लाइव टीवी

Diwali 2019: सूखे से जूझते इस शहर को दो भाइयों ने बना दिया पटाखा इंडस्ट्री का बादशाह

News18Hindi
Updated: October 24, 2019, 10:59 AM IST
Diwali 2019: सूखे से जूझते इस शहर को दो भाइयों ने बना दिया पटाखा इंडस्ट्री का बादशाह
शिवकाशी शहर देश में पटाखा उद्योग का बेताज बादशाह है

यहां से सेना के लिए तूफान, बारिश, बर्फ में भी काम करने वाली माचिस जाती है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 24, 2019, 10:59 AM IST
  • Share this:
तमिलनाडु का शहर शिवकाशी भले ही सैलानियों की लिस्ट में कहीं न आता हो लेकिन दिवाली के त्योहार के साथ इसका गहरा नाता रहा है. देश में 'आतिशबाजी की राजधानी' के तौर पर ख्यात इस छोटे से शहर की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से पटाखा निर्माण पर टिकी हुई है. चीन के बाद आतिशबाजी निर्माण में भारत विश्व में दूसरे नंबर पर है और शिवकाशी का इसमें 90 प्रतिशत योगदान है. एक वक्त पर सूखे से बेहाल शहर कैसे एक रोशनी से भरे उद्योग में नंबर वन बन गया, इसकी कहानी भी कम दिलचस्प नहीं.

इस तरह हुई शुरुआत
शिवकाशी में व्यवसाय की शुरुआत के तार जुड़े हुए हैं कोलकाता से. 19वीं सदी की शुरुआत में कोलकाता में माचिस की एक फैक्ट्री चलाई जाती थी. शिवकाशी में सूखा और रोजगार की कमी से परेशान दो भाई शानमुगा नाडर और पी अय्या नाडर कोलकाता की इसी फैक्ट्री में पहुंचे. यहां माचिस बनाते हुए उन्होंने पटाखा निर्माण के बारे में भी जाना. वे वापस लौटे और पटाखा निर्माण शुरू किया.

सूखा मौसम बना वरदान

आतिशबाजी निर्माण के दौरान मौसम में थोड़ी भी नमी होना बारूद की कंपोजिशन को गड़बड़ा सकता है, जिसका परिणाम घातक ही रहता है. इन मायनों में शहर का रूखा-सूखा मौसम काम के लिए अच्छा है. दो भाइयों की पहल ने धीरे-धीरे पूरे शहर को रोजगार कमाने का तरीका सुझा दिया और इस तरह से शिवकाशी में आतिशबाजी उद्योग की शुरुआत हुई. अब यहां सात लाख से ज्यादा लोग पटाखा निर्माण व्यवसाय में लगे हुए हैं. नाडर समुदाय अब भी इस काम में वर्चस्व रखता है. चूंकि आतिशबाजी उद्योग मौसमी व्यवसाय है, इस वजह से साल के कई महीने यहां के लोग माचिस निर्माण का काम करते हैं.



यहीं तय होता है स्टैंडर्ड
Loading...

इस शहर में अपना खुद का फायरवर्क्स रिसर्च और डेवलपमेंट सेंटर (एफआरडीसी) है. पूरी आतिशबाजी इंडस्ट्री के लिए यहां मानक तय होते हैं. इसमें कच्चे माल की जांच, पटाखा निर्माण के दौरान सुरक्षा मानकों की जांच और निर्माण उद्योग में जुटे हुए लोगों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करने पर जोर दिया जाता है.

रोशनी का अंधेरा पहलू
हालांकि ये भी उतना ही सच है कि अवैध रूप से चल रहे आतिशबाजी उद्योग नियमों को धता बताकर काम कर रहे हैं, जिस वजह से पटाखा निर्माण के दौरान दुर्घटनाएं आम होती जा रही हैं. बाल मजदूरी भी इसका एक अंधेरा पहलू है. पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के आंकड़ों के अनुसार 14 साल से कम उम्र के 45 हजार से भी ज्यादा बाल मजदूर इसमें पूरी तरह से लगे हुए हैं और ये आंकड़ा लगातार बढ़ता ही जा रहा है. इसे कम करने के लिए सरकार हालांकि केंद्र और स्थानीय स्तर पर कोशिश कर रही है.

