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Explainer : शिवसेना के सिंबल और प्रतीक पर होगा किसका अधिकार, क्या हैं नियम

किसे मिलेगा शिव सेना का पार्टी चिन्ह और पार्टी का नाम

किसे मिलेगा शिव सेना का पार्टी चिन्ह और पार्टी का नाम

महाराष्ट्र में शिव सेना में एकनाथ शिंदे की अगुवाई विधायकों के एक गुट ने ना केवल बहुमत का दावा किया है बल्कि ये कहा है कि चूंकि उनके पास ज्यादा विधायक हैं लिहाजा पार्टी के नाम और चिन्ह पर उनका अधिकार बनता है. क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है. इसे लेकर चुनाव आयोग के क्या नियम हैं

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महाराष्ट्र में शिवसेना के बागी विधायकों के नेता एकनाथ शिंदे ने दावा किया है कि चूंकि उनके पास विधायकों की संख्या ज्यादा है, लिहाजा वही अब असली शिव सेना हैं और पार्टी का चुनाव चिन्ह और प्रतीक पर उनका अधिकार है. फिलहाल शिंदे गुट महाराष्ट्र विधानसभा में 55 में 40 विधायकों के अपने साथ होने का दावा कर चुका है. चुनाव आयोग को इसका फैसला करना है, पहले भी कई बार पार्टी टूटने के चलते इस तरह के मामले चुनाव आयोग में पहुंचे हैं.

शिंदे और शिव सेना के बागी विधायक फिलहाल गुवाहाटी में हैं. इस गुट का कहना है कि अब असली शिव सेना वही हैं, लिहाजा पार्टी के नाम और प्रतीक को इस्तेमाल करने का हक भी उनका है. जानते हैं कि इसे लेकर चुनाव आयोग का क्या नियम है

चुनाव आयोग इस बारे में चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश 1968 पर चलता है. जो सियासी पार्टियों को मान्यता देने और सिंबल का काम करता है. इस आदेश का पैराग्राफ 15 साफ तौर पर पार्टी टूटने की सूरत में ये व्याख्या करता है तब पार्टी का नाम और सिंबल किसे दिया जाए. इसे लेकर कुछ शर्तें हैं. जिन्हें लेकर संतुष्ट होने के बाद ही चुनाव आयोग कोई फैसला लेता है..

बगैर पर्याप्त सुनवाई और दस्तावेजों और प्रमाणों चुनाव आयोग कोई फैसला नहीं लेगा. वो पार्टी टूटने की सूरत में दोनों पक्षों की बातों को सुनेगा और फिर संतुष्ट होने पर ही कोई फैसला देगा.

सवाल – इस बारे में क्या है नियम और कब पहली बार हुआ फैसला?

– इसकी नौबत तब आई जबकि इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री होते हुए कांग्रेस के लोगों से अपील की कि वो राष्ट्रपति के चुनाव में अंतरात्मा की आवाज पर वोट दें. तब कांग्रेस सिंडिकेट ने अपना आधिकारिक प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी को बना रखा था तो वीवी गिरी को इंदिरा गांधी का समर्थित उम्मीदवार माना जा रहा था. वह निर्दलीय थे.

कांग्रेस के अध्यक्ष निंजलिगप्पा ने पार्टी प्रत्याशी को वोट देने के लिए व्हिप जारी किया लेकिन बड़े पैमाने पर कांग्रेस के लोगों ने वीवी गिरी को वोट दिया. वो जीत गए. तब नवंबर 1969 को इंदिरा गांधी को कांग्रेस सिंडिकेट ने पार्टी ने निकाल दिया. इसके बाद इंदिरा ने अपनी अलग पार्टी बनाकर सरकार को बचा लिया. वह खुद प्रधानमंत्री बनी रहीं.

इसके बाद पार्टी के चुनाव चिन्ह को लेकर मामला चुनाव आय़ोग में पहुंचा. तब आयोग ने कांग्रेस सिंडिकेट को ही असली कांग्रेस माना. उनके पास कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बैलों का जोड़ा बने रहने दिया गया तो इंदिरा की कांग्रेस आर को गाय और बछड़ा का चुनाव चिन्ह मिला.

सवाल – चुनाव आय़ोग ऐसे मामलों में क्या देखता है?

हालांकि इस मामले में चुनाव आयोग ने दोनों ही गुटों के सांसद और विधायकों की गिनती की. हाल के मामलों में चुनाव आयोग तब पार्टी के पदाधिकारियों औऱ चुने हुए प्रतिनिधियों दोनों की बात सुनकर फैसला करता रहा है और ये देखता है कि पार्टी टूटने की सूरत में पार्टी के कितने पदाधिकारी किस गुट के साथ हैं. उसके बाद वो चुने हुए सांसदों औऱ विधायकों की गिनती करता है.

