कौन था, सट्टेबाजी से रोजाना 1 करोड़ कमाने वाला मटका किंग, जो हफ्तेभर पहले दुनिया से चुपचाप चला गया

जुएं को नए मुकाम पर पहुंचाने वाले रतन खत्री का ठीक हफ्तेभर पहले 9 मई को निधन हो गया

जुएं को नए मुकाम पर पहुंचाने वाले रतन खत्री का ठीक हफ्तेभर पहले 9 मई को निधन हो गया

जुंए (gambling) के खेल को नए मुकाम पर पहुंचाने वाले रतन खत्री (Rattan Khatri) का ठीक हफ्तेभर पहले 9 मई को निधन हो गया. मटका किंग (Matka King) के नाम से जाने जाते खत्री मुंबई (Mumbai) में सट्टाे के बेताज बादशाह माने जाते, जिनका रोजाना का टर्नओवर 1 करोड़ से ज्यादा था.

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रतन खत्री (Rattan Khatri) देश के विभाजन (partition of India) के दौर में पाकिस्तान (Pakistan) के कराची (Karachi) से मुंबई आए और वहीं बस गए. इसके बाद से मुंबई (Mumbai) ने कई दौर देखे. अंडरवर्ल्ड के दौर से लेकर आतंकी ब्लास्ट का दौर. इन सबके बीच शहर में सट्टा भी फल-फूल रहा था. रतन खत्री ने ट्रेडिनशल जुंए को एक खास शैली दी, जिसमें मटके से नंबर निकाला जाता और उसे दिन का लकी नंबर मान लिया जाता था. इंटरनेट और मोबाइल न होकर सिर्फ टेलीफोन के उस दौर में मिनटों में ये नंबर पूरे देश में फैल जाता था. ये मटका किंग के जुंए की लोकप्रियता ही थी.



कहानी शुरू होती है साल 1962 से, जब मुंबई पुलिस कमिश्नर के दफ्तर में सफेद कुरता-पायजामा में एक अनाम शख्स आता है और वहां पुलिसवालों से बातचीत कर रहे क्राइम रिपोर्टरों को अपने साथ एक धमाकेदार स्टोरी के लिए बुलाता है. ये स्टोरी थी पहली बार मटके से निकालकर जुएं का लकी नंबर घोषित करने की. ये अनाम शख्स था रतन खत्री, जिसने शहर में सट्टे को नयी शैली दी. ये तरीका जल्द ही लोकप्रिय होने लगा और मुंबई से ही देशभर के जुंए का कारोबार चल निकला.



रतन खत्री ने ट्रेडिनशल जुएं को एक खास शैली दी, जिसमें मटके से नंबर निकाला जाता






वो एक ऐसा समय था, जब तत्कालीन बॉम्बे में रात 9 बजे जरूरी से जरूरी ट्रंककॉल भी आप नहीं कर सकते थे. वजह! सारी टेलीफोन लाइनें पर सट्टेबाज होते, जो एक-दूसरे को वो लकी नंबर बता रहे होते थे, जो उस रोज मटका किंग ने घोषित किया होता था. इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार जुएं के इस खेल की लोकप्रियता ऐसी बनी कि रात 9 बजे के आसपास MTNL सारे कॉल रोक दिया करता था ताकि सट्टेबाज लकी नंबर बांट सकें.
वैसे खत्री ने जुंए की शुरुआत अकेले नहीं की थी. उनके साथ थे कच्छ के कल्याणजी गाला, जो साल 1944 में कच्छ छोड़कर मुंबई आ बसे थे. कल्याणजी तब एक सीधे-सादे आदमी थे, जो राशन की दुकान चलाते और वर्ली की चॉल में रहते थे. दुकान आने वाले लोगों के मुंह से न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज में सट्टे की कहानियां सुन-सुनकर कल्याणजी को भी इसमें स्कोप लगा. वहीं से सट्टे का लोकल वर्जन मटका शुरू हुआ. खेल की लोकप्रियता बढ़ने लगी क्योंकि चॉल में रह रहे कारखाना वर्कर भी इसमें 1 रुपए से खेल सकते थे. जल्दी ही ये वर्ली से जवेरी बाजार जा पहुंचा और वही इसका हेडक्वार्टर हो गया. दक्षिण मुंबई का ये बाजार अपनी तंग गलियों और सोने-चांदी के गहनों के लिए मशहूर था. वर्ली से जवेरी पहुंचने के साथ ही रतन खत्री मटके के जुंए में कल्याण जी के पार्टनर हो गए और काम चल निकला.



