कितना जरूरी है सोशल मीडिया अकाउंट्स को आधार से लिंक करना?

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Updated: August 21, 2019, 12:00 PM IST
कितना जरूरी है सोशल मीडिया अकाउंट्स को आधार से लिंक करना?
सोशल मीडिया अकाउंट्स को आधार से लिंक करने का मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है

फेसबुक (Facebook), ट्विटर (Twitter) और वॉट्सऐप (whatsapp) जैसे सोशल मीडिया अकाउंट (Social Media Accounts) को क्यों न आधार से लिंक कर दिया जाए? अब इस सवाल का जवाब सुप्रीम कोर्ट में तलाशा जा रहा है. जानिए इस पूरे मसले की शुरुआत कैसे हुई और इसके पीछे का मकसद क्या है...

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फेसबुक (Facebook), ट्विटर (Twitter) और वॉट्सऐप (whatsapp) जैसे सोशल मीडिया अकाउंट (Social Media Accounts) को आधार (AADHAR) से लिंक करने का मसला सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में है. सोशल मीडिया अकाउंट को आधार से लिंक करने की मांग वाली कई याचिकाएं मद्रास, बॉम्बे और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में दाखिल की गई थीं.

मद्रास हाईकोर्ट ने इस मामले में सुनवाई भी पूरी कर ली थी. तमिलनाडु सरकार भी इस पक्ष में है कि फेसबुक जैसे सोशल मीडिया अकाउंट को आधार से लिंक किया जाए, ताकि फर्जी खबरें, आपत्तिजनक और अश्लील कंटेट्स के साथ पॉर्नोग्राफिक मैटेरियल्स और देशविरोधी गतिविधियों को रोकने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें.

फेसबुक तमिलनाडु सरकार के इस सुझाव और विभिन्न हाईकोर्ट में दाखिल की गई याचिकाओं के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई. फेसबुक का मानना है कि प्राइवेसी और सिक्योरिटी के बीच एक संतुलन होना चाहिए. सोशल मीडिया अकाउंट को आधार से लिंक करने पर अकाउंट होल्डर की प्राइवेसी का उल्लंघन होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में केंद्र सरकार, तमिलनाडु सरकार और फेसबुक, ट्विटर, गूगल और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नोटिस जारी किया है. सुप्रीम कोर्ट ने फेसबुक की अपील पर मद्रास हाईकोर्ट से कहा है कि वो इस बारे में अभी कोई फैसला नहीं दे. हालांकि कोर्ट में मामले की सुनवाई चलती रहेगी.

सोशल मीडिया अकाउंट्स को आधार से लिंक करने का मसला क्या है?
सोशल मीडिया को आधार से लिंक करने का मसला मद्रास हाईकोर्ट में दाखिल किए एक याचिका से शुरू हुआ. एंटोनी क्लिमेंट रूबीन नाम के एक शख्स ने पिछले साल इस बारे में मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी. उन्होंने अपनी याचिका में कहा था कि जितने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स हैं, उनसे जुड़े ई-मेल को आधार से लिंक किया जाना चाहिए. इसके पीछे साइबर क्राइम को रोकने का मकसद बताया गया.

facebook twitter whatsapp like social media accounts need to be linked with aadhar know the whole issue
सुुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर मद्रास हाईकोर्ट से अभी कोई फैसला देने पर रोक लगा दी है

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सुप्रीम कोर्ट में जाने के बाद ये मसला सिर्फ सोशल मीडिया अकाउंट्स को आधार से लिंक करने का नहीं रह गया है. अब अकाउंट होल्डर्स की प्राइवेसी का भी सवाल सामने आ गया है. बड़ा सवाल ये है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स अपने यूजर्स की प्राइवेसी को बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाएंगी. हालांकि सोशल मीडिया अकाउंट्स को आधार से लिंक करने का प्राइवेसी राइट्स एक्टिविस्ट और कई व्हिसल ब्लोअर विरोध भी कर रहे हैं.

