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Explainer : दलबदल करने वाले विधायकों की किस 'ट्रिक' से स्पीकर हो जाता है शक्तिहीन

महाराष्ट्र विधानसभा में फ्लोर टेस्ट होना है लेकिन स्पीकर की पॉवर पर रोक लगी हुई है. (shutterstock)

महाराष्ट्र विधानसभा में फ्लोर टेस्ट होना है लेकिन स्पीकर की पॉवर पर रोक लगी हुई है. (shutterstock)

जब विधायक बागी बनकर पार्टी बदलते हैं तो सबकी नजरें उनकी योग्यता के सवाल पर स्पीकर की ओर घूम जाती हैं. स्पीकर को संविधान ने इस संबंध में पॉवर दे रखी है लेकिन अगर उसे खुद हटाने की नोटिस कोई भी विधायक सर्व कर दे तो अगले 14 दिनों के लिए उसकी शक्तियां खत्म हो जाती हैं और अक्सर दल बदलने वाले विधायक इसका फायदा उठाते हैं.

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30 जून को महाराष्ट्र विधानसभा में उद्धव ठाकरे की सरकार का फैसला फ्लोर टेस्ट में होगा. राज्यपाल ने इसका आदेश दिया था. हालांकि इससे पहले भी बहुत कुछ हुआ है शिव सेना के बागी विधायकों ने स्पीकर पर अविश्वास जाहिर करते हुए एक नोटिस दिया था. उसी नोटिस ने अब महाराष्ट्र के कार्यकारी स्पीकर को एक तय समय सीमा के लिए शक्तिहीन स्थिति में पहुंचा दिया. इस दौरान वह बागी विधायकों की अयोग्यता को लेकर कोई फैसला नहीं कर सकते.

इसके बाद जब महाराष्ट्र के डिप्टी स्पीकर ने शिव सेना के बागी विधायकों को जब नोटिस भेजी थी, उसके खिलाफ वो सुप्रीम कोर्ट की शरण में पहुंच गए थे. इसी के चलते उन्हें सुप्रीम कोर्ट से ये राहत मिली कि स्पीकर 11 जुलाई तक उनसे स्पष्टीकरण नहीं मांग सकते.

30 जून को विधानसभा में होने वाले फ्लोर टेस्ट में क्या होगा, नहीं मालूम लेकिन इसमें सबकी निगाहें अगर उद्धव सरकार के पक्ष या विपक्ष में पड़ने वाले वोटों पर होगा तो स्पीकर की भूमिका भी इसमें खासी अहम होनी चाहिए थी, लेकिन बदली हुई स्थितियों ने स्पीकर के हाथ पैर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से बांध दिए हैं.

हालांकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत स्पीकर के अधिकारों को बहाल रखने का भी फैसला दिया है. तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्पीकर के फैसले के बाद वो उनके फैसले की समीक्षा कर सकता है लेकिन उसके फैसले में दखल नहीं दे सकता. तब उसने किसी भी तरह की दखलंदाजी से मना कर दिया था.

महाराष्ट्र के मामले में जब स्पीकर ने बागी विधायकों को नोटिस जारी करके उनसे स्पष्टीकरण मांगा तो सुप्रीम कोर्ट ने जवाब देने के लिए तारीख को 11 जुलाई तक के लिए बढ़ा दिया. इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने अयोग्यता करार देने की प्रक्रिया में भी देरी कर दी है. जिसका असर महाराष्ट्र सदन में विश्वास मत के दौरान नजर भी आएगा.

स्पीकर के अधिकार और उसे हटाने की प्रक्रिया को संविधान की दसवीं सूची में पर्याप्त तरीके से साफ लिखा है लेकिन सुप्रीम कोर्ट का वर्ष 2016 में हुआ एक फैसला एक ऐसी नजीर बन गया है जो बागी विधायकों के दलबदल करने की स्थिति में बहुत काम आ रहा है.

