपराध बताया गया है. आईपीसी की धारा 377 के मुताबिक जो कोई भी किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ सेक्स करता है तो इस अपराध के लिए उसे 10 वर्ष की सजा या आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा. उस पर जुर्माना भी लगाया जाएगा. यह अपराध संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है और यह गैर जमानती है.

भारत में कैसे आया

सबसे पहले साल 1290 में इंग्लैंड के फ्लेटा में अप्राकृतिक संबंध बनाने का मामला सामने आया, जिसके बाद पहली बार कानून बनाकर इसे अपराध की श्रेणी में रखा गया. बाद में ब्रिटेन और इंग्लैंड में 1533 में बगरी (अप्राकृतिक संबंध) एक्ट बनाया गया. इसके तहत फांसी का प्रावधान किया गया. 1563में क्वीन एलिजाबेथ-1 ने इसे फिर से लागू कराया. 1817 में बगरी एक्ट से ओरल सेक्स को हटा दिया गया. 1861 में डेथ पेनाल्टी का प्रावधान भी हटा दिया गया. 1861 में ही लॉर्ड मेकाले ने इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) ड्राफ्ट किया. उसी के तहत धारा-377 का प्रावधान किया गया.

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समलैंगिकता है क्या?

बेकर्स इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ साइकोलॉजी के अनुसार दस तरह के होमोसेक्शुअल होते हैं.  दरअसल इसे परिभाषित करने को लेकर मतभेद हैं. अंग्रेजी में इसे होमोसेक्शुअली कहा जाता है लेकिन समान लैंगिक रिश्ते बनाने वाले पुरुषों को गे और महिलाओं को लेस्बियन कहा जाता है.  सही बात ये भी होमोसेक्शुअल शब्द इसे पूरी तरह शायद परिभाषित नहीं करता.

सेक्शुअल ओरिएंटेशन क्या होता है?

सेक्शुअल ओरिएंटेशन समय के साथ किसी व्यक्ति के प्रमुख यौन आकर्षण की दिशा का जिक्र करने का एक तरीका है. एक व्यक्ति जो एक ही जेंडर  के लिए लगातार यौन आकर्षण का अनुभव करता है उसे होमोसेक्सुअल ओरिएंटेशन  कहा जाता है. एक व्यक्ति जो विपरीत लिंग के लगातार आकर्षण का अनुभव करता है उसे हीटरोसेक्शुअल ओरिएंटेशन कहा जाता है.

LGBTQ कौन हैं?

इसमें एल का मतलब लेस्बियन, है तो जी का मतलब गे से है. बी उन लोगों की बात करता है, जिनके दोनों जेंडर्स के साथ प्रेम और/या शारीरिक संबंध  हैं, वो ‘बाई-सेक्सुअल‘ कहलाते हैं. टी का मतलब ट्रांसजेंडर से है तो क्यू है ‘क्युएर. क्यूएर लोग अपने सेक्स और/या सेक्सुअल ओरिएंटेशन को लेकर कुछ तय नहीं कर पाते है या फिर प्रदर्शित नहीं करना चाहते.

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में सेक्शन-377 को लेकर क्या चल रहा है?

याचिकाकर्ताओं में शामिल अरविंद दातार ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति का यौन रुझान अलग है. तो इसे अपराध नहीं कहा जा सकता. इसे प्रकृति के खिलाफ नहीं कहा जा सकता.

सीजेआई ने पूछा, 'अगर सेक्शन-377 खत्म करते हैं, तो अगला सवाल यह होगा कि क्या वे शादी कर सकते हैं या लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं.' इस पर रोहतगी ने कहा, 'अगर कोई लिव-इन में है, तो लिव-इन पार्टनर को घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत संपत्ति के अधिकार मिलते हैं.'

सीजेआई ने कहा कि आज सवाल यह है कि सेक्शन-377 आपराधिक है या नहीं. पहले सेक्शन-377 को असंवैधानिक घोषित किया जाना होगा. यदि अन्य अधिकार सामने आते हैं तो उनको बाद में देखा जाएगा.

सीजेआई दीपक मिश्रा ने कहा कि मामला केवल धारा 377 की वैधता से जुड़ा हुआ है. इसका शादी या दूसरे नागरिक अधिकारों से लेना-देना नहीं है. वह बहस दूसरी है.

रोहतगी ने महाभारत के शिखंडी और अर्धनारीश्वर का भी उदाहरण दिया कि कैसे धारा 377 यौन नैतिकता की गलत तरह से व्याख्या करती है.

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, 'यह केस धारा 377 तक सीमित रहना चाहिए. इसका उत्तराधिकार, शादी और संभोग के मामलों पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए.'



समलैंगिकता के अलग अलग पहलु क्या हैं ?

भावनाएं - ये तय करता है कि सामने वाले व्यक्ति, चाहे जो भी उसका जेंडर हो, उसके लिए आपकी भावनाएं कैसी हैं. क्या आपको पूरी तरह मालूम है कि आप उसकी और आकर्षित हैं. या आप कन्फ्यूज़्ड हैं? या आपको यह भी तय नहीं है कि आप होमोसेक्शुअल हैं या बाईसेक्शुअल? आपका जेंडर बहुत बात भावनाएं तय करती हैं कि आप किसी के लिए कैसा महसूस करते हैं.

