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डेढ़ साल में तीसरी बार सड़कों पर उतरे किसान, क्या हैं उनकी मांगें?

मेरठ में किसान क्रांति यात्रा की तस्वीर (पीटीआई)

मेरठ में किसान क्रांति यात्रा की तस्वीर (पीटीआई)

किसानों का आरोप है कि सरकार ने उनके साथ विश्वासघात किया है. उनका कहना है कि 2014 में सत्ता में आने से पहले बीजेपी ने कि ...अधिक पढ़ें

    देश के किसान एक बार फिर सड़कों पर उतर आए हैं. 23 सितंबर को हरिद्वार से बड़ी संख्या में किसान दिल्ली की ओर पैदल ही चल पड़े. राजधानी पहुंचने के लिए उन्होंने 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती का दिन चुना. इस यात्रा को नाम दिया गया है 'किसान क्रांति यात्रा'. किसानों में दुख और आक्रोश है, क्योंकि उनका कहना है कि उनके साथ सरकार ने विश्वासघात किया है. उनका कहना है कि 2014 में सत्ता में आने से पहले बीजेपी ने किसानों के हित के लिए जो घोषणापत्र जारी किया था, उस पर अमल नहीं किया गया और उसका प्रयोग सिर्फ सत्ता में आने के लिए किया गया था. इन किसानों को फिलहाल दिल्ली-उत्तर प्रदेश बॉर्डर पर ही रोक दिया गया है और दिल्ली में घुसने नहीं दिया जा रहा. इन किसानों का एक प्रतिनिधि मंडल केंद्र सरकार के कुछ लोगों से मिलने के लिए पहुंचे हैं.

    क्या है इन किसानों की मुख्य मांगें:
    किसानों की एक मीटिंग उत्तर प्रदेश सरकार के साथ 1 अक्टूबर को हुई थी. यह वार्ता विफल हुई थी. इसीलिए अब ये किसान नौ सूत्रीय मांगें लेकर दिल्ली पहुंच रहे हैं. ये हैं इन किसानों की मुख्य मांगें:

    -किसानों के पिछले वर्ष की गन्ना फसल की पेमेंट चुकाने की मांग, ऐसा न करने वाले शुगर मिल अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग
    -किसानों के लिए पेंशन की मांग
    -स्वामीनाथन कमिटी की रिपोर्ट लागू किए जाने की मांग
    -मृतक किसानों के परिवारों के लिए घरों की मांग
    -फसलों के उचित मूल्य की मांग
    -कर्ज मुक्ति की मांग
    -बिजली के दामों में कमी की मांग
    -डीजल के दामों में कमी की मांग
    -10 साल पुराने डीजल ट्रैक्टर बंद किए जाने के खिलाफ मांग




    बीते डेढ़ सालों में ये तीसरी बार है जब किसान इस तरह सड़कों पर उतर आए हैं. इस 'किसान क्रांति यात्रा' से पहले भी दो बार किसान अपनी कुछ मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आए. कब-कब, कहां और क्यों हुईं ये किसान आन्दोलन की यात्राएं.

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    नासिक-मुंबई किसान यात्रा:
    मार्च 2018 में महाराष्ट्र के 30 हजार किसान मुंबई की विधानसभा का घेराव करने पहुंचे. नासिक से छह मार्च को उन्होंने मुंबई यात्रा शुरू की. 11 मार्च को वो मुंबई पहुंचे. नासिक से मुंबई तक की उनकी यात्रा 180 किलोमीटर की रही. रात में वो विश्राम करते थे. फिर दिन में रोज तकरीबन 30 किलोमीटर की यात्रा. ये यात्रा मुंबई- आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुई. रास्ते में उनसे और किसान जुड़ते चले गए. किसानों का कहना था कि महाराष्ट्र सरकार ने पिछले साल 34 हजार करोड़ रुपए की सशर्त कृषि माफी की घोषणा की थी लेकिन अब तक लागू नहीं किया गया. 2017 जून में हुई इस घोषणा के बाद से महाराष्ट्र में 1753 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. किसान अब इस मामले में आर या पार चाहते हैं.

    जब मुंबई की सड़कों पर उतर आए थे किसान


    क्या थीं उन किसानों की मांगें:
    किसान कर्ज माफी, बिजली बिल माफी और उचित समर्थन मूल्य के साथ स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू कराना चाहते थे.