सोशल मीडिया अकाउंट्स को आधार से लिंक करने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

इस बारे में मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले रूबीन एक आरटीआई और एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट हैं. इस याचिका के पीछे रूबीन अपनी एक निजी वजह बताते हैं.

इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए रूबीन ने कहा कि ‘तमिलनाडु में जलीकट्टू को लेकर विरोध प्रदर्शन हुआ था. विरोध प्रदर्शन के एक साल बाद वहां के एनिमल वेलफेयर बोर्ड ने जलीकट्टू मॉनिटरिंग कमिटी बनाई थी और मुझे इसका सदस्य बनाया गया था. कमिटी को इस बात पर नजर रखना था कि किसी जानवर के साथ अत्याचार न हो. उस वक्त कमिटी का सदस्य होने की वजह से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मुझे खूब गालियां दी गईं. मुझे धमकियां मिलीं. आपत्तिजनक बाते कहीं गई. उसके बाद ही मैंने याचिका दाखिल की. ’

रूबीन बताते हैं कि साइबर सेल में शिकायत के बाद भी उनपर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हमले करने वालों को पकड़ा नहीं जा सका. उसी वक्त उन्हें इस बात की जरूरत महसूस हुई कि कुछ ना कुछ ऐसा उपाय किया जाए ताकि सोशल मीडिया पर ऐसे उपद्रवियों की पहचान की जा सके.

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फेसबुक ने यूजर्स की प्राइवेसी का मुद्दा उछाला है


कैसे चला कोर्ट में मामला

याचिका की सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार ने कोर्ट से कहा कि फेसबुक और वॉट्सऐप्प जैसी कंपनियां जांच में जरूरी सहयोग नहीं कर रही है. सेक्सुएल अब्यूज के एक मामले की सुनवाई के दौरान भी वॉट्सऐप्प ने यूजर्स की जानकारी साझा करने से मना कर दिया. वॉट्सऐप्प का कहना था कि इस बारे में सही तरीके से आवेदन दिया जाए और इस पर गृहमंत्रालय की सहमति हो.

वॉट्सऐप्प ने शेयर किए अश्लील कंटेट्स की जानकारी देने में असमर्थता जताई और कहा कि ये एंड टू एंड इंसक्रिप्शन पॉलिसी के तहत आती है.

तमिलनाडु सरकार का कहना था कि ऐसे मामलों में आखिरी फैसला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता है. साइबर क्राइम के मामलों में राज्य को आखिरी फैसला लेने का अधिकार होना चाहिए. मद्रास हाईकोर्ट ने यहां तक कहा कि जांच में सहयोग न देने की वजह से ऐसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को क्यों न बंद कर दिया जाए?

मई 2018 में मद्रास हाईकोर्ट ने पूछा कि सोशल मीडिया अकाउंट्स को आधार से लिंक करने में दिक्कत क्या है. कोर्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को राज्य से मुख्य सचिव से बात करने को कहा. इस बारे में आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर वी कामाकोटी ने भी कोर्ट को जानकारी दी. प्रोफेसर कामाकोटी का कहना था कि एंड टू एंड इंसक्रिप्शन पॉलिसी के बाद भी कंटेट जेनरेच करने वाले यूजर्स की पहचान की जा सकती है.

सुप्रीम कोर्ट में फेसबुक और ट्विटर की तरफ से मुकुल रोहतगी और कपिल सिबब्ल जैसे दिग्गज वकील मामले की पैरवी कर रहे हैं. इनदोनों की तरफ से कहा गया है कि उनके क्लाइंट्स इंटरनेशनल लेवल पर ऑपरेट करते हैं. और अगर कोर्ट इस बारे में कोई फैसला देती है तो सारे देशों इन कंपनियों के ऑपरेशन प्रभावित होंगे. इस बात का ख्याल रखा जाए.

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First published: August 21, 2019, 11:43 AM IST
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