दो ग्रहों के टकराने से बने थे छोटे हीरे, जानिए उल्कापिंड से कैसे पता चला ये

वैज्ञानिकों को हीरों (Diamonds) के बारे में यह जानकारी उल्कापिंड (meteorites) के अध्ययन से पता चली. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)
वैज्ञानिकों को हीरों (Diamonds) के बारे में यह जानकारी उल्कापिंड (meteorites) के अध्ययन से पता चली. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 2, 2020, 6:15 PM IST
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खगोलीय पिंडो का अध्ययन केवल ग्रहों (Planets) के निर्माण और जीवन की खोज (search of life) को समझने के लिए ही नहीं होता है. बल्कि उनसे यह भी पता चलता है कि पदार्थ कैसे बनते हैं. एक उल्कापिंड (Meteorites) के अध्ययन से शोधकर्ताओं को हीरे (Diamonds) के निर्माण के संबंध में नई बात पता चली है. उन्होंने एक उल्कापिंड के अंदर बड़ी संख्या में पृथ्वी के बा (Extra-terrestrial) हर निर्मित हुए हीरों की खोज की है.

कैसे बने होंगे ये छोटे हीरे
गोथे यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने जो हीरे पाए हैं उनका आकार एक मिलीमीटर से भी काफी छोटा है. यूनिवर्सटी के बयान में अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक टीम ने यह साबित किया है कि ये हीरे हमारे सौरमंडल के शुरुआती समय में बने थे जब छोटे ग्रह आपस में या फिर बड़े क्षुद्रग्रह से टकराए थे.

यह सिद्धांत साबित हुआ गलत
इस अध्ययन के शोधकर्ताओं का कहना है कि इन आंकड़ों ने इस सिद्धांत का गलत सिद्ध कर दिया है कि हीरे केवल ग्रहों की गहाराई में ही बन सकते हैं. यूनिवर्सिटी के बयान के मुताबिक करीब एक करोड़ क्षुद्रग्रह पृथ्वी का चक्कर लगा रहे हैं. इनमें से कुछ यूरेलाइट्स क्षुद्रग्रह (Ureilites asteroids) होते हैं जो बड़े पिंडों के टुकड़े होते हैं. ये टुकड़े छोटे ग्रहों के टकराने से या फिर बड़े क्षुद्रग्रहों के टकराने से बने होते हैं. यूरेलाइट्स में विशाल मात्रा में कार्बन ग्रेफाइट या नौनोडायमंड्स के रूप में होता है.



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ये हीरे (Diamonds) आकार में बहुत छोटे हैं और लेकिन संख्या में बहुत ही अधिक हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


पृथ्वी पर उल्कापिंड के टकराने से क्यों नहीं बने ये हीरे
शोधकर्ताओं के मुताबिक वे हीरे जो 0.1 मिलीमीटर से ज्यादा बड़े आकार के होते हैं तब नहीं बन सके होंगे जब उल्कापिंड पृथ्वी से टकराए होंगे क्योंकि इसके लिए बहुत तेज टकराव की जरूरत होती है और इस गति से आने वाले उल्कापिंड पहले ही पूरी तरह से वाष्पीकृत हो जाते हैं और पृथ्वी से नहीं टकरा पाते हैं. इसी लिए पहले यह माना गया था कि बड़े हीरे जरू मंगल या बुध ग्रह के आकार के ग्रह बनने से पहले उनके आंतरिक हिस्सों में लगातार तेज दबाव के कारण बने होंगे.

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क्या मिला इन उल्कापिंडों में
इटली, अमेरिका, रूस, साउदी अरब, स्विट्जरलैंड और सूडान के वैज्ञानिकों की इस टीम ने मोरक्को और सूडान में पाए गए यूरेलाइट्स में सबसे बड़े हीरे खोजे और उनका विस्तार से विश्लेषण किया. शोधकर्ताओ ने कई 100 माइक्रोमीटर के आकार के हीरे भी पाए और बड़ी संख्या में नैनोमीटर पैमाने के हीरों के घोंसलों के साथ नौनोग्रेफाइट्स भी पाए.

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ये हीरे (Diamonds) किन्हीं दो छोटे ग्रहों (Planets) या फिर क्षुद्रग्रहों (Asteroids) के टकराने से बने थे. (प्रतीकात्मक तस्वीर-नासा)


कैसे बने ये हीरे
विश्लेषण से पता चला कि हीरों में बदलाव करने वाले अचानक और उच्च दबाव के कारण बनने वाली लोंड्सडैलाइट परतें  इन नौनोडायमंड्स में मौजूद हैं. शोधकर्ता प्रोफेसर फ्रैंक ब्रेंकर का कहना है कि इस तरह के असामान्य किस्म के पृथ्वी के बाहर बनने वाले हीरे तब बनते हैं जब एकदम से बहुत ही ज्यादा दबाव बना हो. यह दबाव किसी विशाल क्षुद्रग्रह की खगोलीय परिघटना के कारण हो सकता है या फिर छोटे ग्रहों के यूरिलाइट ग्रह से टकराने पर भी बन सकता है.

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इसका मतलब है कि यह संकेत पिछली अवधारणाओं के विपरीत है जिसके मुताबिक बहुत सारे यूरिलाइट हीरे मंगल या बुध के आकारे के पुराने ग्रहों में पाए जाते होंगे. बल्कि ये एक बहुत ही.विध्वंसक बल की वजह से बने हैं.
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