    - किसानों की सबसे बड़ी मांग थी कर्जमाफी. बैंकों से लिया कर्ज किसानों के लिए बोझ बन चुका है. मौसम के बदलने से हर साल फसलें तबाह हो रही है. ऐसे में किसान चाहते थे कि उन्हें कर्ज से मुक्ति मिले.
    - संगठनों का तर्क था कि महाराष्ट्र के अधिकतर किसान फसल बर्बाद होने के कारण बिजली बिल नहीं चुका पाते हैं. इसलिए उन्हें बिजली बिल में छूट दी जाए.
    - फसलों के वाजिब दाम की मांग किसान लंबे समय से कर रहे हैं. सरकार ने बजट में भी किसानों को एमएसपी का तोहफा दिया था, लेकिन कुछ संगठनों का मानना था कि केंद्र सरकार की एमएसपी की योजना महज दिखावा है.
    - वो चाहते थे कि सरकार स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशें भी लागू करे.
    एआईकेएस के सचिव राजू देसले ने किसान यात्रा की शुरुआत के वक्त कहा था, ‘हम ये भी चाहते हैं कि राज्य सरकार विकास परियोजनाओं के नाम पर सुपर हाइवे तथा बुलेट ट्रेन के लिए कृषियोग्य भूमि का जबरदस्ती अधिग्रहण नहीं करे.’

    किसानों के उस मार्च में बड़े पैमाने पर आदिवासी भी शामिल रहे. आदिवासी किसानों की मांग थी कि जिन जमीनों पर वो खेती किसानी कर रहे थे, उसका मालिकाना हक उन्हें अब तक नहीं मिला. उन्हें उन जमीनों पर अपना हक चाहिए. किसान आदिवासी वनभूमि के आवंटन से जुड़ी समस्याओं के निपटारे की भी मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि आए ताकि आदिवासी किसानों को उनकी जमीनों का मालिकाना हक मिल सके.

    किसानों का कहना था कि कर्ज़ माफ़ी के संबंध में जो आंकड़े दिए गए थे, उन्हें बढ़ा-चढ़ा कर बताया गया था. जिला स्तर पर बैंक खस्ताहाल हैं. इस कारण कर्ज माफी का काम अधूरा रह गया. इस स्थिति में बैंकों को जितना लोन किसानों को देना चाहिए, उसका दस फीसद भी नहीं हो पाया. जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार थी तक राज्य पर ढाई लाख करोड़ रुपये के ऋणभार था. ये ऋणभार अब बढ़कर 4 लाख 13 हजार करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया है.

    गाजियाबाद बॉर्डर पर दिल्ली कूच को तैयार हजारों किसान
    गाजियाबाद बॉर्डर पर दिल्ली कूच को तैयार हजारों किसान


    मंदसौर किसान रैली:
    साल 2017 में मध्य प्रदेश के मंदसौर में भी इसी तरह का एक किसान आन्दोलन हुआ था. इस आन्दोलन में भी किसानों की मांगें कर्ज माफी और अपनी फसल का सही दाम हासिल करने की थी. कई दिनों तक यह आन्दोलन चला जिसे तेजी से बढ़ते हुए देखकर प्रशासन से मंदसौर समेत आस-पास के जिलों जैसे उज्जैन और रतलाम में इंटरनेट भी बंद कर दिया था. स्थिति तब बिगड़ गई जब पुलिस ने किसानों पर फायरिंग कर दी. इस फायरिंग में 6 किसानों की मौत हो गई थी और बहुत से किसान बुरी तरह घायल हुए थे.

    गोलियां चलने के बाद यह पूरा आन्दोलन एक हिंसक प्रदर्शन में बदल गया था. फायरिंग से गुस्साए किसानों ने जगह-जगह तोड़फोड़ की और कई गाड़ियां जला डालीं. कई दिनों तक जिले में कर्फ्यू के हालात थे. इन सभी मामलों में किसानों को उनकी मांगों के एवज में आश्वासन दिए गए. अब देखना यह है कि 2 अक्टूबर को हो रही इस रैली का क्या नतीजा निकलेगा.

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    Tags: BJP, Delhi, Farmer Agitation, Farmers Protest, Narendra modi, Sugar, Uttar pradesh news

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