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Explainer : क्या हैं दलितों के अधिकार, संविधान उनके लिए क्या कहता है

Explainer : क्या हैं दलितों के अधिकार, संविधान उनके लिए क्या कहता है

भारत के संविधान में देश के नागिरकों के अधिकारों के बारे में बहुत साफ तरीके से व्याख्या की गई है.

भारत के संविधान में देश के नागिरकों के अधिकारों के बारे में बहुत साफ तरीके से व्याख्या की गई है.

भारत का संविधान अपने हर नागरिक के लिए समानता और समान अधिकार और अवसरों की बात करता है लेकिन हकीकत ये है कि अधिकार होने के बाद भी दलितों को उसे हासिल करना हमेशा ही मुश्किल रहा है. बहुत से अधिकार दलितों को संविधान सभा की बहसों से मिले और कई उनके अपने संघर्ष और आंदोलनों से. जानते हैं कि क्या हैं दलितों के अधिकार

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हाइलाइट्स

दलितों को बहुत से अधिकार संविधान सभा में लंबी चली बहसों के बाद मिले
बहुत से अधिकार उन्होंने संघर्ष और आंदोलनों से भी हासिल किए
हालांकि उनका सही क्रियान्वयन अब भी एक चुनौती ही है

राजस्थान के जालौर के एक गांव में स्कूली बच्चे को केवल मटके से पीने के कारण एक टीचर ने जिस तरह उसे पीट पीटकर मार डाला, वो वास्तव में शर्मनाक है. हमारे सामाजिक सुधार कार्यक्रमों पर ये बड़ा सवाल भी है कि इतने लंबे समय बाद भी हम अपनी मानसिकता क्यों नहीं बदल पा रहे हैं. वैसे जहां तक संविधान की बात है तो सभी नागरिकों को बराबर मानता है और दलितों को कुछ अधिकार भी देता है.

दलितों के लिए लगातार आवाज उठाने वाले दिल्ली के एडवोकेट अमित साहनी ने अपने ब्लॉग में इसके बारे में विस्तार से लिखा है. इसके अलावा संविधान और समय समय पर प्रकाशित किताबों में भी इसका जिक्र किया गया है.

भारतीय संविधान सभी नागरिकों को मौलिक अधिकार के रूप में समानता का अधिकार देता है. भारतीय संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मूल अधिकारों का वर्णन है.

क्या है समता का अधिकार
आर्टिकल 14 कहता है कि कोई भी व्यक्ति विधि के समक्ष समता या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं रहेगा. भारतीय संविधान में शैक्षिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग के पक्ष में कानून बनाने और आरक्षण देने से संबंधित प्रावधान है. इसके तहत न केवल शैक्षिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग बल्कि महिलाओं और बच्चों के पक्ष में भी कानून बनाने का प्रावधान है और ऐसे कानून सांविधानिक रूप से पूर्णतय वैध होंगे.

प्रोमोशन में विशेष दर्जा
आर्टिकल 15 और 16 में शैक्षिक और सामाजिक रूप से कमजोर नागरिकोंं के उत्थान के लिए जरूरी प्रावधान हैं, जिसके तहत इस वर्ग को शिक्षा, नौकरियों और प्रमोशन में विशेष दर्जा मिलता है. उद्देश्य यही है कि इस वर्ग के पिछड़ेपन को दूर कर सामाजिक समानता दिलाकर बाकी वर्गों के बराबर दर्जा दिया जा सके.

आर्टिकल 15 कहता है कि राज्य अपने किसी नागरिक के साथ केवल धर्म, जाति, लिंग, नस्ल और जन्म स्थान या इनमें से किसी भी आधार पर कोई भेद नहीं करेगा.

