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जब अमेरिका में बेगुनाह बच्चे को मिली मौत की सजा, दिया गया हाई वोल्टेज करंट

40 के दशक में अमेरिका में मौत की सजा के कई तरीके थे, जिनमें से एक था बिजली के झटके देना- सांकेतिक फोटो (pixabay)
40 के दशक में अमेरिका में मौत की सजा के कई तरीके थे, जिनमें से एक था बिजली के झटके देना- सांकेतिक फोटो (pixabay)

नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन के शपथ लेने से पहले ही ट्रंप प्रशासन ने हत्या की आरोपी एक महिला को मौत की सजा (America executes first woman on federal death in seven decades) दी. इसके बाद से मौत की सजा (death penalty) पर काफी चर्चा हो रही है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 18, 2021, 6:18 PM IST
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अमेरिका में लगभग 7 दशक बाद किसी महिला को मौत की सजा हुई. जनवरी के दूसरे सप्ताह में लीसा मोंटगोमेरी नाम की महिला को घातक इंजेक्शन के जरिए सजा दी गई. दोषी महिला ने एक गर्भवती की बेरहमी से हत्या कर उसका शिशु चुराया था. पूरी दुनिया में इसकी काफी चर्चा रही. मौत की सजा देने के मामले में अमेरिका पहले भी चर्चा में आया था, जब एक नाबालिग को बिना अपराध मार दिया गया था.

ये घटना उस दौर की है, जब अमेरिका में रंगभेद काफी था. अश्वेत लोगों से हर चीज में भेदभाव हुआ करता था. तभी ये वाकया घटा. मार्च 1944 में जॉर्ज जूनियस स्टिनी अपनी बहन के साथ घर के सामने खेल रहा था, उसी वक्त दो श्वेत बच्चियां फूल ढूंढती हुई वहां पहुंची और जॉर्ज से भी इस बारे में बात की. मदद के लिए 14 साल का जॉर्ज उनके साथ गया जिसके बाद लड़कियां गायब हो गईं.

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खोजबीन पर लड़कियों की लाश रेलवे ट्रैक के पास पड़ी मिली. दोनों का सिर बुरी तरह से कुचला हुआ था. जांच में सामने आया कि वे लड़कियां आखिरी बार जॉर्ज के साथ देखी गई थीं. शक के आधार पर पुलिस ने उसे पकड़ लिया और उससे पूछताछ शुरू की.
death punishment by electric chair
दोनों लड़कियां आखिरी बार जॉर्ज के साथ देखी गई थीं- सांकेतिक फोटो (pixabay)


इसके बाद मीडिया में आया कि बच्चे ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है कि उसी ने दोनों लड़कियों (उम्र 11 और 8 साल) को मारा है. पुलिस ने प्रेस में बताया कि लड़का 11 साल की लड़की के साथ संबंध रखना चाहता था लेकिन लड़की इसके लिए तैयार नहीं हुई. इसी गुस्से में उसने दोनों ही लड़कियों का बेरहमी से कत्ल कर दिया.

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पुलिस के बयानों के आधार पर ही जॉर्ज को कोलंबियन जेल में कई महीने रखा गया. इस दौरान उसकी न परिवार और न ही मीडिया से मुलाकात कराई गई. बाद में सामने आया कि जॉर्ज के बयान की कॉपी पर उसके साइन तक नहीं थे.

सुनवाई शुरू हुई तो पीड़ित परिवार के वकील से लेकर जॉर्ज तक का वकील और यहां तक कि जज भी श्वेत था. यहां तक कि कोर्टरूम में भी किसी अश्वेत को भीतर जाने की इजाजत नहीं दी गई. भीतर ही भीतर मामले की सुनवाई हुई और फैसला हो गया. अदालत ने जॉर्ज को वयस्कों की तरह ट्रीट किया और बिना किसी गवाह, जांच और दलील के उसे दोषी मानते हुए मौत की सजा सुना दी गई.

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अदालत ने जॉर्ज को वयस्कों की तरह ट्रीट किया और बिना किसी गवाह, जांच और दलील के उसे दोषी मान लिया- सांकेतिक फोटो (pixabay)


40 के दशक में अमेरिका में मौत की सजा के कई तरीके थे, जिनमें से एक था बिजली के झटके देना. जॉर्ज को इलेक्ट्रिक चेयर पर बैठाया गया. उसकी लंबाई-चौड़ाई दोनों ही कुर्सी के हिसाब से कम थी. तब उसे किताबों के मोटे ढेर पर बैठाया गया और फिर बिजली का झटका लगाया गया. करंट इतना हाई वोल्ट था कि कुछ ही झटकों में बच्चे की मौत हो गई.

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साल 2014 में कुछ वकीलों ने बच्चे को फांसी की सजा के इस केस को दोबारा खुलवाया. कहीं कोई गवाह नहीं था, कहीं भी जॉर्ज के दस्तखत नहीं थे. तमाम कागजों के आधार पर माना गया कि जॉर्ज के साथ नाइंसाफी हुई क्योंकि वो अश्वेत था. आज भी उसे अमेरिकी कोर्ट के इतिहास में मौत की सजा पाने वाला सबसे कमउम्र शख्स माना जाता है.

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माना जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन ने मौत की ये सजा जो बाइडन के आने से पहले जान-बूझकर दे दी क्योंकि बाइडन मौत की सजा के खिलाफ हैं. कहा जा रहा है कि वे अमेरिका में इसके उपयोग प्रावधान को समाप्त करने के लिए काम करेंगे.

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चीन में कथित तौर पर हर साल हजारों लोगों को मौत की सजा दी जाती है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


सजा-ए-मौत का प्रावधान
मानवाधिकार पर काम कर रही संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल के आंकड़ों के अनुसार अब भी दुनियाभर में 53 देश ऐसे हैं, जहां कई अपराधों पर सजा-ए-मौत का प्रावधान है. इनमें भारत के अलावा जापान का भी नाम है. एमनेस्टी का डाटा कहता है कि साल 2017 में 23 देशों में 993 अपराधियों को मौत की सजा दी गई, हालांकि अनुमान ये भी है कि संख्या इससे कहीं ज्यादा होगी, जो कि देशों के अपने गोपनीयता कानूनों की वजह से सामने नहीं सकी. अलग-अलग देश अलग तरह के अपराधों पर मौत की सजा देते हैं. सजा देने का तरीका भी अलग तरह का होता है, जैसे कोई देश फांसी की सजा देता है तो गोली बेहद निर्ममता से पत्थर मारकर जान लेने का निर्देश देता है.

चीन इसमें सबसे आगे है
एमनेस्टी के ही आंकड़े कहते हैं कि पूरी दुनिया के देशों में कुल मिलाकर जितने लोगों को मौत की सजा दी गई, अकेले चीन में ही उससे ज्यादा लोगों को मौत की सजा हुई. रिपोर्ट के मुताबिक चीन में हर साल हजारों लोगों को मौत की सजा दी जाती है, हालांकि सख्त सीक्रेसी के कारण मौतों की संख्या का पता लगाना मुश्किल है.
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