रोज कई किलोमीटर पैदल चलने के आदी गांधीजी के पास कहां से आई लाठी?

महात्मा गांधी के पास हरदम एक लाठी हुआ करती थी- सांकेतिक फोटो (flickr)
महात्मा गांधी के पास हरदम एक लाठी हुआ करती थी- सांकेतिक फोटो (flickr)

तेजी से पैदल चलते सीधे-सतर महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi ) के पास हरदम एक लाठी हुआ करती थी. क्या खास था उस लाठी में जो गांधीजी ताउम्र उसे लेकर चले? जानिए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 7, 2020, 6:45 AM IST
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महात्मा गांधी की दांडी यात्रा (Dandi March of Mahatma Gandhi) के बारे में लगभग सब जानते हैं. गांधीजी ने गुजरात के साबरमती आश्रम से दांडी गांव तक की लगभग 400 किलोमीटर की दूरी पैदल पार की. आम दिनों में भी अक्सर रोज 10 से 15 किलोमीटर पैदल चलने के शौकीन गांधीजी की चाल-ढाल से कहीं से नहीं लगता कि उन्हें शारीरिक कमजोर के चलते लाठी की जरूरत रही होगी. तब गांधीजी के पास लाठी आखिर कहां से और क्यों आई?

दांडी मार्च से है संबंध
ये 12 मार्च 1930 की बात है, जब गांधीजी अपने ऐतिहासिक दांडी मार्च यानी नमक सत्याग्रह (Salt March) की तैयारी कर रहे थे. वे अहमदाबाद के साबरमती आश्रम में थे. वहां उनसे मिलने के लिए काका कालेलकर आए. महात्मा गांधी के ये परम मित्र और लेखक उनकी पैदल यात्रा को लेकर थोड़ा चिंतित थे. इसके लिए उन्होंने गांधीजी को सुझाया कि साथ में एक लाठी लेकर चलना यात्रा को कुछ बेहतर बना सकेगा.

गांधीजी अपने ऐतिहासिक दांडी मार्च यानी नमक सत्याग्रह की तैयारी कर रहे थे- सांकेतिक फोटो (needpix)

काका ने दी लाठी


काका कालेलकर ने केवल ये सुझाव ही नहीं दिया, बल्कि वे अपने साथ एक लाठी लेकर भी आए थे. उन्होंने गांधी को लाठी सौंप दी और पूरी यात्रा के दौरान गांधीजी लाठी लेकर चलते रहे. रास्ते में कई नदियां भी पड़ीं, जिनकी धाराओं को उन्होंने लाठी लेकर पार किया. वे अपने साथियों के साथ रोज 12 से 20 किलोमीटर तक चलते थे, बीच-बीच में पड़ने वाले गांवों से भी लोग जुड़ते रहे. इस तरह से 24 दिनों की यात्रा के बाद 6 अप्रैल, 1930 को दांडी गांधीजी ने समुद्रतट पर नमक कानून तोड़ा.

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तस्वीरें हर ओर छा गईं
नमक जैसी निहायत जरूरी चीज पर अंग्रेजी-टैक्स के विरोध में तय की गई इस यात्रा की ढेरों तस्वीरें मिलती हैं, जिनमें गांधी लाठी लेकर चलते दिख रहे हैं. तेजी से लाठी टेकते और हजारों की भीड़ संग आगे बढ़ते गांधीजी की तस्वीरें उस दौर में बगैर इंटरनेट के भी वायरल हो गईं. वर्ल्ड मीडिया में गांधीजी की दांडी यात्रा को खूब तवज्जो मिली. साथ ही साथ उनकी लाठी भी आंदोलन का प्रतीक बन गई. इसके बाद से गांधीजी के साथ हरदम लाठी दिखने लगी.

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कहां से आई थी लाठी
गांधीजी के साथ रहने वाली लाठियां समय के साथ बदलती रहीं लेकिन काका की दी हुई लाठी सबसे खास मानी गई. उसे खुद गांधीजी ने काफी सहेजकर रखा. जानते हैं, इस लाठी की क्या खासियत थी! बांस की बनी ये साधारण लगने वाली लाठी लगभग 54 इंच ऊंची थी. इस लाठी का कर्नाटक कनेक्शन भी था. असल में ये लाठी बांसों की वो किस्म थी, जो नागर बेट्टा श्रेणी से आती है. इसमें बांस के हर जोड़ पर एक काला धब्बा कुदरती तौर पर होता है. इस तरह का बांस कर्नाटक के समुद्री तट पर मलनाद इलाके में ही पाया जाता है.

गांधीजी की की लाठी भी आंदोलन का प्रतीक बन गई- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


कन्नड़ कवि की पारिवारिक विरासत
सबसे दिलचस्प बात ये है कि गांधीजी के हाथ में आने से पहले लाठी कई हाथों से गुजर चुकी थी. लाइव हिस्ट्री इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक ये लाठी कन्नड़ कवि एम गोविंद पई के पास थी. कर्नाटक के ये कवि अपनी कविताओं के अलावा देशप्रेम में भी काफी आगे थे. यही वजह बताई जाती है कि दूसरी कई भाषाएं और खासकर अंग्रेजी में गोल्ड मेडल लेने के बाद भी पई ने कन्नड़ में ही लिखा.

वैसे कन्नड़ साहित्य में पई के साहित्य में योगदान के बारे में तो जिक्र है लेकिन उनके देशप्रेम का नहीं. इस बारे में पहली बार कन्नड़ लेखन किन्हन्ना पई ने अपनी किताब महाकवि गोविंद पई में लिखा है. वे बताते हैं कि पई गांधीजी के आंदोलन में सहयोग के सिलसिले में काका कालेलकर से मिले और यहीं दोनों दोस्त बन गए जो दोस्ती पूरी उम्र रही. पई ने अपने इस मित्र को यादगार के लिए लाठी भेंट की थी. ये लाठी पई के लिए बेहद खास थी क्योंकि ये उन्हें उनके दादा से मिली थी. यही लाठी गांधीजी की पैदल यात्रा को देखते हुए काका कालेलकर ने उन्हें दे दी.

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गांधीजी के साथ ये लाठी पूरी उम्र रही. साल 1948 जनवरी में गांधीजी के देहांत के बाद उनसे जुड़ी सारे चीजें यादगार के तौर पर अलग-अलग संग्रहालयों में सहेज दी गईं. लेकिन कोई भी शायद उतनी ख्यात न रही हो, जितनी गांधीजी की लाठी और चश्मा रहे. नेशनल गांधी म्यूजियम में आज भी ये लाठी गांधीकी की कई दूसरी लाठियों के बीच रखी हुई है.
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