क्या कहता है अनुच्छेद 15
धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव किसी भी हालत में नहीं होना चाहिए. इस अनुच्छेद में ये बातें कही गई हैं
1. राज्य किसी नागरिक के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर या इनमें से किसी एक के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा.
2. किसी नागरिक के साथ धर्म, नस्ल, जाति, जन्मस्थान के आधार पर या इनमें से किसी के आधार पर निम्‍न संबंध में भेदभाव नहीं होगा.
ए. देश का हर नागरिक बगैर भेदभाव के दुकानों, सार्वजनिक रेस्त्रां, होटल और सार्वजनिक मनोरंजन के साधन तक पहुंच सकेगा.
बी. सार्वजनिक कुएं, जलाशय, स्नानघाट, सड़क और सार्वजनिक आश्रय आम जनता के हर वर्ग के इस्तेमाल के लिए समर्पित हैं, इनका इस्तेमाल हर वर्ग, जाति और धर्म का व्यक्ति कर सकेगा.
3. राज्‍य महिलाओं व बच्‍चों के लिए विशेष प्रावधान बना सकते हैं.
4. इस अनुच्छेद में या अनुच्छेद 29 (2) का कोई विषय राज्य को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े नागरिकों की प्रगति के लिए कोई विशेष प्रावधान बनाने से नहीं रोकेगा.

अनुच्छेद 15 (4) संविधान में संवैधानिक (प्रथम संशोधन) अधिनियम, 1951 के द्वारा जोड़ा गया, इसने कई अनुच्छेदों को संशोधित भी किया गया. इस प्रावधान ने राज्य को तकनीकी, यांत्रिकी और चिकित्सा महाविद्यालयों तथा वैज्ञानिक व विशेषीकृत कोर्स के संस्थान समेत शिक्षा संस्थानों में अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए सीटें आरक्षित करने हेतु अधिकार संपन्न बनाया है.

आर्टिकल 16 रोजगार के बारे में क्या कहता है
आर्टिकल 16 रोजगार में समानता की बात करता है
1. सभी नागरिकों के लिए एम्प्लॉयमेंट या अपॉइंटमेंट के सामान अवसर होंगे.
2. एम्प्लॉयमेंट के मसलों में राज्य किसी नागरिक के साथ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर या इनमें से किसी एक के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा.
3. राज्य सरकार या केंद्र शासित प्रदेशों में नियुक्ति के संदर्भ में सरकार उस राज्य के निवासी होने बाबत कानून बना सकती है.
4. सरकार पिछड़े नागरिकों जिनका सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है, उनको नौकरियों में आरक्षण देने बाबत कानून बना सकती है.
4 A. सरकार पिछड़े नागरिकों जिनका सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है, उनको नौकरियों में प्रमोशन और परिणामी सेनिओरिटी में प्रमोशन में आरक्षण बाबत कानून बना सकती है.
4 B. सरकार पिछड़े नागरिकों जिनका सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है और जिनकी रिक्तियां एक वर्ष में भरी नहीं गयी हैं उनके संबंध में कानून बना सकती है कि ऐसी रिक्तियां अगले साल भरी जाएं और उसमें अगले साल कि होने वाली रिक्तियों में जोड़कर उसे अगले साल कि अधिकतम 50 फीसदी सीमा में न गिना जाए.

किस तरह दलितों ने संघर्ष कर अधिकार पाया
दरअसल में बहुत सारे अधिकार संविधान सभा की बहसों से निकले थे, जब भारतीय संविधान बना तो उसमें उन अधिकारों को लिख दिया गया. बहुत सारे अधिकार बाद में उन्होंने अपने संघर्षों-आंदोलनों से हासिल किए.

हालांकि दलितों का बहुत सारा समय और संघर्ष इसी में चला गया कि राज्य ने उन अधिकारों को ठीक से लागू नहीं किया या ठीक से कार्रवाई नहीं की. भारत का दलित दिन-प्रतिदिन केवल संविधान के लिए लड़ता है.

Tags: Constitution of India, Dalit, Dalit Community, Dalit Harassment, Human rights

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