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लगभग 200 किलो वजन वाले सूमो पहलवानों की खुराक क्या होती है?

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Updated: November 24, 2019, 3:02 PM IST
लगभग 200 किलो वजन वाले सूमो पहलवानों की खुराक क्या होती है?
सूमो पहलवानी में शरीर के वजन का काफी रोल है (प्रतीकात्मक फोटो)

चंको एक तरह का शोरबा है जो एक बर्तन में घंटों पकता रहता है. यही सूमो पहलवानों के वजन और ताकत का राज है लेकिन वे 1 या 2 कटोरियां नही, बल्कि एक साथ कई किलो शोरबा लेते हैं.

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सूमो रेसलर्स हमेशा बहुत भारी भरकम होते हैं लेकिन लम्बे और बड़े नहीं. जापनियों की हाइट बहुत ज़्यादा नहीं होती. पिछले कुछ दशकों में हवाई और मंगोलियाई सूमो चैंपियन बढ़े हैं और देखा गया है कि चैंपियन पहलवानों का औसत वजन जो 1930 के दशक में 300 पौंड हुआ करता था, अब बढ़कर 400 पौंड से भी ज़्यादा हो गया है. नॉर्मली कद में छोटे जापानी रेसलर्स प्रतियोगियों को बनाए रखने के लिए वे सब कुछ खाते हैं जिससे वे अपना वज़न बढ़ा सकें.

जापानी सूमो पहलवान अपने भारी-भरकम शरीर के लिए जाने जाते हैं. सूमो फाइटर्स को रिकिशी कहा जाता है. रिकिशी फाटू नाम का एक बेहद मशहूर डब्लू डब्लू ई रेसलर भी हुआ करता था. आपने देखा होगा की वह भी बहुत मोटा था. उनके लिए उनका वजन ही सब कुछ है. इसके लिए वे ढेर सारा खाना खाते हैं. कई जापानी फूड एक्सपर्ट के मुताबिक सूमो रेसलर्स किसी आम आदमी की तुलना में 8 से 10 गुना तक ज्यादा कैलोरी वाला खाना खाते हैं. कहा जाता है कि कई पेशेवर सूमो रेसलर्स रोजाना 10 हजार कैलोरी से ज्यादा तक लेते हैं ताकि रिंग में वे अपने प्रतिद्वंदी से पीछे न रह जाएं. ये सभी सूमो फाइटर्स अपना खाना खुद बनाते हैं.

सूमो रेसलिंग में भारी प्रतिद्वंद्वी को हमेशा लाभ होता है क्योंकि कोई अलग वजन का वर्ग नहीं होता है और ज़्यादा मोटे प्रतिभागियों के लिए रिंग बदला नहीं जाता, वही रहता है. इसलिए पहलवान चाहता है कि वह जितना बड़ा हो सके उतना अच्छा.

क्या है उनका भोजन

इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में जो भोजन है उसके बारे में आपको जानना चाहिए. ये सभी सूमो रेसलर स्टू खाते हैं. स्टू यानि बहुत सारी सब्ज़ियों वाला या सूप. इसमें कई तरह का मीट भी डाला जाता है. चंको नामक एक स्टू है, जिसे कभी-कभी चंको-नाबे के नाम से भी जाना जाता है. चंको नाम का यह स्टू इन सूमो रेसलर्स की पूरे जीवन को एक तरह से परिभाषित करता है क्योकि सूमो पहलवान जीवन भार रोज़ चंको ही खाते हैं. यह उनके खेल का भी प्रतीक है. ये मोटे खिलाडी चंको को इतना पसंद करते हैं कि खेल से रिटायर हो जाने के बाद भी केवल चंको ही खाते हैं. तकनीकी रूप से अगर देखा जाए तो सूमो पहलवानों द्वारा तैयार और खाए गए किसी भी भोजन को चंको कहा जा सकता है. इस पकवान को बनाने के नुस्खे या इसकी रेसिपी की बजाय खेल के साथ ज़्यादा जोड़ा जाता है.