सवाल – शिव सेना के मामले में क्या है?

शिव सेना की ताजा टूट में फिलहाल पार्टी के अमूमन सभी पदाधिकारी उद्धव ठाकरे के गुट के साथ हैं. और अगर इनके साथ सांसदों औऱ विधायकों को जोड़ लें तो उद्धव ठाकरे का पलड़ा ज्यादा भारी बैठता है. एकनाथ शिंदे के साथ अब तक पार्टी का कोई पदाधिकारी नहीं गया है. इंदिरा गांधी ने जब पार्टी तोड़ी थी तब कांग्रेस सिंडिकेट को असली कांग्रेस माना गया था क्योंकि तब कांग्रेस पार्टी के ज्यादातर पदाधिकारी सिंडिकेट के साथ थे. फिर सांसदों औऱ विधायकों को जोड़ने पर भी उनकी संख्या पर्याप्त थी.

सवाल – तब चुनाव आयोग दूसरे गुट को क्या कहता है?

तब आयोग उन्हें दूसरी पार्टी के तौर पर मान्यता दे देता है और उनसे नया नाम और नया सिंबल लेने को कहता है. हालांकि चुनाव आयोग अपने विवेक से दोनों ही गुटों को नया नाम बनाने और नया सिंबल लेने को कह सकता है और पुराने नाम और चुनाव चिन्ह को फ्रीज भी कर सकता है.

सवाल – तमिलनाडु में जब ऐसा हुआ तब आयोग ने क्या किया?

1986 में तमिलनाडु में एमजी रामचंद्रन के निधन के बाद भी एआईएडीएमके के दो गुट बन गए. अन्नाद्रमुक यानि एआईएडीएमके पर जयललिता ने भी दावा किया और एमजी रामचंद्रन की विधवा जानकी रामचंद्रन ने भी.

जानकी रामचंद्रन 24 दिनों के लिए तमिलनाडु की मुख्यमंत्री भी बनीं. मगर जयललिता ने संगठन के ज़्यादातर विधायकों और सांसदों का समर्थन ही हासिल नहीं किया बल्कि पार्टी के कई पदाधिकारी भी उनकी ओर चले गए. नतीजतन पार्टी का आधिकारिक चुनाव चिह्न जयललिता को मिला.

सवाल – लोकजन शक्ति पार्टी के विवाद में क्यों अलग फैसला हुआ?

पिछले साल अक्टूबर में तब भारतीय चुनाव आयोग ने चाचा पारस पासवान और भतीजे चिराग पासवान के बीच पार्टी और पार्टी सिंबल पर दावे की लड़ाई के बीच पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न दोनों को फ्रीज कर दिया. नतीजतन अब लोक जनशक्ति पार्टी और चुनाव चिह्न पर इन दोनों का कोई अधिकार नहीं रह गया. दोनों को अपनी नई पार्टी बनानी पड़ी. नया चिह्न लेना पड़ा.

सवाल – अखिलेश को कैसे समाजवादी पार्टी पर नियंत्रण और चिन्ह मिल गया?

वर्ष 2017 में समाजवादी पार्टी पर कब्जे के लिए भी टकराव हुआ. उसमें लड़ाई पिता और बेटे के बीच थी. जनवरी 2017 में लखनऊ में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाकर अखिलेश ने सुनिश्चित कर लिया कि पार्टी उन्हें अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने. इसके बाद पार्टी में भूचाल आ गया.

समाजवादी पार्टी का गठन करने वाले मुलायम सिंह यादव और उनके भाई शिवगोपाल यादव ने इसका विरोध किया. दो गुट बन गए. दोनों गुट भारतीय चुनाव आयोग के पास पहुंचे. दोनों ने पार्टी और पार्टी सिंबल पर अधिकार जताया.

इसमें तकनीकी पेच ये था कि मुलायम ने ये नहीं कहा था कि पार्टी बंट रही है. चुनाव चिह्न उन्हें दे दिया जाए. फिर अखिलेश ने चुनाव आयोग के सामने तमाम ऐसे दस्तावेज पेश किए, जिससे साबित हो गया कि लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा में चुने हुए ज्यादा प्रतिनिधि उनके साथ हैं. और पार्टी के ज्यादा पदाधिरियों का समर्थन भी उन्हें हासिल है. ऐसे में चुनाव आयोग ने अखिलेश के दावे को मानते हुए उन्हें ना केवल समाजवादी पार्टी का अध्यक्ष माना बल्कि पार्टी के चुनाव चिह्न साइकिल को भी उनके पास रहने दिया.

Tags: Maharashtra, Shiv sena, Shiv Sena MLA, Uddhav thackeray

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