सवाल – 10वीं अनुसूची क्या कहती है?
– दसवीं अनुसूची या दल बदल विरोधी कानून को 1985 में लाया गया. ये सदन के स्पीकर के उन चुन हुए प्रतिनिधियों को अयोग्य करने की पावर देता है, जो पार्टी से हटा सकते हैं, जो पाला बदल कर रहे हों यानि अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल हो रहे हों. इस मामले में 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला किहोतो होलाहान बनाम झाचिलुहू मामले में दिया था. तब उन्होंने स्पीकर की पॉवर को बहाल करते हुए फैसला दिया था कि स्पीकर का अंतिम फैसला न्यायिक समीक्षा के दायरे में होगा.
हालांकि 2016 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने स्पीकर की ताकत में बदलाव करते हुए इसे संतुलित कर दिया. तब अरुणाचल प्रदेश के संविधान संकट की स्थिति में नबम रेबिया बनाम बेमांग फेलिक्स केस में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा लैंडमार्क फैसला दिया जिसने स्पीकर की पॉवर को सीमित कर दिया.

सवाल – वो नबम रेबिया फैसला क्या था?
– वो मामला दरअसल एक बड़े फलक पर अगर देखें तो राज्यपाल की शक्तियों और संवैधानिक सीमा पर था. लेकिन उसमें दलबदल और स्पीकर को लेकर भी एक ऐसा पहलू आया, जो वाकई उल्लेखनीय हो चुका है.  उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर स्पीकर के खिलाफ कोई अविश्वास मत लंबित हो तो स्पीकर संविधानिक तौर पर अयोग्यता की कार्यवाही को आगे नहीं बढ़ा सकता. इस फैसले ने पार्टी छोड़ने वाले प्रतिनिधियों को एक रास्ता तो दे ही दिया.

सवाल – क्या चुने विधायकों ने बाद में इस रास्ते को अपनाया?
– हां, वर्ष 2016 से विधायक चाहे किसी राज्य या पार्टी के हों इस कानून से खेलते हुए रास्ता बनाने लगे हैं. वर्ष 2016 में उत्तराखंड में विजय बहुगुणा समेत कांग्रेस के बागी विधायकों बीजेपी की ओर पाला बदलने के बाद दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए स्पीकर कुंजवाल को हटाने का नोटिस दिया.
वर्ष 2018 में अन्नाद्रमुख के विधायक ए करुणेण ने तमिलनाडु के विधानसभा के सेक्रेटरी के श्रीनिवासन को नोटिस भेजकर स्पीकर पी धनपाल को तब हटाने के लिए कहा जबकि अन्नाद्रमुक की लीडरशिप करुणेश और तीन अन्य विधायकों के खिलाफ कार्रवाई कर रही थी.

जून 2020 में कांग्रेस ने मणिपुर में स्पीकर वाई खेमचंद को हटाने के लिए नोटिस सर्व किया, क्योंकि उसके 09 विधायक बीजेपी में चले गए थे.

सवाल – किस तरह स्पीकर हटाए जा सकते हैं? 
संविधान के आर्टिकल 179 के तहत स्पीकर विधानसभा में बहुमत के आधार पर प्रस्ताव लाकर हटाया जा सकता है. लेकिन इस प्रक्रिया के लिए 14 दिनों का नोटिस देना पड़ता है.
वर्ष 2016 में नेबम रेबिया फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 179 का उल्लेख करते हुए कहा तत्कालीन विधानसभा के सभी सदस्य स्पीकर को हटाने की नोटिस दे सकते हैं. मतलब ये है कि अगर एक बार स्पीकर को हटाने का नोटिस दे दिया गया है तो दसवीं अनुसूची के अनुसार वह कोई फैसला नहीं ले सकता.

महाराष्ट्र की स्थिति में सीनियर एडवोकेट नीरज किशन कौल बागी शिव सेना विधायकों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए तो उन्होंने 2016 के नेबम रेबिया फैसले का हवाला दिया कि क्यों डिप्टी स्पीकर विधायकों की अयोग्यता का फैसला नहीं कर सकते क्योंकि खुद उनके खिलाफ हटाए जाने का प्रस्ताव लंबित है.

सवाल – सुप्रीम कोर्ट ने आखिर 2016 में ऐसा फैसला क्यों दिया था?
सुप्रीम कोर्ट का मानना था कि अगर सदन को स्पीकर पर विश्वास ही नहीं है. उसे हटाने का प्रस्ताव लंबित हों तो वह कैसे विधायकों की योग्यता संबंधी फैसला ले सकता है. ऐसी स्थिति में तो उसके पास विधानसभा का विश्वास ही नहीं है.

Tags: Maharashtra, Shiv sena, Shiv Sena MLA

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