भारत के किसी भी चीनी रेस्टोरेंट में हम जो थुक्पा कहते हैं यह कुछ वैसा होता है. इसमें आम तौर पर एक प्रकार का मांस या मछली, टोफू, सब्जियां, और चिपचिपा चावल से बने एक स्टार्च केक होते हैं. रेसलर्स के घरों में यह सूप अलग अलग तरह से बनता है. पौष्टिक भोजन का यह सबसे सस्ता और आसान माध्यम है.
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ब्रेकफास्ट में क्या खाते हैं सूमो रेसलर्स?

सूमो रेसलर्स ब्रेकफास्ट नहीं करते. ये सुबह जल्दी उठकर खाली पेट लगभग 5 घंटे तक कुश्ती की प्रेक्टिस और एक्सरसाइज करते हैं. ब्रेकफास्ट स्किप करने पीछे कारण यह है कि इससे उन्हें लंच तक काफी भूख लग जाती है और वह ज्यादा खा पाते हैं. रेसलर्स कोशिश करते हैं कि वे चंको खाने के बाद चार घंटे से ज्यादा की नींद ले लें ताकि उनका मेटाबॉलिज्म स्लो हो और वे बॉडी में फैट जमा कर लें. मेटाबॉलिज्म प्रॉसेस स्लो करने के लिए सूमो रेसलर्स बार-बार नहीं खाते. वे लंच में ढेर सारा खाना खाते हैं और इसके बाद दोपहर में सोकर उठने के बाद थोड़ा खाते हैं और हेवी डिनर करने के बाद जल्दी सो जाते हैं.

चंको खाया कैसे जाता है यह भी बेहद दिलचसप है. एक साधारण व्यक्ति के पास चंको के एक या दो कटोरे हो सकते हैं लेकिन पहलवान दिन में बहुत सारा चंको खाते हैं. नाश्ते को छोड़ कर वे नियमित रूप से दोपहर के भोजन के लिए दस कटोरे खाते हैं. बियर की भारी मात्रा में पी जाती है.

सूमो रेसलर्स के बीच होने वाले मैच कुछ ही सेकंड तक चलते हैं. पटखनी खाते ही मैच का फैसला हो जाता है. मैच के बाद ये सूमो रेसलर्स फिर से चंको खाते हैं.



कैसे काम करता है पूरा तंत्र?

जहाँ ये सूमो रहते हैं उस पूरी जगह हो हेया कहा जाता है. इसी जगह वे ट्रेनिंग भी करते हैं. हर हेया के अपने कायदे कानून होते हैं और इन सबको एक मास्टर अपनी पत्नी के साथ चलाता है. 15 - 16 की उम्र में जब छोटे सूमो हेया में आते हैं तबसे यही मास्टर और उसकी पत्नी इनके माता पिता की ही भूमिका निभाते हैं.

हर रेसलर के पास वरीयता के हिसाब के अपने काम होते हैं. पुराने रेसलर मैच देखने आते हैं या कुछ गुर सिखाते हैं लेकिन छोटे रेसलर्स सफाई करने, सब्ज़ी लाने, काटने और बनाने से लेकर चंको बनाने और सर्व करने का भी काम करते हैं. सबसे पहले चंको सीनियर रेसलर कहते हैं और जो आखिर में बचता है वह जूनियर को मिलता है. इसलिए कहा जाता है कि चंको केवल भोजन नहीं बल्कि सूमो संस्कृति का एक हिस्सा है.

सूमो संस्कृति पर रिसर्च करने वाले लेखक लिखते हैं कि सूमो कितना समय रिंग में बिताते हैं उसका सौ गुना रसोई में बिताते हैं. जो रेसलिंग में सफल नहीं हो पाते या अच्छा समय सूमो करियर में बिताने के बाद रिटायर होते हैं वे सूमो रेस्टोरेंट में काम करके जीवन यापन करते हैं. सूमो रेस्टोरेंट्स में चंको बनाने वाले इन रसोइयों को चनकुया कहा जाता है.

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First published: November 24, 2019, 3:02 PM IST
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