कितना सही है वैज्ञानिकों का ‘ऊनी मैमथ’ की क्लोनिंग का प्रयास?

ऊनी मैमथ (Woolly Mammoth) जैसे विशालकाय जानवरों की क्लोनिंग के औचित्य पर सवाल उठ रहे हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

ऊनी मैमथ (Woolly Mammoth) जैसे विशालकाय जानवरों की क्लोनिंग के औचित्य पर सवाल उठ रहे हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

जानवरों की क्लोनिंग (Animal Cloning) के औचित्य की बहस के बीच हार्वर्ड वैज्ञानिक (Harvard Scientists) क्लोनिंग कर ऊनी मैमथ (Woolly Mammoth) को करोड़ों साल बाद फिर से जिंदा करने का प्रयास कर रहे हैं

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 20, 2021, 7:41 PM IST
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क्लोनिंग (Cloning) को पिछले कुछ सालों में बहुत अधिक सफलता मिली है. फिर भी जानवरों की क्लोनिंग आज भी एक विवादित विषय है. वैज्ञानिकों की एक टीम ने नेवले की प्रजाति के जानवर, काले पैर का फैरेट (Ferret) का क्लोन सफलता पूर्वक बना दिया जिसके बारे में माना जा रहा था कि वह 1980 के दशक में विलुप्त हो चुका है. उसे एक 30 साल पहले मर चुके जानवर के संरक्षित जीन्स से बनाया गया. अब हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों (Harvard Scientists) की एक टीम करोड़ों साल पहले विलुप्त हो चुके ऊनी मैमथ (Woolly Mammoth) का क्लोन बना कर उसे फिर से जिंदा करने का प्रयास कर रहे हैं.

बहस के बीच क्लोनिंग में आगे बढ़ने का प्रयास

अमेरिकी वैज्ञानिक फेरेट की विविध जनसंख्या को लौटाने के प्रयास कर रहे हैं. यह अब भी बहस का ही विषय है कि जेनेटिक तौर पर डिजाइन किए गए विलुप्त हो चुके या हो रहे जानवरों को क्लोनिंग से बचाना कितना जायज है. इससे कई तरह के खतरे सामने आने की आशंका व्यक्त की जाती रही है जिसके लिए मानव तैयार नहीं हैं.

एक बड़ा  सवाल ये भी
लेकिन मैमथ जैसे विशालकाय जीव को आज के हालातों में फिर से क्लोन कर बनाना कितना सही है. यह एक बड़ा सवाल है. वहीं यह सवाल अभी भी बना हुआ है कि क्या वाकई यह संभव भी है या नहीं. इसके लिए वैज्ञानिकों को अच्छी तरह से संरक्षित और सुरक्षित अवशेषों की आवश्यकता होगी जिससे वे स्वस्थ मैमथ का निर्माण कर सकें जो इस समय असंभव काम लगता है.

वास्तव में हो क्या रहा है

सवाल यह भी अहम है कि आखिर ऐसा प्रयास किया ही क्यों जा रहा है. वास्तव में वैज्ञानिक एक विशेष परियोजना पर काम कर रहे हैं. जिसमें वे मैमथ और एशियाई हाथी की बीच की संकर प्रजाति को बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो दोनों की नजदीकी संबंधी है. इस तरह का डीएक्सटिंक्शन एक तरतह से कुछ पारिस्थितिकी तंत्रों को बचाने के साथ बेहतर बनाने का तरीका हो सकत है.



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ऊनी मैमथ (Woolly Mammoth) के स्तर के जानवरों को फिर से पैदा करना बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य होगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


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आखिर हो क्यों रहा है यह प्रयास

इस प्रयास में लुप्तप्रायः और विलुप्त हो चुकी प्रजातियों को फिर से पैदा करने वाली गैरलाभकारी संस्था रिवाइव एंड रिस्टोर भी शामिल है. संस्था का कहना है कि इससे बनी नई प्रजातियों में मैमथ के गुण रहेंगे इससे  वे दुनियाके उत्तरी इलकों में रह सकेंगे. वैज्ञानिकों की कोशिश है कि अगर इतने विशालकाय जीव बर्फीले इलाकों में रहने लगे तो वे बर्फ को मिट्टी के नीचे दबा देंगे जिससे उत्तरी इलाकों बर्फ पिघलने का खतरा कम हो जाएगा जिससे ग्लोबल वार्मिंग को रोका जा सकेगा.

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ऊनी मैमथ (Woolly Mammoth) को क्लोन करना ही काफी नहीं होगा, उनके लिए उपयुक्त आवास भी बनाना होगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


क्या केवल फायदे ही होंगे इसके

लेकिन ऐसा नहीं है कि इसमें सभी कुछ अच्छा ही है. शेफील्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विलियम होल्ट को यह आपत्तिजनक लगता है कि क्या इस तरह से पुरानी प्रजातियों फिर से जिंदा करना और उनका अपनी उम्मीदों के मुताबिक रहने की आशा करते  हुए पर्यावरण को वापस  उस स्थिति में लाना संभव है.

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होल्ट का यह भी कहना है कि केवल एक ऐसे मैमथ का क्या उद्देश्य होगा. इसके लिए प्रभावी आवास की भी जरूरत होगी. इसके अलावा उनके दूसरे जीवों से अंतरक्रियाओं का भी सवाल खड़ा होगा. इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑप नेचर (IUCN) के इस मामले में कड़े नियम हैं कि किसे एक प्रजाति कहा जाए और किसे डीएनए के संकरण के जरिए पैदा हुई नई प्रजाति कहा जाए जो बाद में खुद लुप्तप्रायः प्रजाति हो जाए.
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