दक्षिण मुंबई का जवेरी बाजार अपनी तंग गलियों और सोने-चांदी के गहनों के लिए मशहूर था




खत्री को अपराधियों के साथ पुलिस और लोगों से डील करना आता था. जुंआ अवैध होने के कारण उन्हें स्थानीय पुलिस को रिश्वत देनी पड़ती थी. अपराधियों को हफ्ता देने होता था. जल्द ही कल्याणजी जुएं के खेल में खत्री से पिछड़ते गए और Rattan matka मशहूर होने लगा. यहां तक कि इसका रोजाना का टर्नओनर 1 करोड़ के आसपास हुआ करता था. इसकी बड़ूी वजह टेलीफोन का इस्तेमाल भी था. जहां तक फोन लाइन जाती थी, खत्री का जुआं देश के उस हिस्से तक फैल चुका था.



खत्री ने अपने सट्टे के लिए तीन कार्ड चुनने का अनोखा तरीका निकाला. वो पब्लिक प्लेस पर घूमते हुए किसी भी रेंडम दुकानदार को चुनता और उससे भीड़ के बीच तीन कार्ड्स उठाने को कहता. इससे कार्ड चुनने में किसी तरह की चालाकी या बदमाशी जैसा डर भी लोगों के बीच नहीं रहा. बाद में खत्री के पास इतने पैसे हो गए कि वो फिल्म मेकरों को फाइनेंस करने लगा. कई बार लोकल दुकानदारों की बजाए वो फिल्म मेकरों से भी तीन कार्ड्स चुनने को कहता.



आत्मकथा खुल्लम खुल्ला में दिवंगत ऋषि कपूर ने रतन खत्रा का जिक्र किया है




अपनी आत्मकथा खुल्लम खुल्ला में दिवंगत ऋषि कपूर ने रतन खत्रा का जिक्र किया है कि कैसे साल 1976 में एक फिल्म रंगीला रतन बनवाते हुए खत्री कई शाम उन्हें या अशोक कुमार को फोन करते और और कार्ड चुनने को कहते. इसके बाद ये कार्ड नंबर उस रोज के लकी नंबर की तरह मिनटों में मुंबई में फैल जाता. ऋषि ने खत्री के टाइम मैनेजमेंट के बारे में बताते हुए लिखा था- एक बार खत्री बंगलुरु से मुंबई फ्लाय कर रहे थे. हवाई जहाज में फोन काम न करने के कारण मटका नंबर अनाउंस करने में देर हो रही थी. ऐसे में खत्री ने पायलेट की मदद ली और कंट्रोल टावर के जरिए मटका नंबर अनाउंस किया. जुंए के अवैध होने के बाद भी पुलिस इसमें कुछ न कर सकी क्योंकि ऐसा होने पर खेल के जुड़े आम-खास सभी नाराज हो जाते और किसी बड़ी दुर्घटना का डर था.



वैसे लगातार लोकप्रियता पाने के बाद भी रतन खत्री ने साल 1993 में मटके का सट्टा बंद कर दिया. इसके पीछे कई वजहें दी जाती हैं. जैसे उसी साल खत्री अपने परिवार के साथ छुट्टियां मनाने लंदन जा रहे थे लेकिन एयरपोर्ट पहुंचने पर पता चला कि अधिकारियों ने अवैध काम से जुड़ा होने की वजह से उनका नाम no-fly list में डाल दिया था. यानी खत्री हवाई यात्रा नहीं कर सकते थे. परिवार के सामने इस तरह बेइज्जत होने के कारण उन्होंने जुएं का धंधा बंद करने का फैसला ले लिया.



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