व्यवहार -  हो सकता है कि बच्चे कम उम्र में समलैंगिक यौन संबंधों के साथ प्रयोग करें लेकिन जीवन में बाद में समलैंगिक संबंध कभी नहीं बनाएं क्योकि उसे वो व्यवहार नहीं पसंद आए. ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने कभी अपने समलैंगिक आकर्षण पर काम नहीं किया यानि उनका व्यवहार कभी समलैंगिक नहीं रहा.

पहचान - हमपर पहचान की संस्कृति बेहद हावी रहती है. हर एक लेबल और श्रेणी के साथ पहचान का एक अलग स्तर आता है. लेकिन यह पहचान कर पहचान का स्तर कहीं भी यह यौन पहचान के दायरे में एक नहीं हो पता. कोई समलैंगिक समुदाय को एक नज़र से देख सकता है   या एलजीबीटीक्यूआई की नजर से.

जीवन जीने का तरीका - होमोसेक्सुअल होना या न होना ज़रूरी नहीं है. ज़रूरी ये है कि उसके साथ के लोगों से व्यवहार और तौरतरीका कैसा है.

किन देशों में समलैंगिकता अपराध है

दुनिया के 72 देशों में समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखा गया है. कुछ देशों में तो इसके लिए मौत की सजा का भी प्रावधान है. खासकर अरब देशों में समलैंगिक संबंधों के दोषियों के लिए बेहद कठोर दंड का प्रावधान है.

सूडान, ईरान, सऊदी अरब, यमन में गे सेक्स के लिए मौत की सजा दी जाती है. सोमालिया और नाइजेरिया के कुछ हिस्सों में भी गे सेक्स के बदले मौत की सजा लोगों को मिलती है. हालांकि, दुनिया में कुल 13 देश ऐसे हैं जहां गे सेक्स को लेकर मौत की सजा देने का प्रावधान है. अफगानिस्तान,पाकिस्तान, कतर में भी मौत की सजा का प्रावधान है, लेकिन इसे लागू नहीं किया जाता है. इंडोनेशिया सहित कुछ देशों में गे सेक्स के लिए कोड़े मारने की सजा दी जाती है. वहीं, अन्य देशों में भी इसे अपराध की श्रेणी में रखा गया है और जेल की सजा दी जाती है.



किन देशों में समलैंगिकता को स्वीकार कर लिया गया है

बेल्जियम, कनाडा, स्पेन, दक्षिणअफ्रीका, नॉर्वे, स्वीडन, आइसलैंड, पुर्तगाल, अर्जेंटीना, डेनमार्क, उरुग्वे, न्यूजीलैंड, फ्रांस, ब्राजील, इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, लग्जमबर्ग, फिनलैंड, आयरलैंड, ग्रीनलैंड, कोलंबिया, जर्मनी, माल्टा भी समलैंगिक शादियों को मान्यता दे चुके हैं.  दुनिया के 26 देश ऐसे हैं जो समलैंगिकता को कानूनन सही करार चुके हैं. पिछले साल ही ऑस्ट्रेलिया की संसद ने भारी बहुमत से इसे मान्यता दी थी. ऑस्ट्रेलिया के 150 सदस्यों के संसद में सिर्फ 4 सदस्यों ने समलैंगिक शादियों के खिलाफ वोट किया था.

कहां समलैंगिक शादियां कानूनी तौर पर मान्य हैं

नीदरलैंड ने सबसे पहले दिसंबर 2000 में समलैंगिक शादियों को कानूनी तौर से सही करार दिया था. 2015 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक शादियों को वैध करार दिया था. हालांकि, 2001 तक 57 फीसदी अमेरिकी लोग इसका विरोध करते थे. Pew Research के मुताबिक, 2017 में 62 फीसदी अमेरिकी इसे सपोर्ट करने लगे.

क्या ये बीमारी है

दुनियाभर में डॉक्टर और मनोवैज्ञानिक अब मानने लगे हैं कि ये कोई बीमारी नहीं है. इंडियन साइकियाट्रिक सोसायटी का कहना है कि समलैंगिकता, ‘लैंगिक विविधता’ का एक रूप है, कोई ‘मानसिक बीमारी’ नहीं. ये बात सोसायटी की ओर से उनके फेसबुक पेज पर एक वीडियो के ज़रिये कही गई.

ये पेज कहता है कि ये उतना ही प्राकृतिक है, जितना स्त्री-पुरुष के बीच संबंध. भारत में ऐसा पहली बार हुआ है कि मनोरोगों से संबंधित किसी संस्था ने ये बात कही है.

समलैंगिक मसले पर कब क्या हुआ0

वर्ष 2001            - समलैंगिक लोगों के लिए आवाज उठाने वाली संस्था नाज फाउंडेशन ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की

02 सितंबर 2004 - हाई कोर्ट ने अर्जी खारिज की

सितंबर 2004      - याचिकाकर्ताओं ने रिव्यू पीटिशन दाखिल की

03 नवंबर, 2004  - हाई कोर्ट ने रिव्यू पीटिशन भी खारिज की

दिसंबर, 2004     - याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी

03 अप्रैल 2006   - सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट से इस मामले को दोबारा सुनने को कहा

18 सितंबर 2008 - केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट से अपना पक्ष रखने के लिए समय की मांग की

2 जुलाई, 2009    - हाई कोर्ट का फैसला, इसे अपराध माना गया

11 दिसंबर 2013 - सुप्रीम कोर्ट ने अपराध करार दिया

2014          - सुप्रीम कोर्ट ने रिव्यू पीटिशन खारिज कर दी

जुलाई 2014       - सुप्रीम कोर्ट में फिर से सुनवाई
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