सेना के लिए भी काम 
इस औद्योगिक शहर की एक और खूबी है और वो है भारतीय सेना के साथ इसके संबंध. यहां से सेना के लिए अस्त्र-शस्त्र और तोपखानों के लिए खास तरह से बनाए गए विकल्प दिए जाते हैं. मिसाल के तौर पर यहां से सेना के लिए तूफान, बारिश, बर्फ में भी काम करने वाली माचिस जाती है. प्रैक्टिस के लिए बम भी शिवकाशी में बनाए जाते हैं.

पटाखा निर्यात की इजाजत नहीं 
तमाम खूबियों और विश्व में आतिशबाजी निर्माण में दूसरे नंबर पर होने के बावजूद यहां से पटाखे दूसरे देशों को नहीं जाते हैं. इसकी एक वजह है पर्याप्त स्टोरेज न होना. शिपिंग की सुविधा भी उतनी अच्छी नहीं, जितनी बाहरी देशों की मांग रहती है. चूंकि डायरेक्टर जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड ने आतिशबाजी उद्योग को प्रतिबंधित व्यवसाय की श्रेणी में रखा है, इसी वजह से पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोजिव सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन (पीईएसओ) ने अब तक इसके निर्यात के लिए किसी को भी लाइसेंस नहीं दिया है. दूसरे किसी देश को भी भले ही वो यूनाइटेड स्टेट्स हो, स्पेन, जर्मनी या फिर चीन- किसी को भी पटाखा निर्यात की इजाजत नहीं है. यानी चीन से जो पटाखे और आतिशबाजियां ली जा रही हैं, वो भी अवैध की श्रेणी में आती हैं.



शहर के नाम का इतिहास
आतिशबाजी निर्माण के अलावा कई और खासियतें भी इस शहर में हैं. शहर के नाम के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है. कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी की शुरुआत में इस शहर के राजा हरीकेसरी पक्कीरामा पांडियन वाराणसी पहुंचे, वहां शिवभक्ति ने उन्हें इतना मोहा कि वहां से शिवलिंग लाकर अपने शहर में प्रतिष्ठापना की. शिवलिंग के लिए द्रविड़ शैली की झलक लिए हुए शिव मंदिर तैयार करवाया. तब से ही शहर का नाम शिवकाशी पड़ गया.

कहते हैं छोटा जापान
अपने छपाई उद्योग की वजह से इसे कुट्टी जापान यानी छोटा जापान भी कहा जाता है. यहां काफी बड़े-बड़े और आधुनिक ऑफसेट प्रिंटिंग प्रेस हैं, जहां तड़कीले-भड़कीले कैलेंडरों का निर्माण होता है. जर्मनी के बाद शिवकाशी में सबसे ज्यादा मशीनें लगी हुई हैं. यहां से सुनहरे परदे के नायक-नायिकाओं के कैलेंडर देशभर में जाते हैं. प्रिंटिंग उद्योग की वजह से शहर को कुट्टी जापान नाम पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिया था, तब से ये नाम भी चलन में आ गया.

आतिशबाजी व्यवसाय में देशभर में सबसे आगे रहने वाला ये शहर बड़े परदे को भी पसंद आ गया. साल 2005 में इसपर एक तमिल फिल्म बनी-शिवकाशी. इस रोमांटिक-एक्शन फिल्म में असिन और प्रकाश राज मुख्य रोल में थे. दिवाली पर रिलीज इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा व्यवसाय किया. बाद में विरासत की जंग नाम से इसका हिंदी रूपांतरण भी आया था.

ये भी पढ़ें:

इस राज्य में सबसे ज्यादा होता है दलितों पर अत्याचार

इस गांव के लिए Google मैप बना खतरा, पुलिस ने लोगों को यूज़ न करने की दी सलाह

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए नॉलेज से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: October 24, 2019, 10:59 AM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...